अध्याय 4 · श्लोक 40— ज्ञान कर्म संन्यास योग
Read this verse in English →अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥
लिप्यंतरण
ajñaśh chāśhraddadhānaśh cha sanśhayātmā vinaśhyati nāyaṁ loko ’sti na paro na sukhaṁ sanśhayātmanaḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- ajñaḥ
- — the ignorant
- cha
- — and
- aśhraddadhānaḥ
- — without faith
- cha
- — and
- sanśhaya
- — skeptical
- ātmā
- — a person
- vinaśhyati
- — falls down
- na
- — never
- ayam
- — in this
- lokaḥ
- — world
- asti
- — is
- na
- — not
- paraḥ
- — in the next
- na
- — not
- sukham
- — happiness
- sanśhaya-ātmanaḥ
- — for the skeptical soul
भावार्थ
विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है।
व्याख्या
"अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति, नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।" — अज्ञानी, अश्रद्धालु और संशयात्मा का विनाश होता है। संशयात्मा के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख। ज्ञान प्राप्त करने की शर्तों का वर्णन करने के बाद, श्रीकृष्ण अब उनके विपरीत और उनके परिणाम बताते हैं: अज्ञान, श्रद्धाहीनता और पुराना संशय — तीनों विनाश की ओर ले जाते हैं। तीन एक क्रम में सूचीबद्ध हैं — अज्ञान जड़ है, अश्रद्धा उससे आती है, और अनसुलझा संशय फल है। संशयात्मा — संशय-स्वभाव वाला स्व — यहाँ मुख्य अवधारणा है। शंकराचार्य सावधानी से उत्पादक जिज्ञासा (परिप्रश्न, समझने के लिए प्रश्न करना) को विनाशकारी संशय से अलग करते हैं: यह वह संशय है जो कभी हल नहीं होता क्योंकि यह ईमानदारी से हल खोज नहीं रहा। यह एक मन का अभ्यस्त झिझकना है जो एक उपदेश उठाता है और तुरंत उसका खंडन करता है — एक स्थायी दोलन जो किसी भी दिशा में कोई प्रगति नहीं करता। फल असामान्य पूर्णता के साथ बताया गया है: न यह लोक (कोई व्यावहारिक प्रभावशीलता नहीं), न अगला (कोई आध्यात्मिक प्रगति नहीं), और किसी स्तर पर कोई सुख नहीं। यह दंड नहीं; यह वर्णन है कि चिरंतन विभाजित, आत्म-क्षुण्ण मन वास्तव में क्या अनुभव करता है।
भगवद्गीता 4.40 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
यहाँ वर्णित 'संशयात्मा' वह स्वस्थ संशयी नहीं है जो विचारों का परीक्षण करता है — गीता स्वयं इसे खुलकर प्रदर्शित करती है। यह वह चिरंतन दोलक है जो कभी प्रतिबद्ध नहीं हो सकता: हमेशा जिस पथ पर है उस पर दूसरा अनुमान लगाता है, हमेशा बेहतर विकल्प की खोज करता है, कोई भी पथ वास्तव में क्या प्रदान करता है यह खोजने के लिए कभी पर्याप्त गहरा नहीं जाता। फल ठीक वही है जो श्रीकृष्ण कहते हैं — न संसार में प्रभावी, न आध्यात्मिक रूप से प्रगतिशील, और वास्तव में दुखी।
भगवद्गीता 4.40 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण जिस संशय के बारे में चेतावनी दे रहे हैं वह हेल्दी स्केप्टिसिज्म नहीं है — गीता में वह एनकरेज किया जाता है। यह क्रोनिक इन्डिसिज़न लूप है: एक पथ उठाओ, तुरंत दूसरा अनुमान लगाओ, छोड़ दो, दूसरा उठाओ, फॉरेवर रिपीट। कोई भी पथ एक्चुअली क्या ऑफर करता है यह फाइंड करने के लिए कभी पर्याप्त डीप नहीं जाना। कमिटमेंट ट्रूथ-सीकिंग का दुश्मन नहीं है। इसके लिए रिक्वायर्ड है।
भगवद्गीता 4.40 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण बताते हैं कि अगर कोई हमेशा संशयी रहे — कभी तय न करे, हमेशा हर विकल्प पर दूसरा अनुमान लगाए — वह हर तरह से दुखी हो जाता है! अच्छे प्रश्न पूछना बढ़िया है। पर बिना कभी किसी चीज़ के प्रति प्रतिबद्ध हुए हमेशा आगे-पीछे जाने का मतलब है तुम कुछ भी आनंद नहीं ले सकते या प्रगति नहीं कर सकते।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण इस योग की परम्परा और अवतार के सिद्धांत का वर्णन करते हैं — धर्म की स्थापना हेतु युग-युग में अवतरण। कर्म में अकर्म, विविध यज्ञ तथा ज्ञानयज्ञ की श्रेष्ठता बताई गई है।
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