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अध्याय 9 · श्लोक 16राजविद्या राजगुह्य योग

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गीता 9.16 दिव्य उपस्थिति की एक व्यापक दृष्टि आरम्भ करती है: मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही आहुति, मैं ही औषधि, मैं ही मंत्र, मैं ही अग्नि और हवन। दिव्यता किसी दूर स्थान में नहीं — वह हर उस चीज़ का सार है जो हम करते हैं।

श्लोक 16 / 34

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्। मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥

लिप्यंतरण

ahaṁ kratur ahaṁ yajñaḥ svadhāham aham auṣhadham mantro ’ham aham evājyam aham agnir ahaṁ hutam

शब्दार्थ (अन्वय)

aham
I
kratuḥ
Vedic ritual
aham
I
yajñaḥ
sacrifice
svadhā
oblation
aham
I
aham
I
auṣhadham
medicinal herb
mantraḥ
Vedic mantra
aham
I
aham
I
eva
also
ājyam
clarified butter
aham
I
agniḥ
fire
aham
I
hutam
the act offering

भावार्थ

क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।

व्याख्या

"अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्, मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्।" — मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं औषध हूँ, मैं मंत्र हूँ, मैं ही आज्य (घृत) हूँ, मैं अग्नि हूँ, और मैं हवन हूँ। श्रीकृष्ण एक भव्य श्रृंखला (9.16-19) शुरू करते हैं, स्वयं को सब चीज़ों की अंतर्निहित वास्तविकता के रूप में प्रकट करते हुए, यज्ञ और अनुष्ठान के तत्त्वों से शुरू करते हुए। वे स्वयं को यज्ञ-कर्म के हर घटक से पहचानते हैं। शंकराचार्य गहन शिक्षा समझाते हैं: श्रीकृष्ण केवल यज्ञ के प्राप्तकर्ता नहीं बल्कि वास्तव में इसका हर एक तत्त्व हैं। पूरी यज्ञ प्रक्रिया में कुछ भी नहीं जो दिव्य से अन्य हो। यह श्लोक उपासक, उपासना, और उपास्य के बीच के स्पष्ट अलगाव को घोलना शुरू करता है। यह कुल दिव्य व्याप्ति का दर्शन है। हर तत्त्व, हर क्रिया अंततः एक दिव्य वास्तविकता है।

भगवद्गीता 9.16 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण एक लुभावनी श्रृंखला शुरू करते हैं, स्वयं को एक पवित्र कर्म के हर घटक के रूप में पहचानते हुए — अग्नि, भेंट, मंत्र, अर्पणकर्ता, और अर्पण का कार्य ही। शिक्षा कर्ता, करने, और किए के बीच के स्पष्ट अलगाव को घोलती है। यहाँ परिप्रेक्ष्य में एक गहन बदलाव उपलब्ध है: जब तुम एक प्रक्रिया के हर हिस्से में वही अंतर्निहित वास्तविकता पहचानते हो, 'मैं,' 'मेरी क्रिया,' और 'परिणाम' के बीच की कृत्रिम सीमाएँ नरम होने लगती हैं। इसे किसी भी चीज़ पर लागू करो जो तुम पूरे दिल से करते हो — पूर्ण लीनता के क्षणों में, कर्ता, करना, और किया एक निर्बाध गति बन जाते हैं।

भगवद्गीता 9.16 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण एक ब्रेथटेकिंग सीरीज़ शुरू करते हैं, स्वयं को एक सेक्रेड एक्ट के लिटरली हर कंपोनेंट के रूप में आइडेंटिफाई करते हुए — फायर, ऑफरिंग, चांट, अर्पणकर्ता, और ऑफरिंग का एक्ट ही। टीचिंग डूअर, डूइंग, और डन के बीच के अलगाव को डिज़ॉल्व करती है। यहाँ पर्सपेक्टिव शिफ्ट अवेलेबल है: जब तुम एक प्रोसेस के हर पार्ट में वही अंडरलाइंग रियलिटी रिकग्नाइज़ करते हो, 'मैं,' 'मेरी एक्शन,' और 'रिज़ल्ट' के बीच की बाउंड्रीज़ सॉफ्ट होती हैं। टोटल अब्ज़ॉर्प्शन के मोमेंट्स में — आर्ट, म्यूज़िक, डीप वर्क — डूअर, डूइंग, डन एक सीमलेस मूवमेंट बन जाते हैं। एथलीट्स इसे 'फ्लो' कहते हैं।

भगवद्गीता 9.16 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण कुछ अद्भुत साझा करना शुरू करते हैं — वे कहते हैं वे एक पवित्र समारोह में सब कुछ हैं! वे अग्नि हैं, भेंट हैं, मंत्र हैं, विशेष घी हैं, और अर्पण का कार्य भी! इसका हर एक हिस्सा भगवान है! यह यह खोजने जैसा है कि एक सुंदर गाने में, भगवान गायक हैं, शब्द हैं, संगीत हैं, और सुनना भी — यह सब! यह हमें कुछ अद्भुत दिखाता है: भगवान दुनिया में बस एक चीज़ नहीं — भगवान बिल्कुल हर चीज़ और हर क्रिया में उपस्थित हैं! जब तुम कुछ पूरे दिल से करते हो, सब कुछ एक सुंदर, जुड़ा पूर्ण बन जाता है!

सामान्य प्रश्न

भगवद्गीता 9.16 का अर्थ क्या है?

श्रीकृष्ण घोषित करते हैं कि वे ही यज्ञ हैं, आहुति, औषधि, मंत्र, अग्नि और हवन। दिव्यता पवित्र कर्म के तत्वों से ही एकरूप बताई गई है — उसके भीतर उपस्थित, उससे अलग नहीं।

यह श्लोक किसने कहा?

भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, नौवें अध्याय (राजविद्या योग) में, यह व्यापक वर्णन आरम्भ करते हुए कि दिव्यता सब चीज़ों में कैसे उपस्थित है।

गीता 9.16 आज के जीवन में कैसे उतारें?

यह पवित्र और साधारण के बीच की रेखा मिटा देती है। यदि दिव्यता हर कर्म का सार है, तो विशेष अवसरों के लिए सुरक्षित रखने के बजाय साधारण, रोज़मर्रा का काम भी श्रद्धा से छू सकता है।

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण परम गुह्य ज्ञान प्रकट करते हैं — समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं फिर भी वे उनसे बद्ध नहीं। वे वचन देते हैं कि प्रेमपूर्ण भक्ति पापी को भी तार देती है, और प्रेम से अर्पित सब कुछ वे स्वीकार करते हैं।

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प्रामाणिक स्रोत

ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।