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अध्याय 18 · श्लोक 34मोक्ष संन्यास योग

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श्लोक 34 / 78

यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन।प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥

लिप्यंतरण

yayā tu dharma-kāmārthān dhṛityā dhārayate ‘rjuna prasaṅgena phalākāṅkṣhī dhṛitiḥ sā pārtha rājasī

शब्दार्थ (अन्वय)

yayā
by which
tu
but
dharma-kāma-arthān
duty, pleasures, and wealth
dhṛityā
through steadfast will
dhārayate
holds
arjuna
Arjun
prasaṅgena
due of attachment
phala-ākāṅkṣhī
desire for rewards
dhṛitiḥ
determination
that
pārtha
Arjun, the son of Pritha
rājasī
in the mode of passion

भावार्थ

हे पृथानन्दन अर्जुन ! फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा धर्म, काम (भोग) और अर्थको अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है, वह धृति राजसी है।

व्याख्या

श्रीकृष्ण राजसिक धृति का वर्णन करते हैं: 'पर वह धृति जिससे कोई आसक्ति के साथ धर्म, काम, और अर्थ को थामता है, उनके फलों की लालसा करते, हे पार्थ — वह धृति राजसिक है।' श्रीकृष्ण संकल्प का मध्य गुण नाम करते हैं। शंकराचार्य सूक्ष्म बिंदु उजागर करते हैं: राजसिक धृति अच्छी चीज़ों को भी थाम सकती है (धर्म शामिल है!) — पर यह 'आसक्ति के साथ, फलों की लालसा करते' ऐसा करती है। तो स्थिरता स्वयं अनिवार्य रूप से बुरी वस्तुओं की ओर निर्देशित नहीं; जो इसे राजसिक बनाता है वह थामने का आसक्त, फल-लालसा करने वाला तरीका है। यह आंतरिक मुद्रा है, वस्तु नहीं, जो गुणवत्ता निर्धारित करती है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह सूक्ष्म और महत्त्वपूर्ण बिंदु है कि स्थिरता राजसिक हो सकती है तब भी जब यह अच्छी चीज़ों की ओर निर्देशित है — क्योंकि जो इसे राजसिक बनाता है वह थामने का आसक्त, फल-लालसा करने वाला तरीका है, थामी गई वस्तु नहीं। यह सच में सूक्ष्म है। हम मान सकते हैं कि कर्तव्य और योग्य लक्ष्यों के प्रति निरंतर समर्पण स्वतः सर्वोच्च प्रकार की स्थिरता है। पर गीता बताती है: तुम अच्छे लक्ष्यों का भी पीछा एक ऐसी स्थिरता से कर सकते हो जो आसक्ति से चालित है। यह एक बहुत सामान्य उच्च-उपलब्धिकर्ता पैटर्न का वर्णन करता है। और यहाँ मुख्य बिंदु है: वही निरंतरता वही अच्छे लक्ष्यों की ओर सात्त्विक बन जाती है जिस क्षण आसक्ति गिर जाती है। सबक: केवल यह नहीं जाँचो कि तुम क्या पीछा कर रहे हो, बल्कि किस तरीके से। वही समर्पण, हल्की पकड़।

भगवद्गीता 18.34 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह सूक्ष्म और सच में महत्त्वपूर्ण बिंदु है कि स्थिरता राजसिक हो सकती है तब भी जब यह अच्छी और योग्य चीज़ों की ओर निर्देशित है — क्योंकि जो इसे राजसिक बनाता है वह थामने का आसक्त, फल-लालसा करने वाला तरीका है, थामी जा रही वस्तु नहीं। यह सच में सूक्ष्म है और चूकना आसान है। हम स्वाभाविक रूप से मान सकते हैं कि कर्तव्य और योग्य लक्ष्यों के प्रति निरंतर, समर्पित प्रतिबद्धता स्वतः सर्वोच्च प्रकार की स्थिरता है। पर गीता सावधानी से बताती है: तुम अच्छे लक्ष्यों का भी पीछा एक ऐसी स्थिरता से कर सकते हो जो गहरी आसक्ति और विशिष्ट परिणामों की चिंतित लालसा से चालित है — और यही चीज़ स्थिरता को राजसिक बनाती है। यह एक बहुत सामान्य उच्च-उपलब्धिकर्ता पैटर्न का वर्णन करता है। और यहाँ मुख्य व्यावहारिक बिंदु: ठीक वही निरंतरता ठीक वही अच्छे लक्ष्यों की ओर सात्त्विक बन जाती है जिस क्षण आसक्ति और परिणाम-लालसा गिर जाती है। सबक: केवल यह नहीं जाँचो कि तुम क्या पीछा कर रहे हो, बल्कि किस तरीके और आंतरिक मुद्रा से। वही समर्पण, हल्की पकड़।

भगवद्गीता 18.34 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट यह सटल और इम्पॉर्टेंट पॉइंट है कि स्टेडीनेस रजसिक हो सकती है तब भी जब यह गुड और वर्दी चीज़ों की ओर डायरेक्टेड है — क्योंकि जो इसे रजसिक बनाता है वह अटैच्ड, फ्रूट-क्रेविंग मैनर है, होल्ड की जा रही ऑब्जेक्ट नहीं। यह सटल है। हम असम्यूम कर सकते हैं कि वर्दी गोल्स के प्रति परसिस्टेंट कमिटमेंट स्वतः हाईएस्ट स्टेडीनेस है। पर गीता पॉइंट आउट करती है: तुम गुड गोल्स का भी पीछा एक ऐसी स्टेडीनेस से कर सकते हो जो डीप अटैचमेंट और एंग्ज़ियस क्रेविंग से फ्यूल्ड है। यह बर्नआउट-प्रोन ओवरअचीवर एनर्जी है। की पॉइंट: वही परसिस्टेंस वही गुड गोल्स की ओर सात्त्विक बन जाती है जिस मोमेंट अटैचमेंट ड्रॉप होती है। सबक: केवल यह नहीं जाँचो कि तुम क्या पर्स्यू कर रहे हो, बल्कि किस मैनर से। सेम डेडिकेशन, लाइटर ग्रिप।

भगवद्गीता 18.34 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण स्थिरता का मध्य (राजसिक) प्रकार वर्णन करते हैं — और यहाँ एक आश्चर्यजनक मोड़ है! इस तरह की स्थिरता अच्छी चीज़ों की ओर भी लक्षित हो सकती है (जैसे अपना कर्तव्य करना)! पर जो इसे राजसिक बनाता है वह यह है कि तुम कैसे थामते हो — बहुत आसक्ति और पुरस्कारों की लालसा के साथ! यहाँ आश्चर्यजनक विचार है: तुम सोच सकते हो कि अच्छे लक्ष्यों से बहुत कसकर चिपकना हमेशा सबसे अच्छी स्थिरता है। पर श्रीकृष्ण कहते हैं: बिल्कुल नहीं! भले ही तुम्हारे लक्ष्य अच्छे हों, अगर तुम उन्हें चिंतित, पकड़ वाली 'मुझे यह पुरस्कार पाना ही है!' ऊर्जा से थाम रहे हो — वह राजसिक स्थिरता है! दो बच्चों की कल्पना करो दोनों पियानो स्थिर अभ्यास कर रहे। एक इसलिए क्योंकि वे इसे प्यार करते हैं। दूसरा केवल इसलिए क्योंकि वे ट्रॉफी जीतने के लिए बेताब हैं। वही लक्ष्य — पर अंदर अलग! तो अपने अच्छे लक्ष्यों का स्थिर पीछा करते रहो — पर जाँचो तुम उन्हें कैसे थाम रहे हो!

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अध्याय सन्दर्भ

सबसे बड़ा यह अध्याय समस्त गीता का सार है: संन्यास और त्याग का भेद, गुणों के अनुसार कर्म, स्वभावज कर्तव्य, और परम उपदेश — सब कुछ भगवान के शरण हो जाओ, वे समस्त पापों से मुक्त कर देंगे।

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