अध्याय 5 · श्लोक 15— कर्म संन्यास योग
Read this verse in English →नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥
लिप्यंतरण
nādatte kasyachit pāpaṁ na chaiva sukṛitaṁ vibhuḥ ajñānenāvṛitaṁ jñānaṁ tena muhyanti jantavaḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- na
- — not
- ādatte
- — accepts
- kasyachit
- — anyone’s
- pāpam
- — sin
- na
- — not
- cha
- — and
- eva
- — certainly
- su-kṛitam
- — virtuous deeds
- vibhuḥ
- — the omnipresent God
- ajñānena
- — by ignorance
- āvṛitam
- — covered
- jñānam
- — knowledge
- tena
- — by that
- muhyanti
- — are deluded
- jantavaḥ
- — the living entities
भावार्थ
सर्वव्यापी परमात्मा न किसीके पापकर्मको और न शुभकर्मको ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञानसे ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मोहित हो रहे हैं।
व्याख्या
"नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः, अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।" — सर्वव्यापी न किसी के पाप लेता है न पुण्य; ज्ञान अज्ञान से ढका है — इससे जीव मोहित होते हैं। यह श्लोक 5.14 की शिक्षा जारी रखता है इसकी सबसे स्पष्ट आपत्ति संबोधित करके: अगर आत्मा कर्ता नहीं है, तो जीव पाप और पुण्य के परिणाम क्यों अनुभव करते हैं? उत्तर सटीक दिया गया है: क्योंकि ज्ञान (आत्मा का ज्ञान) अज्ञान से ढका है, जीव इस बारे में मोहित रहते हैं कि वे कौन हैं। 'विभुः' — सर्वव्यापी — आत्मा है। वह न पाप लेती है न 'सुकृतम्' (पुण्य)। यह नैतिक तटस्थता नहीं — यह आत्मा की संरचनात्मक वास्तविकता है: शुद्ध, अस्पर्शित जागरूकता। शंकराचार्य 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' पर ध्यान देते हैं — अज्ञान से ढका ज्ञान। ढकना महत्त्वपूर्ण है: ज्ञान पहले से उपस्थित है। साधना इसे प्रकट करती है — आवरण हटाती है, प्रकाश नहीं बनाती।
भगवद्गीता 5.15 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
अनुपस्थित की बजाय अज्ञान से ढके ज्ञान की छवि आध्यात्मिक साधना के लिए महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ है मुक्ति कोई उत्पादित उपलब्धि नहीं बल्कि जो सदा उपस्थित था उसकी पहचान है। साधना प्रकाश नहीं बनाती — आवरण हटाती है। यह आध्यात्मिक विकास की पूरी परियोजना को पुनः तैयार करता है: तुम स्वतंत्रता की ओर निर्माण नहीं कर रहे, तुम अनावरण कर रहे हो जो तुम पहले से हो।
भगवद्गीता 5.15 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
आत्मा किसी के पाप या पुण्य नहीं लेती — यह अज्ञान से ढकी है, उससे भ्रष्ट नहीं। मुख्य अंतर: स्वतंत्रता का ज्ञान पहले से है, बस ढका है। साधना प्रकाश नहीं बना रही — आवरण हटा रही है। तुम किसी ऐसी चीज़ की ओर काम नहीं कर रहे जो तुम्हारे पास नहीं है; तुम किसी ऐसी चीज़ का अनावरण कर रहे हो जो पहले से है।
भगवद्गीता 5.15 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
असली स्व — आत्मा — शुद्ध है और कभी किसी की गलतियाँ या अच्छे कार्य नहीं लेती। पर यह बादलों के पीछे सूरज की तरह है: हम कौन हैं इसकी बुद्धि अज्ञान से ढकी है, जैसे बादल सूरज की रोशनी ढकते हैं! आध्यात्मिक साधना बादल उड़ाने जैसी है ताकि सूरज — हमारे सच्चे स्व का ज्ञान — चमक सके!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।
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