अध्याय 18 · श्लोक 26— मोक्ष संन्यास योग
Read this verse in English →गीता 18.26 कर्ता के श्रेष्ठतम प्रकार का चित्र खींचती है: आसक्ति और अहंकार से मुक्त, संकल्प और उत्साह से भरा, और कर्म सफल हो या विफल अविचलित। ऐसा व्यक्ति सात्त्विक कर्ता कहलाता है — परिणाम चाहे जो हो, भीतर से स्थिर।
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
लिप्यंतरण
mukta-saṅgo ‘nahaṁ-vādī dhṛity-utsāha-samanvitaḥ siddhy-asiddhyor nirvikāraḥ kartā sāttvika uchyate
शब्दार्थ (अन्वय)
- mukta-saṅgaḥ
- — free from worldly attachment
- anaham-vādī
- — free from ego
- dhṛiti
- — strong resolve
- utsāha
- — zeal
- samanvitaḥ
- — endowed with
- siddhi-asiddhyoḥ
- — in success and failure
- nirvikāraḥ
- — unaffected
- kartā
- — worker
- sāttvikaḥ
- — in the mode of goodness
- uchyate
- — is said to be
भावार्थ
जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण सात्त्विक कर्ता का वर्णन करते हैं: 'जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, अहंकार से रहित, धैर्य और उत्साह से युक्त, सफलता या असफलता से अप्रभावित — सात्त्विक कहलाता है।' श्रीकृष्ण कर्ता का सर्वोच्च गुण नाम करते हैं। शंकराचार्य सात्त्विक कर्ता के पाँच चिह्न उजागर करते हैं: (1) आसक्ति से मुक्त, (2) अहंकार से रहित, (3) धैर्यवान, (4) ऊर्जावान और उत्साही, और (5) सफलता या असफलता से अप्रभावित। यह प्रभावशाली है: सर्वोच्च कर्ता निष्क्रिय या निर्जीव होने के अर्थ में विरक्त नहीं। वे धृति और उत्साह से भरे हैं! सात्त्विक कर्तृत्व आंतरिक स्वतंत्रता को पूर्ण संलग्नता के साथ जोड़ता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि सात्त्विक कर्ता के हृदय पर प्रभावशाली संयोजन है: आंतरिक स्वतंत्रता और पूर्ण संलग्नता। यह एक सामान्य गलतफहमी को सुधारता है कि 'आध्यात्मिक स्वतंत्रता' का मतलब निष्क्रिय बनना है। गीता की दृष्टि में सर्वोच्च कर्ता शांत दर्शक नहीं; वे धृति और उत्साह से भरे हैं। वे पूरी तरह दिखते हैं, कठिन काम करते हैं, और संलग्न रहते हैं — जबकि आंतरिक रूप से परिणामों से आसक्ति से मुक्त। यह दोनों ध्रुवों से अधिक कठिन आदर्श है। सबक: संलग्नता और स्वतंत्रता के बीच झूठा विकल्प स्वीकार मत करो। सात्त्विक कर्ता दोनों थामता है। यह कर्तृत्व का सर्वोच्च रूप है: उत्साही और मुक्त।
भगवद्गीता 18.26 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि सात्त्विक कर्ता के बिल्कुल हृदय पर प्रभावशाली और सच में महत्त्वपूर्ण संयोजन है: वास्तविक आंतरिक स्वतंत्रता और पूर्ण संलग्नता। यह एक बहुत सामान्य गलतफहमी को सुधारता है कि 'आध्यात्मिक स्वतंत्रता' का किसी तरह मतलब निष्क्रिय, हटा हुआ बनना है। गीता की दृष्टि में सर्वोच्च कर्ता शांत, हटा हुआ दर्शक नहीं; वे सक्रिय रूप से धृति और उत्साह से भरे हैं। वे पूरी तरह दिखते हैं, कठिन काम करते हैं, संलग्न रहते हैं — जबकि एक साथ आंतरिक रूप से विशिष्ट परिणामों से आसक्ति से और कर्तृत्व के अहं-दावे से मुक्त। यह दोनों ध्रुवों से अकेले की तुलना में कहीं अधिक कठिन आदर्श है। सबक: संलग्नता और आंतरिक स्वतंत्रता के बीच झूठे बाइनरी को स्वीकार मत करो — वे वास्तव में विरोधी नहीं। सात्त्विक कर्ता दोनों को साथ थामता है — जेन्युइनली पूर्ण ऊर्जा, उत्साह, और धैर्य कर्म में लाते जबकि आंतरिक रूप से अनासक्त और परिणामों से अप्रभावित रहते। यह कर्तृत्व का सर्वोच्च रूप है: उत्साही और मुक्त। दोनों एक साथ अभ्यास करो।
भगवद्गीता 18.26 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट सात्त्विक डूअर के हार्ट पर स्ट्राइकिंग कॉम्बिनेशन है: रियल इनर फ्रीडम (नो अटैचमेंट, नो ईगो) प्लस फुल एंगेजमेंट (स्टेडफास्टनेस, एनर्जी)। यह कॉमन मिसअंडरस्टैंडिंग करेक्ट करता है कि 'स्पिरिचुअल फ्रीडम' का मतलब पैसिव बनना है। गीता की विज़न में हाईएस्ट डूअर बायस्टैंडर नहीं; वे धृति और उत्साह से भरे हैं। यह दोनों पोल्स से ज़्यादा हार्ड आइडियल है। सबक: एंगेजमेंट और इनर फ्रीडम के बीच फॉल्स बाइनरी एक्सेप्ट मत करो। सात्त्विक डूअर दोनों होल्ड करता है — फुल एनर्जी और इनर फ्रीडम साथ। यह हाईएस्ट डूअरशिप है: ज़ीलस AND फ्री।
भगवद्गीता 18.26 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण कर्ता का सबसे अच्छा प्रकार वर्णन करते हैं — सात्त्विक! और यहाँ एक अद्भुत आश्चर्य है: वे शांत या निष्क्रिय नहीं! उनके पाँच अद्भुत गुण हैं: (1) आसक्त नहीं, (2) कोई अहंकार नहीं, (3) धैर्यवान, (4) ऊर्जावान और उत्साही, और (5) सफलता या असफलता दोनों में शांत! यहाँ अद्भुत, आश्चर्यजनक विचार है: बुद्धिमान और मुक्त होने का मतलब उबाऊ या नींद वाला होना नहीं! सबसे अच्छा कर्ता ऊर्जा से भरा है, उत्साह से भरा है, 'चलो!' से भरा है — वे बस इसे अपने बारे में नहीं बनाते! तो तुम बहुत ऊर्जावान, उत्साही, और सक्रिय हो सकते हो और अंदर बुद्धिमान और मुक्त भी! ये साथ जाते हैं — वे विपरीत नहीं! जो भी तुम करो उसमें अपनी पूरी ऊर्जा लाओ — पर इसे अपने बारे में मत बनाओ। जीवन से भरे और स्वतंत्रता से भरे — यही सबसे अच्छा है!
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 18.26 का अर्थ क्या है?
जो कर्ता आसक्ति और अहंकार से मुक्त, संकल्प और उत्साह से युक्त, और सफलता-विफलता से अविचलित है, वह सात्त्विक (शुद्ध) कहलाता है। यह उस व्यक्ति का चित्र है जो कर्म के प्रति पूर्णतः समर्पित है फिर भी उसके परिणाम के विषय में भीतर से स्थिर।
यह श्लोक किसने कहा?
भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, अठारहवें अध्याय (मोक्ष संन्यास योग) में, कर्ता के तीन प्रकारों में से पहले का वर्णन करते हुए।
गीता 18.26 आज के जीवन में कैसे उतारें?
काम करने का सबसे स्वस्थ ढंग: सच्चा संकल्प और उत्साह लाओ, अहंकार और पकड़ छोड़ो, और सफलता को फुलाने या विफलता को कुचलने मत दो। समर्पित और अविचलित साथ-साथ चल सकते हैं।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
सबसे बड़ा यह अध्याय समस्त गीता का सार है: संन्यास और त्याग का भेद, गुणों के अनुसार कर्म, स्वभावज कर्तव्य, और परम उपदेश — सब कुछ भगवान के शरण हो जाओ, वे समस्त पापों से मुक्त कर देंगे।
अध्याय पढ़ें →✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 18.26 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 18.26 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
Chinmaya Mission
Chinmaya Mission — Swami Chinmayananda's organisation, whose Bhagavad Gita commentary is cited on this site.
Chinmaya Mission →