अध्याय 9 · श्लोक 3— राजविद्या राजगुह्य योग
Read this verse in English →अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥
लिप्यंतरण
aśhraddadhānāḥ puruṣhā dharmasyāsya parantapa aprāpya māṁ nivartante mṛityu-samsāra-vartmani
शब्दार्थ (अन्वय)
- aśhraddadhānāḥ
- — people without faith
- puruṣhāḥ
- — (such) persons
- dharmasya
- — of dharma
- asya
- — this
- parantapa
- — Arjun, conqueror the enemies
- aprāpya
- — without attaining
- mām
- — me
- nivartante
- — come back
- mṛityu
- — death
- samsāra
- — material existence
- vartmani
- — in the path
भावार्थ
हे परंतप! इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।
व्याख्या
"अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप, अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि।" — हे परंतप, इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले लोग, मुझे प्राप्त किए बिना, मृत्यु और संसार के मार्ग में लौटते हैं। सर्वोच्च ज्ञान की प्रशंसा (9.1-2) के बाद, श्रीकृष्ण इसमें श्रद्धा की कमी का परिणाम गंभीरता से बताते हैं। 'अश्रद्दधानाः पुरुषाः धर्मस्य अस्य' — जिन लोगों को इस धर्म में श्रद्धा नहीं — 'अप्राप्य माम्' — मुझे प्राप्त किए बिना — 'निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि' — मृत्यु और पुनर्जन्म के मार्ग में लौटते हैं। शंकराचार्य समझाते हैं कि 'श्रद्धा' अनिवार्य पहला कदम है। ध्यान दो कि यह किसी क्रोधित देवता द्वारा थोपा दंड नहीं। यह एक स्वाभाविक परिणाम है: अगर तुम्हें किसी पथ में श्रद्धा नहीं, तुम उस पर नहीं चलोगे। यह श्लोक आध्यात्मिक जीवन में श्रद्धा की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करता है। द्वार खुला है, पथ आनंदपूर्ण है — पर तुम्हें इससे गुज़रने के लिए पर्याप्त श्रद्धा चाहिए।
भगवद्गीता 9.3 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण पथ में श्रद्धा न होने का परिणाम गंभीरता से बताते हैं: तुम बस वहाँ नहीं पहुँचते जहाँ यह ले जाता है। महत्त्वपूर्ण रूप से, यह क्रोधित देवता का दंड नहीं — यह स्वाभाविक परिणाम है। अगर तुम किसी पथ पर भरोसा नहीं करते कि उस पर चलो, तुम स्पष्ट रूप से उसके गंतव्य तक नहीं पहुँच सकते। सिद्धांत व्यापक रूप से सच है: 'श्रद्धा' किसी भी चीज़ से गहराई से जुड़ने का अनिवार्य पहला कदम है। यह अंध-विश्वास नहीं — यह सच में कोशिश करने के लिए पर्याप्त भरोसा है। तुम पानी में जाने से इनकार करते हुए तैरना नहीं सीख सकते।
भगवद्गीता 9.3 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण पथ में फेथ न होने का कॉन्सिक्वेंस सोबरली नोट करते हैं: तुम बस वहाँ नहीं पहुँचते जहाँ यह ले जाता है। क्रूशियली, यह एंग्री देवता का पनिशमेंट नहीं — यह नैचुरल कॉन्सिक्वेंस है। अगर तुम किसी पाथ पर इतना ट्रस्ट नहीं करते कि उस पर वॉक करो, तुम ऑब्वियसली उसके डेस्टिनेशन तक नहीं पहुँच सकते। 'श्रद्धा' किसी भी चीज़ से डीपली एंगेज करने का नॉन-नेगोशिएबल फर्स्ट स्टेप है। यह ब्लाइंड बिलीफ नहीं — सच में ट्राई करने के लिए पर्याप्त ट्रस्ट है। तुम पानी में जाने से इनकार करते हुए स्विम नहीं सीख सकते।
भगवद्गीता 9.3 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण कुछ ईमानदार साझा करते हैं: जिन लोगों को इस अद्भुत शिक्षा में कोई श्रद्धा या भरोसा नहीं वे लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते — वे उसी चक्र में घूमते रहते हैं। पर यह दंड नहीं! इसके बारे में सोचो: अगर तुम विश्वास नहीं करते कि कोई पथ तुम्हें कहीं अच्छी जगह ले जाएगा, तुम उस पर चलोगे ही नहीं — तो ज़ाहिर है तुम नहीं पहुँचोगे! यह कभी साइकिल चलाने की कोशिश न करने जैसा है क्योंकि तुम्हें यकीन है तुम गिरोगे! कोशिश करने के लिए थोड़ी श्रद्धा महत्त्वपूर्ण पहला कदम है!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण परम गुह्य ज्ञान प्रकट करते हैं — समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं फिर भी वे उनसे बद्ध नहीं। वे वचन देते हैं कि प्रेमपूर्ण भक्ति पापी को भी तार देती है, और प्रेम से अर्पित सब कुछ वे स्वीकार करते हैं।
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