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अध्याय 8 · श्लोक 9अक्षरब्रह्म योग

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श्लोक 9 / 28

कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः। सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥

लिप्यंतरण

kaviṁ purāṇam anuśhāsitāram aṇor aṇīyānsam anusmared yaḥ sarvasya dhātāram achintya-rūpam āditya-varṇaṁ tamasaḥ parastāt

शब्दार्थ (अन्वय)

kavim
poet
purāṇam
ancient
anuśhāsitāram
the controller
aṇoḥ
than the atom
aṇīyānsam
smaller
anusmaret
always remembers
yaḥ
who
sarvasya
of everything
dhātāram
the support
achintya
inconceivable
rūpam
divine form
āditya-varṇam
effulgent like the sun
tamasaḥ
to the darkness of ignorance
parastāt
beyond

भावार्थ

जो सर्वज्ञ, पुराण, शासन करनेवाला, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, सबका धारण-पोषण करनेवाला, अज्ञानसे अत्यन्त परे, सूर्यकी तरह प्रकाशस्वरूप -- ऐसे अचिन्त्य स्वरूपका चिन्तन करता है।

व्याख्या

यह श्लोक ध्यान की सर्वोच्च वस्तु का वर्णन करता है: 'जो सर्वज्ञ, पुरातन, शासक, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर, सबके धाता, अचिंत्य रूप, सूर्य-वर्ण, सब अंधकार से परे का ध्यान करता है...' (8.10 में जारी)। श्रीकृष्ण 8.8 के 'परम दिव्य पुरुष' की प्रकृति का वर्णन करते हैं, ध्यानी को चिंतन की समृद्ध वस्तु देते हुए। वर्णन ढेर हो जाते हैं: 'कविम्' — सर्वज्ञ; 'पुराणम्' — पुरातन, अनादि; 'अनुशासितारम्' — शासक; 'अणोरणीयांसम्' — सूक्ष्म से सूक्ष्मतर; 'सर्वस्य धातारम्' — सबका धाता; 'अचिन्त्यरूपम्' — अचिंत्य रूप; 'आदित्यवर्णम्' — सूर्य-वर्ण, स्वयं-प्रकाशित; 'तमसः परस्तात्' — सब अंधकार से परे। शंकराचार्य ध्यान देते हैं कि ये वर्णन दिव्य को सीमित करने के लिए नहीं बल्कि ध्यानी के मन को असीम वास्तविकता की ओर निर्देशित करने के लिए हैं। प्रत्येक गुण सर्वोच्च के एक भिन्न आयाम पर एक खिड़की खोलता है।

भगवद्गीता 8.9 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण ध्यानी को चिंतन के लिए एक समृद्ध, परतदार वस्तु देते हैं — दिव्य सर्वज्ञ, समय से परे पुरातन, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर, सबका धाता, स्वयं-प्रकाशित, सब अंधकार से परे। विधि पर ध्यान दो: किसी अस्पष्ट शून्य पर ध्यान करने के बजाय, तुम्हें ऐसे संकेत दिए जाते हैं जो मन को किसी असीम की ओर उठाते हैं। यहाँ धर्मनिरपेक्ष चिंतन के लिए भी बुद्धि है: मन तब बेहतर बसता और उन्नत होता है जब उसे आराम करने के लिए कुछ सच में योग्य और विस्तृत दिया जाए। विशालता का चिंतन स्वाभाविक रूप से छोटी चिंताओं की पकड़ ढीली करता है।

भगवद्गीता 8.9 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण मेडिटेटर को कंटेम्प्लेट करने के लिए एक रिच, लेयर्ड चीज़ देते हैं — डिवाइन ऑल-नोइंग, टाइम से परे एंशिएंट, सबटलेस्ट से सबटलर, सबका सपोर्टर, सेल्फ-ल्यूमिनस, सब डार्कनेस से परे। मेथड नोटिस करो: किसी वेग नथिंग पर मेडिटेट करने के बजाय, तुम्हें एवोकेटिव पॉइंटर्स दिए जाते हैं जो माइंड को किसी बाउंडलेस की ओर लिफ्ट करते हैं। माइंड तब बेहतर सेटल होता है जब उसे रेस्ट करने के लिए कुछ वर्दी और एक्सपैंसिव दिया जाए। वास्टनेस का कंटेम्प्लेशन छोटी एंग्ज़ायटीज़ की ग्रिप ढीली करता है।

भगवद्गीता 8.9 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण उस अद्भुत भगवान का वर्णन करते हैं जिनके बारे में हम ध्यान करते समय सोच सकते हैं! भगवान हैं: सर्वज्ञ (सब कुछ जानते हैं!), पुरातन (समय से भी पुराने!), सबके शासक, सबसे छोटी चीज़ से भी छोटे और पूरे ब्रह्माण्ड को थामने वाले, सूरज की तरह उज्ज्वल चमकते, और सब अंधकार से परे! वाह! जब हम सोचते हैं कि भगवान कितने अद्भुत और विशाल हैं, हमारी छोटी चिंताएँ छोटी लगती हैं, और हमारे हृदय बड़े और शांत महसूस करते हैं! अपने मन को सुंदर, उज्ज्वल विचारों पर आराम करने दो!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म आदि की परिभाषा देते हैं और बताते हैं कि अन्तकाल का स्मरण अगली गति निर्धारित करता है। शुक्ल और कृष्ण मार्ग तथा निरंतर ईश्वर-स्मरण का महत्त्व बताया गया है।

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