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अध्याय 13 · श्लोक 27क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

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श्लोक 27 / 35

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥

लिप्यंतरण

yāvat sañjāyate kiñchit sattvaṁ sthāvara-jaṅgamam kṣhetra-kṣhetrajña-sanyogāt tad viddhi bharatarṣhabha

शब्दार्थ (अन्वय)

yāvat
whatever
sañjāyate
manifesting
kiñchit
anything
sattvam
being
sthāvara
unmoving
jaṅgamam
moving
kṣhetra
field of activities
kṣhetra-jña
knower of the field
sanyogāt
combination of
tat
that
viddhi
know
bharata-ṛiṣhabha
best of the Bharatas

भावार्थ

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! स्थावर और जंगम जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे उत्पन्न हुए समझो।

व्याख्या

श्रीकृष्ण एक सार्वभौमिक सिद्धांत बताते हैं: 'जो भी प्राणी जन्म लेता है, चल या अचल, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न जानो, हे भरतश्रेष्ठ।' श्रीकृष्ण एक व्यापक सार्वभौमिक कथन देते हैं। शंकराचार्य सार्वभौमिक सिद्धांत समझाते हैं: हर एक जीवित प्राणी, बिना अपवाद — सबसे सरल पौधे से सबसे जटिल मनुष्य तक — दो कारकों के संयोजन से अस्तित्व में आता है: 'क्षेत्र' (प्रकृति — शरीर) और 'क्षेत्र का ज्ञाता' (चेतन स्व)। न तो अकेला एक जीवित प्राणी उत्पन्न करता है। यह उनका संयोग है — चेतना भौतिक रूप से जुड़ी — जो हर जीवित प्राणी को बनाता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह सार्वभौमिक पहचान है कि हर जीवित प्राणी — सबसे सरल से सबसे जटिल तक — रूप से जुड़ी चेतना है। किसी भी जीवित चीज़ को देखो: घास का तिनका, एक कीट, एक पक्षी, दूसरा मनुष्य। हर एक, अपने सार में, वही संयोजन है। यह सब जीवन के साथ एक गहरी रिश्तेदारी को आधार देता है। तुम बाकी जीवन से मूल रूप से अलग प्रकार की चीज़ नहीं हो। यह सब जीवित चीज़ों के प्रति श्रद्धा का एक शक्तिशाली आधार है। सब जीवन के साथ उस रिश्तेदारी को पहचानो जिसके वह योग्य है।

भगवद्गीता 13.27 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह सार्वभौमिक पहचान है कि हर जीवित प्राणी — सबसे सरल से सबसे जटिल तक — रूप से जुड़ी चेतना है, वही दो सिद्धांत हर जगह संयुक्त। यह सब जीवन की एक गहन एकीकृत दृष्टि रखता है। किसी भी जीवित चीज़ को ध्यान से देखो: घास का तिनका, एक कीट, एक पक्षी, दूसरा मनुष्य। हर एक, अपने सार में, वही संयोजन है: पदार्थ का 'क्षेत्र' और चेतना का 'ज्ञाता', एक साथ जुड़े। रूप बहुत भिन्न हैं — पर अंतर्निहित संरचना समान है। यह सब जीवन के साथ एक गहरी रिश्तेदारी को आधार देता है। तुम बाकी जीवन से मूल रूप से अलग प्रकार की चीज़ नहीं हो। यह सब जीवित चीज़ों के प्रति श्रद्धा का एक शक्तिशाली आधार है। सब जीवित प्राणियों के साथ गहरी रिश्तेदारी पहचानो। सब जीवन को उस श्रद्धा से व्यवहार करो जिसके यह योग्य है।

भगवद्गीता 13.27 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट यह यूनिवर्सल रिकग्निशन है कि हर लिविंग बीइंग — सबसे सिंपलेस्ट से सबसे कॉम्प्लेक्स तक — फॉर्म से जॉइन्ड कॉन्शियसनेस है, वही दो प्रिंसिपल्स हर जगह कम्बाइन्ड। यह सब लाइफ की प्रोफाउंड यूनिफाइंग विज़न रखता है। किसी भी लिविंग चीज़ को देखो: घास का तिनका, एक इंसेक्ट, एक बर्ड, दूसरा ह्यूमन। हर एक, अपने एसेंस में, वही कॉम्बिनेशन है: मैटर का 'फील्ड' और कॉन्शियसनेस का 'नोअर', एक साथ जॉइन्ड। फॉर्म्स बहुत डिफर करते हैं — पर अंडरलाइंग स्ट्रक्चर सेम है। यह सब लाइफ के साथ एक डीप किनशिप को ग्राउंड करता है। तुम बाकी लाइफ से फंडामेंटली डिफरेंट किंड की चीज़ नहीं हो। यह सब लिविंग चीज़ों के प्रति रेवरेंस का पावरफुल बेसिस है। सब लिविंग बीइंग्स के साथ डीप किनशिप रिकग्नाइज़ करो। सब लाइफ को उस रेवरेंस से ट्रीट करो जिसके यह डिज़र्व करती है।

भगवद्गीता 13.27 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण एक बड़ा, सुंदर सत्य साझा करते हैं: हर एक जीवित चीज़ — हर पौधा, हर जानवर, हर व्यक्ति — एक साथ संयुक्त दो अद्भुत सामग्रियों से बनी है: एक 'शरीर' (क्षेत्र) और 'जागरूकता' (भीतर का देखने वाला)! सोचो: एक छोटी चींटी, एक ऊँचा पेड़, एक चंचल पिल्ला, तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त, तुम — हर जीवित चीज़ का एक शरीर है और भीतर जागरूकता की एक चिंगारी! शरीर बहुत अलग दिखते हैं — कुछ के पंख हैं, कुछ के पत्ते — पर हर एक के भीतर, वही अद्भुत जीवन और जागरूकता की चिंगारी है! इसका मतलब कुछ सुंदर है: तुम सब जीवित चीज़ों से गहराई से जुड़े हो! वही जीवन-चिंगारी जो तुम में है तुम्हारी खिड़की के बाहर पक्षी में है, बगीचे के फूलों में है! तो यह हमें सब जीवित प्राणियों के प्रति दयालु होना सिखाता है! सब जीवित चीज़ों के साथ दया से पेश आओ — हम सब अद्भुत रूप से जुड़े हैं!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर व प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद बताते हैं। वे यथार्थ ज्ञान, प्रकृति-पुरुष का स्वरूप और इनके विवेक से मोक्ष का वर्णन करते हैं।

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