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अध्याय 13 · श्लोक 35क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

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श्लोक 35 / 35

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥

लिप्यंतरण

kṣhetra-kṣhetrajñayor evam antaraṁ jñāna-chakṣhuṣhā bhūta-prakṛiti-mokṣhaṁ cha ye vidur yānti te param

शब्दार्थ (अन्वय)

kṣhetra
the body
kṣhetra-jñayoḥ
of the knower of the body
evam
thus
antaram
the difference
jñāna-chakṣhuṣhā
with the eyes of knowledge
bhūta
the living entity
prakṛiti-mokṣham
release from material nature
cha
and
ye
who
viduḥ
know
yānti
approach
te
they
param
the Supreme

भावार्थ

इस प्रकार जो ज्ञानरूपी नेत्रसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अन्तर-(विभाग-) को तथा कार्य-कारणसहित प्रकृतिसे स्वयंको अलग जानते हैं, वे परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं।

व्याख्या

श्रीकृष्ण अध्याय समाप्त करते हैं: 'जो ज्ञान की आँख से, इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच भेद, और प्राणियों की प्रकृति से मुक्ति को देखते हैं — वे परम को प्राप्त करते हैं।' श्रीकृष्ण अध्याय का चरम कथन देते हैं। शंकराचार्य महत्त्वपूर्ण वाक्यांश 'ज्ञान-चक्षु' — ज्ञान की आँख, बुद्धि की आंतरिक आँख पर बल देते हैं। अध्याय की मुक्तिदायक अनुभूति — क्षेत्र (सब जो देखा जाता है) और ज्ञाता (सचेत साक्षी स्व) के बीच स्पष्ट भेद — भौतिक आँखों से नहीं बल्कि इस आंतरिक 'ज्ञान की आँख' से देखी जाती है। जो इस आंतरिक आँख को विकसित और उपयोग करते हैं वे परम को प्राप्त करते हैं। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि, इस गहन अध्याय का सारांश, 'ज्ञान की आँख' की सुंदर अवधारणा है — बुद्धि की एक आंतरिक आँख जो वह देखती है जो भौतिक आँखें नहीं देख सकतीं। पूरा अध्याय एक मुक्तिदायक भेद के बारे में रहा है: क्षेत्र (सब देखा गया) और ज्ञाता (सचेत जागरूकता) के बीच। अधिकांश लोग इस आंतरिक आँख को मूलतः बंद रखकर जीवन गुज़ारते हैं। पूरा आध्यात्मिक पथ, एक अर्थ में, इस आंतरिक आँख का क्रमिक खुलना है। अपनी 'ज्ञान की आँख' विकसित और खोलो। आंतरिक देखना आत्म-ज्ञान का हृदय है।

भगवद्गीता 13.35 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि, इस पूरे गहन अध्याय का सारांश, 'ज्ञान की आँख' की सुंदर अवधारणा है — बुद्धि की एक आंतरिक आँख जो वह देखती है जो भौतिक आँखें नहीं देख सकतीं। पूरा अध्याय एक मुक्तिदायक भेद के बारे में रहा है: क्षेत्र (सब देखा गया) और ज्ञाता (सचेत जागरूकता) के बीच। और श्रीकृष्ण कहते हैं यह भेद 'ज्ञान की आँख' से देखा जाता है — आंतरिक विवेक की एक क्षमता जिसे जानबूझकर जगाना है। यह एक शक्तिशाली विचार है: जैसे तुम्हारी भौतिक आँखें तुम्हें बाहरी दुनिया देखने देती हैं, एक आंतरिक 'आँख' है जो तुम्हें अपनी सच्ची प्रकृति देखने देती है। अधिकांश लोग इस आंतरिक आँख को बंद रखकर पूरा जीवन गुज़ारते हैं। पूरा आध्यात्मिक पथ इस आंतरिक आँख का क्रमिक खुलना है। अपनी 'ज्ञान की आँख' जानबूझकर विकसित और खोलो। आंतरिक देखना आत्म-ज्ञान का हृदय और वास्तविक स्वतंत्रता का द्वार है।

भगवद्गीता 13.35 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट, इस पूरे प्रोफाउंड चैप्टर का सारांश, 'आई ऑफ नॉलेज' (ज्ञान-चक्षु) का ब्यूटीफुल कॉन्सेप्ट है — विज़डम की एक इनर आई जो वह परसीव करती है जो फिजिकल आइज़ नहीं कर सकतीं। पूरा चैप्टर एक सिंगल लिबरेटिंग डिस्टिंक्शन के बारे में रहा है: फील्ड (सब ऑब्ज़र्व्ड) और नोअर (कॉन्शियस अवेयरनेस) के बीच। और श्रीकृष्ण कहते हैं यह डिस्टिंक्शन 'आई ऑफ नॉलेज' से परसीव की जाती है — इनर डिसर्नमेंट की एक फैकल्टी जिसे डेलिबरेटली जगाना है। यह एक पावरफुल आइडिया है: जैसे तुम्हारी फिजिकल आइज़ तुम्हें एक्सटर्नल वर्ल्ड देखने देती हैं, एक इनर 'आई' है जो तुम्हें अपनी ट्रू नेचर देखने देती है। मोस्ट लोग इस इनर आई को क्लोज़्ड रखकर पूरी लाइफ गुज़ारते हैं। पूरा स्पिरिचुअल पाथ इस इनर आई का ग्रैजुअल ओपनिंग है। अपनी 'आई ऑफ नॉलेज' डेलिबरेटली कल्टिवेट और ओपन करो। इनर सीइंग सेल्फ-नॉलेज का हार्ट है।

भगवद्गीता 13.35 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण इस अध्याय को एक सुंदर विचार से समाप्त करते हैं: 'ज्ञान की आँख'! वे कहते हैं हमारे पास एक विशेष आंतरिक 'आँख' है — तुम्हारे चेहरे की आँखें नहीं, बल्कि बुद्धि की एक आंतरिक आँख — जो हमें बदलती चीज़ों (क्षेत्र) और भीतर के शांत देखने वाले (ज्ञाता) के बीच अंतर देखने देती है! सोचो: तुम्हारी सामान्य आँखें तुम्हें अपने आसपास की दुनिया देखने देती हैं — पेड़, लोग, रंग। पर एक विशेष आंतरिक आँख है जो तुम्हें अपना सच्चा स्व देखने देती है — तुम्हारे भीतर का शांत, जागरूक देखने वाला! अधिकांश लोग कभी इस आंतरिक आँख को सच में नहीं खोलते। पर जब तुम अपनी आंतरिक 'ज्ञान की आँख' खोलते हो, तुम स्पष्ट देखने लगते हो: 'ओह! मैं अपने विचार नहीं — मैं उन्हें देखने वाला हूँ!' तो अपनी आंतरिक बुद्धि की आँख खोलने का अभ्यास करो! वह तुम्हें अपना सबसे गहरा, सबसे सच्चा स्व खोजने में मदद करता है!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर व प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद बताते हैं। वे यथार्थ ज्ञान, प्रकृति-पुरुष का स्वरूप और इनके विवेक से मोक्ष का वर्णन करते हैं।

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