अध्याय 10 · श्लोक 34— विभूति योग
Read this verse in English →गीता 10.34 श्रीकृष्ण को सर्व-ग्रासी मृत्यु और आगे आने वाले के स्रोत बताती है: वे यश, श्री, वाणी, स्मृति, बुद्धि, धृति और क्षमा हैं उनके स्त्रीलिंग रूपों में। वे हर अंत और हर आरम्भ पर खड़े हैं।
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥
लिप्यंतरण
mṛityuḥ sarva-haraśh chāham udbhavaśh cha bhaviṣhyatām kīrtiḥ śhrīr vāk cha nārīṇāṁ smṛitir medhā dhṛitiḥ kṣhamā
शब्दार्थ (अन्वय)
- mṛityuḥ
- — death
- sarva-haraḥ
- — all-devouring
- cha
- — and
- aham
- — I
- udbhavaḥ
- — the origin
- cha
- — and
- bhaviṣhyatām
- — those things that are yet to be
- kīrtiḥ
- — fame
- śhrīḥ
- — prospective
- vāk
- — fine speech
- cha
- — and
- nārīṇām
- — amongst feminine qualities
- smṛitiḥ
- — memory
- medhā
- — intelligence
- dhṛitiḥ
- — courage
- kṣhamā
- — forgiveness
भावार्थ
सबका हरण करनेवाली मृत्यु और उत्पन्न होनेवालोंका उभ्दव मैं हूँ तथा स्त्री-जातिमें कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हूँ।
व्याख्या
"मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्, कीर्तिः श्रीश्च वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।" — मैं सर्वहारी मृत्यु हूँ, और भविष्य में होने वाले सबका उद्गम; और स्त्री-गुणों में मैं कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ। श्रीकृष्ण प्रभावशाली विस्तार के साथ जारी रखते हैं। 'मृत्युः सर्वहरः च अहम्' — मैं सबको हरने वाली मृत्यु हूँ। 'उद्भवः च भविष्यताम्' — और मैं होने वाले सबका उद्गम भी हूँ। श्रीकृष्ण फिर दोनों ध्रुव समेटते हैं (cf. 9.19)। फिर वे सात सुंदर गुण नाम करते हैं: कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति, और क्षमा। दो अंतर्दृष्टियाँ। पहली, मृत्यु और नए उद्गम दोनों का आलिंगन: अंत कभी अंतिम शब्द नहीं — वे उसी दिव्य पूर्णता के भीतर नई शुरुआतों से संतुलित हैं। दूसरी, संजोए आंतरिक गुणों की सूची — स्मृति, बुद्धि, धृति, धैर्य — दिव्य महिमाओं के रूप में: धैर्य, दृढ़ता विकसित करना अपने भीतर दिव्य महिमा बढ़ाना है।
भगवद्गीता 10.34 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
इस समृद्ध श्लोक में दो अंतर्दृष्टियाँ उभरती हैं। पहली, श्रीकृष्ण फिर विपरीतों को जोड़ते हैं: 'मैं सबको हरने वाली मृत्यु हूँ और होने वाले सबका उद्गम भी।' हर अंत नए उद्गम से जुड़ा है — मृत्यु और जन्म एक वास्तविकता के दो चेहरे हैं। यह सच में स्थिर करने वाला है: अंत कभी अंतिम शब्द नहीं। जब कुछ समाप्त होता है, यह उसी पूर्णता के भीतर एक लय का हिस्सा है। दूसरी, श्रीकृष्ण संजोए आंतरिक गुण नाम करते हैं — स्मृति, बुद्धि, धृति, धैर्य — दिव्य महिमाओं के रूप में। धैर्य, दृढ़ता विकसित करना केवल आत्म-सुधार नहीं — यह अपने भीतर दिव्य महिमा बढ़ाना है। और हिम्मत रखो: हर अंत एक शुरुआत भी है।
भगवद्गीता 10.34 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
इस रिच श्लोक में दो इनसाइट्स स्टैंड आउट करती हैं। फर्स्ट, श्रीकृष्ण फिर ऑपोज़िट्स यूनाइट करते हैं: 'मैं ऑल-डिवाउरिंग डेथ हूँ AND होने वाले सबका ओरिजिन भी।' हर एंडिंग नए ओरिजिनेशन से पेयर्ड है — डेथ और बर्थ एक रियलिटी के दो फेस हैं। यह स्टेडीइंग है: एंडिंग्स कभी फाइनल वर्ड नहीं। जब कुछ एंड होता है, यह उसी होलनेस के भीतर एक रिदम का हिस्सा है जो ALSO नया ओरिजिनेशन लाती है। सेकंड, श्रीकृष्ण चेरिश्ड इनर क्वालिटीज़ नेम करते हैं — मेमोरी, इंटेलिजेंस, स्टेडफास्टनेस, पेशेंस — डिवाइन ग्लोरीज़ के रूप में। पेशेंस, फोर्टिट्यूड बिल्ड करना खुद में डिवाइन ग्लोरी ग्रो करना है। हर एंडिंग एक बिगिनिंग भी है।
भगवद्गीता 10.34 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण यहाँ दो बड़ी चीज़ें साझा करते हैं! पहला, वे कहते हैं वे मृत्यु (जो अंत में चीज़ें ले जाती है) और आने वाली हर नई चीज़ की शुरुआत दोनों हैं! तो अंत और नई शुरुआतें दोनों भगवान का हिस्सा हैं — जब एक चीज़ समाप्त होती है, कुछ नया शुरू होता है! यह सांत्वना देने वाला है: अंत कभी पूरी कहानी नहीं, क्योंकि नई शुरुआतें हमेशा आती हैं, जैसे सर्दी वसंत में बदलती है! दूसरा, श्रीकृष्ण स्मृति, बुद्धि, धैर्य, दृढ़ता, और अच्छा बोलने जैसे अद्भुत गुण गिनाते हैं — और कहते हैं ये सब उनकी महिमाएँ हैं! इसका मतलब जब तुम अधिक धैर्यवान, समझदार, स्थिर बनने पर काम करते हो — तुम अपने अंदर कुछ सच में पवित्र बढ़ा रहे हो!
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 10.34 का अर्थ क्या है?
श्रीकृष्ण सर्व-ग्रासी मृत्यु और आगे आने वाले के स्रोत हैं; वे यश, श्री, वाणी, स्मृति, बुद्धि, धृति और क्षमा हैं उनके स्त्रीलिंग रूपों में। वे हर अंत और हर आरम्भ पर खड़े हैं।
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं — वे प्रत्येक श्रेणी में श्रेष्ठ और सार रूप हैं। उन्हें सबका मूल जानकर भक्त का प्रेम पूर्ण समर्पण में बदल जाता है।
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ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 10.34 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 10.34 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
The Divine Life Society (Swami Sivananda)
The Divine Life Society — institutional home of Swami Sivananda, whose English translation is cited on this site.
Divine Life Society →