अध्याय 5 · श्लोक 13— कर्म संन्यास योग
Read this verse in English →सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥
लिप्यंतरण
sarva-karmāṇi manasā sannyasyāste sukhaṁ vaśhī nava-dvāre pure dehī naiva kurvan na kārayan
शब्दार्थ (अन्वय)
- sarva
- — all
- karmāṇi
- — activities
- manasā
- — by the mind
- sannyasya
- — having renounced
- āste
- — remains
- sukham
- — happily
- vaśhī
- — the self-controlled
- nava-dvāre
- — of nine gates
- pure
- — in the city
- dehī
- — the embodied being
- na
- — never
- eva
- — certainly
- kurvan
- — doing anything
- na
- — not
- kārayan
- — causing to be done
भावार्थ
जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले शरीररूपी पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका विवेकपूर्वक मनसे त्याग करके निःसन्देह न करता हुआ और न करवाता हुआ सुखपूर्वक (अपने स्वरूपमें) स्थित रहता है।
व्याख्या
"सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी, नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।" — सब कर्मों को मन से त्यागकर स्वाधीन देही नव-द्वार वाले नगर में सुखपूर्वक रहता है, न स्वयं करता न कराता है। यह सुंदर श्लोक शरीर को नव-द्वार वाले नगर की छवि देता है — दो आँखें, दो नासिका, दो कान, एक मुख, और दो अधोद्वार। 'देही' (देहधारी, आत्मा) इस नगर में रहता है पर नगर नहीं है, उसके द्वार नहीं बनाता, उसके तंत्र नहीं चलाता। मुख्य वाक्यांश है 'मनसा संन्यस्य' — मन से, मन में त्यागना। शारीरिक नगर से पीछे हटना नहीं (शरीर अभी जीवित है) बल्कि यह आंतरिक पहचान कि आत्मा नगर के कार्यों का संचालक नहीं है। 'वशी' — स्वाधीन, निचले स्व पर संप्रभुता वाला — वह गुण है जो इस समझ को क्षणिक अवधारणा की बजाय स्थिर रखता है। अनुशासित मन (वशी) यह पहचान बनाए रख सकता है कि कर्म नगर के हैं, आत्मा के नहीं।
भगवद्गीता 5.13 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
नव-द्वार वाला नगर एक सटीक और स्थायी शारीरिक रूपक है: शरीर एक कार्यात्मक नगर है जिसके द्वारों से वह दुनिया के साथ परस्पर क्रिया करता है। निवासी (आत्मा) निर्माता या द्वारपाल नहीं — यह वह साक्षी उपस्थिति है जो भीतर रहती है। यह समझ, जब वास्तविक हो, एक विशिष्ट प्रकार की सहजता उत्पन्न करती है: जीवन से दूरी नहीं बल्कि उसके भीतर स्वतंत्रता।
भगवद्गीता 5.13 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
शरीर एक नव-द्वार नगर (आँखें, कान, नाक, मुख, अधो-द्वार) के रूप में — और स्व वह निवासी जो वास्तव में द्वार नहीं चलाता। सब कर्मों का मन से संन्यास: यह जोर देना बंद करो 'मैं वह हूँ जो यह सब चला रहा है।' नगर अपना काम करता है; स्व उसमें उसके साथ अभिन्न हुए बिना रहता है।
भगवद्गीता 5.13 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
कल्पना करो तुम्हारा शरीर नौ दरवाज़ों वाला नगर है (तुम्हारी आँखें, कान, नाक, मुख और अन्य द्वार)। तुम — असली तुम, तुम्हारी आत्मा — उस नगर में रहते हो पर तुमने द्वार नहीं बनाए और तुम हर तंत्र नहीं चलाते। नगर अपना काम अपने आप करता है! असली तुम बस वहाँ, शांतिपूर्वक देखते हुए रहते हो।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।
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