अध्याय 9 · श्लोक 28— राजविद्या राजगुह्य योग
Read this verse in English →शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥
लिप्यंतरण
śhubhāśhubha-phalair evaṁ mokṣhyase karma-bandhanaiḥ sannyāsa-yoga-yuktātmā vimukto mām upaiṣhyasi
शब्दार्थ (अन्वय)
- śhubha aśhubha phalaiḥ
- — from good and bad results
- evam
- — thus
- mokṣhyase
- — you shall be freed
- karma
- — work
- bandhanaiḥ
- — from the bondage
- sanyāsa-yoga
- — renunciation of selfishness
- yukta-ātmā
- — having the mind attached to me
- vimuktaḥ
- — liberated
- mām
- — to me
- upaiṣhyasi
- — you shall reach
भावार्थ
इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ (विहित) और अशुभ (निषिद्ध) सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे तू मुक्त हो जायगा। ऐसे अपनेसहित सब कुछ मेरे अर्पण करनेवाला और सबसे मुक्त हुआ तू मेरेको प्राप्त हो जायगा।
व्याख्या
"शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः, संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि।" — इस प्रकार तुम शुभ और अशुभ फल देने वाले कर्म-बंधनों से मुक्त हो जाओगे। संन्यास-योग में युक्त मन से, मुक्त होकर, तुम मुझे प्राप्त होगे। श्रीकृष्ण 9.27 में सिखाए अभ्यास (सब कर्म दिव्य को अर्पित करना) का मुक्तिदायक परिणाम समझाते हैं। 'शुभाशुभफलैः एवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः' — इस प्रकार, तुम कर्म-बंधनों से मुक्त होगे जो शुभ और अशुभ दोनों फल देते हैं। यह सूक्ष्म और महत्त्वपूर्ण बिंदु है। सामान्य कर्म दो तरह से बाँधता है: 'बुरे' कर्म नकारात्मक परिणामों से बाँधते हैं, पर 'अच्छे' कर्म भी बाँधते हैं — अपने सकारात्मक परिणामों से। पर जब सब कर्म बिना आसक्ति के दिव्य को अर्पित किया जाता है, न अच्छा न बुरा फल बाँधता है। यह श्लोक 9.27 के सरल अभ्यास का गहन फल प्रकट करता है। सबसे सुलभ अभ्यास उच्चतम फल देता है।
भगवद्गीता 9.28 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण एक सूक्ष्म और महत्त्वपूर्ण सत्य प्रकट करते हैं: सामान्य कर्म दो तरह से बाँधता है — केवल 'बुरे' कर्म नकारात्मक परिणामों से नहीं, बल्कि 'अच्छे' कर्म भी बाँधते हैं, उन सकारात्मक परिणामों से जो तुम्हें पुरस्कार अर्जित करने के चक्र से जकड़ते हैं। पर सब कुछ दिव्य को अर्पित करना तुम्हें दोनों से मुक्त करता है। गहरी अंतर्दृष्टि: यहाँ तक कि 'अच्छी' आसक्तियाँ भी तुम्हें फँसा सकती हैं। सच्ची स्वतंत्रता केवल बुरे परिणामों से बचना नहीं; यह परिणामों पर अपनी पकड़ पूरी तरह छोड़ना है। सबसे सुलभ अभ्यास उच्चतम स्वतंत्रता देता है: सब कुछ अर्पण के रूप में करो, कुछ पर पकड़ मत रखो, और तुम मुक्त हो।
भगवद्गीता 9.28 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण एक सटल, इम्पॉर्टेंट ट्रुथ रिवील करते हैं: ऑर्डिनरी एक्शन तुम्हें TWO तरह से बाइंड करता है — केवल 'बुरे' एक्शन्स नेगेटिव कॉन्सिक्वेंसेज़ से नहीं, बल्कि 'अच्छे' एक्शन्स भी बाइंड करते हैं, उन पॉज़िटिव रिज़ल्ट्स से जो तुम्हें रिवॉर्ड्स के साइकिल से चेन करते हैं। पर सब कुछ डिवाइन को ऑफर करना तुम्हें दोनों से फ्री करता है। डीपर इनसाइट: यहाँ तक कि 'गुड' अटैचमेंट्स भी ट्रैप कर सकती हैं। रियल फ्रीडम सिर्फ बैड आउटकम्स डॉज करना नहीं; यह आउटकम्स पर ग्रिप पूरी तरह लूज़ करना है। सब कुछ ऑफरिंग के रूप में करो, कुछ पर ग्रास्प मत करो, और तुम फ्री हो।
भगवद्गीता 9.28 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण सब कुछ भगवान को अर्पित करने का अद्भुत पुरस्कार साझा करते हैं (पिछले श्लोक से)! वे कहते हैं ऐसा करना तुम्हें अपने कर्मों से फँसने से मुक्त करता है — बुरे और अच्छे दोनों! यहाँ आश्चर्यजनक हिस्सा है: यहाँ तक कि अच्छे कर्म भी हमें फँसा सकते हैं अगर हम उन्हें केवल पुरस्कार पाने और गर्वित महसूस करने के लिए करें! पर जब तुम सब कुछ भगवान को प्रेमपूर्ण उपहार के रूप में करते हो, बिना यह चिंता किए कि तुम्हें क्या मिलेगा, तब कुछ भी तुम्हें नहीं फँसाता — तुम सच में मुक्त हो जाते हो! सबसे आसान अभ्यास सबसे बड़ी स्वतंत्रता देता है!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण परम गुह्य ज्ञान प्रकट करते हैं — समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं फिर भी वे उनसे बद्ध नहीं। वे वचन देते हैं कि प्रेमपूर्ण भक्ति पापी को भी तार देती है, और प्रेम से अर्पित सब कुछ वे स्वीकार करते हैं।
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