अध्याय 15 · श्लोक 10— पुरुषोत्तम योग
Read this verse in English →उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥
लिप्यंतरण
utkrāmantaṁ sthitaṁ vāpi bhuñjānaṁ vā guṇānvitam vimūḍhā nānupaśhyanti paśhyanti jñāna-chakṣhuṣhaḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- utkrāmantam
- — departing
- sthitam
- — residing
- vā api
- — or even
- bhuñjānam
- — enjoys
- vā
- — or
- guṇa-anvitam
- — under the spell of the modes of material nature
- vimūḍhāḥ
- — the ignorant
- na
- — not
- anupaśhyanti
- — percieve
- paśhyanti
- — behold
- jñāna-chakṣhuṣhaḥ
- — those who possess the eyes of knowledge
भावार्थ
शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले ज्ञानी मनुष्य ही जानते हैं।
व्याख्या
श्रीकृष्ण ध्यान देते हैं कि कौन स्व को देख सकता और नहीं देख सकता: 'मूढ़ उसे जाते, रहते, या अनुभव करते, गुणों से युक्त नहीं देखते; ज्ञान की आँख वाले उसे देखते हैं।' श्रीकृष्ण उनके बीच भेद करते हैं जो आंतरिक स्व को देख सकते और नहीं देख सकते। शंकराचार्य समझाते हैं कि अधिकांश लोग आंतरिक स्व को देखने में क्यों विफल होते हैं भले ही यह अनुभव के हर क्षण में उपस्थित है। चेतन स्व हर कार्य में उपस्थित है — फिर भी 'मूढ़' इसे देखने में पूरी तरह विफल होते हैं। वे बाहरी वस्तुओं और गुणों के खेल में इतने फँसे हैं कि वे कभी इसके पीछे चेतन उपस्थिति को नोटिस नहीं करते। केवल 'ज्ञान-चक्षु' वाले — ज्ञान की आँख (13.34 की प्रतिध्वनि) — वास्तव में स्व को देख सकते हैं। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह प्रभावशाली अवलोकन है कि अधिकांश लोग चेतन स्व को पूरी तरह चूक जाते हैं — सबसे घनिष्ठ, सदा-उपस्थित वास्तविकता — इसलिए नहीं कि यह छिपा या दूर है, बल्कि बस क्योंकि उनके पास हमेशा यहीं जो है उसे देखने की आंतरिक 'ज्ञान की आँख' नहीं। चेतन स्व तुम्हारे अनुभव के हर एक क्षण में उपस्थित है। फिर भी 'मूढ़' इसे नोटिस करने में पूरी तरह विफल होते हैं। क्यों? क्योंकि वे अनुभव की वस्तुओं में इतने अवशोषित हैं कि वे कभी पीछे मुड़कर विषय को नोटिस नहीं करते। सबक: सबसे महत्त्वपूर्ण वास्तविकता दूर या छिपी नहीं; यह सदा-उपस्थित जागरूकता है। 'ज्ञान की आँख' विकसित करो — ध्यान को जागरूकता की ओर मोड़ना।
भगवद्गीता 15.10 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह प्रभावशाली अवलोकन है कि अधिकांश लोग चेतन स्व को पूरी तरह चूक जाते हैं — सबसे घनिष्ठ, सदा-उपस्थित वास्तविकता — इसलिए नहीं कि यह छिपा या दूर है, बल्कि बस क्योंकि उनके पास हमेशा यहीं स्पष्ट दृष्टि में जो है उसे देखने की आंतरिक 'ज्ञान की आँख' नहीं। यह आत्म-ज्ञान की प्रकृति के बारे में एक गहन बिंदु है। चेतन स्व तुम्हारे अनुभव के हर एक क्षण में उपस्थित है — यह वह जागरूकता है जो अभी इन शब्दों को पढ़ रही है। फिर भी 'मूढ़' इसे नोटिस करने में पूरी तरह विफल होते हैं — वे अपना पूरा जीवन इसे एक बार भी पहचाने बिना गुज़ार सकते हैं। क्यों? क्योंकि वे अनुभव की वस्तुओं में इतने अवशोषित हैं कि वे कभी पीछे मुड़कर विषय को नोटिस नहीं करते। यह पूरे दिन आँखों से बाहर देखने और कभी देखने को नोटिस न करने जैसा है। सबक: सबसे महत्त्वपूर्ण वास्तविकता दूर या छिपी नहीं; यह सदा-उपस्थित जागरूकता है जो तुम अभी उपयोग कर रहे हो। 'ज्ञान की आँख' विकसित करो — ध्यान को जागरूकता की ओर मोड़ना। जो हमेशा नोटिस कर रहा है उसे नोटिस करना सीखो।
भगवद्गीता 15.10 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट यह स्ट्राइकिंग ऑब्ज़र्वेशन है कि अधिकांश लोग कॉन्शियस सेल्फ को पूरी तरह मिस करते हैं — सबसे इंटिमेट, एवर-प्रेज़ेंट रियलिटी — इसलिए नहीं कि यह हिडन या दूर है, बल्कि बस क्योंकि उनके पास हमेशा यहीं प्लेन साइट में जो है उसे देखने की इनर 'आई ऑफ नॉलेज' नहीं। कॉन्शियस सेल्फ तुम्हारे एक्सपीरियंस के हर एक मोमेंट में प्रेज़ेंट है — यह वह अवेयरनेस है जो अभी इन शब्दों को पढ़ रही है। फिर भी 'डिल्यूडेड' इसे नोटिस करने में पूरी तरह फेल होते हैं। क्यों? क्योंकि वे एक्सपीरियंस की ऑब्जेक्ट्स में इतने अब्ज़ॉर्ब्ड हैं कि वे कभी पीछे मुड़कर सब्जेक्ट को नोटिस नहीं करते। यह पूरे दिन आँखों से बाहर देखने और कभी सीइंग को नोटिस न करने जैसा है। सबक: सबसे इम्पॉर्टेंट रियलिटी दूर या हिडन नहीं; यह एवर-प्रेज़ेंट अवेयरनेस है जो तुम अभी यूज़ कर रहे हो। 'आई ऑफ नॉलेज' कल्टिवेट करो — अटेंशन को अवेयरनेस की ओर मोड़ना। जो हमेशा नोटिस कर रहा है उसे नोटिस करना सीखो।
भगवद्गीता 15.10 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण कुछ दिलचस्प बताते हैं: भले ही अद्भुत चेतन तुम हर एक क्षण में उपस्थित हो, अधिकांश लोग इसे कभी नोटिस नहीं करते! क्यों? क्योंकि वे अपने चारों ओर के सब सामान को देखने में इतने व्यस्त हैं कि वे कभी पीछे मुड़कर उस तुम को नोटिस नहीं करते जो देख रहा है! यहाँ मज़ेदार बात है: चेतन तुम — असली तुम जो अभी जागरूक हो — तुम्हारी सबसे निकट चीज़ है! यह यहीं है, हमेशा! पर लोग इसे ठीक इसलिए चूकते हैं क्योंकि यह इतना निकट है! यह ऐसा है: कल्पना करो पूरे दिन चश्मा पहनना, सब कुछ उनसे देखना, पर कभी चश्मे को खुद नोटिस न करना! चेतन तुम वैसा है — हमेशा यहाँ, पर अनदेखा क्योंकि हम हमेशा 'वहाँ बाहर' देख रहे हैं! तो मज़ेदार सबक: सबसे अद्भुत चीज़ — चेतन तुम — दूर या खोजने में मुश्किल नहीं। यह सबसे निकट चीज़ है! तो आज़माओ: अपने चारों ओर की चीज़ें नोटिस करने के बजाय, उस तुम को नोटिस करो जो उन्हें नोटिस कर रहा है!
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अध्याय सन्दर्भ
संसार को उल्टे अश्वत्थ वृक्ष के रूप में बताकर श्रीकृष्ण वैराग्यरूपी कुल्हाड़ी से उसे काटना सिखाते हैं। वे स्वयं को क्षर और अक्षर से परे पुरुषोत्तम के रूप में प्रकट करते हैं।
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