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अध्याय 8 · श्लोक 4अक्षरब्रह्म योग

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श्लोक 4 / 28

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥

लिप्यंतरण

adhibhūtaṁ kṣharo bhāvaḥ puruṣhaśh chādhidaivatam adhiyajño ’ham evātra dehe deha-bhṛitāṁ vara

शब्दार्थ (अन्वय)

adhibhūtam
the ever changing physical manifestation
kṣharaḥ
perishable
bhāvaḥ
nature
puruṣhaḥ
the cosmic personality of God, encompassing the material creation
cha
and
adhidaivatam
the Lord of the celestial gods
adhiyajñaḥ
the Lord of all sacrifices
aham
I
eva
certainly
atra
here
dehe
in the body
deha-bhṛitām
of the embodied
vara
O best

भावार्थ

हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! क्षरभाव अर्थात् नाशवान् पदार्थको अधिभूत कहते हैं, पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी अधिदैव हैं और इस देहमें अन्तर्यामीरूपसे मैं ही अधियज्ञ हूँ।

व्याख्या

"अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्, अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।" — अधिभूत क्षर भाव है; अधिदैव पुरुष है; और हे देहधारियों में श्रेष्ठ, इस शरीर में अधियज्ञ मैं ही हूँ। श्रीकृष्ण अर्जुन द्वारा माँगी परिभाषाएँ पूरी करते हैं। 'अधिभूतं क्षरः भावः' — अधिभूत 'क्षर भाव,' नश्वर अस्तित्व है — बदलते, क्षयशील, मर्त्य घटना का पूरा क्षेत्र। 'पुरुषः च अधिदैवतम्' — अधिदैव 'पुरुष' है, ब्रह्मांडीय पुरुष, चेतन उपस्थिति जो ब्रह्मांडीय शक्तियों की अध्यक्षता करती है। 'अधियज्ञः अहम् एव अत्र देहे' — और अधियज्ञ 'अहम् एव,' श्रीकृष्ण स्वयं हैं, यहाँ 'शरीर में' उपस्थित। शंकराचार्य समझाते हैं: दिव्य, हर देहधारी प्राणी के भीतर निवास करते हुए, सब यज्ञ का सच्चा प्राप्तकर्ता है। आगे के अध्याय के लिए मुख्य सार: दिव्य 'शरीर में' उपस्थित है। यह घनिष्ठ दिव्य उपस्थिति मृत्यु के क्षण भी याद की जा सकती है।

भगवद्गीता 8.4 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण क्षेत्रों को परिभाषित करना समाप्त करते हैं, और मुख्य सार घनिष्ठ है: दिव्य 'यहाँ, शरीर में' उपस्थित है उस रूप में जो हर भेंट प्राप्त करता है। यह कोई दूर का देवता नहीं बल्कि अंतर्निवासी उपस्थिति है — बिल्कुल यहाँ, तुम्हारे अपने देहधारी जीवन के भीतर। तकनीकी शब्द हटाओ और इसका हृदय यह है: पवित्र केवल मंदिरों या दूर के स्वर्गों में नहीं; यह तुम्हारे भीतर रहता है और जो भी तुम ईमानदारी से अर्पित करते हो उसे प्राप्त करता है। किसी के लिए जिसने अपने प्रयास अनदेखे गायब होते महसूस किए, यह शांति से शक्तिशाली है।

भगवद्गीता 8.4 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण रेल्म्स डिफाइन करना फिनिश करते हैं, और की टेकअवे इंटिमेट है: डिवाइन 'राइट हियर, शरीर में' प्रेज़ेंट है उस रूप में जो हर ऑफरिंग रिसीव करता है। यह क्लाउड्स में दूर का देवता नहीं — यह इनड्वेलिंग प्रेज़ेंस है, तुम्हारी अपनी एम्बॉडीड लाइफ के भीतर। टेक्निकल टर्म्स हटाओ और इसका हार्ट यह है: सेक्रेड केवल टेम्पल्स में नहीं; यह तुम्हारे WITHIN रहता है। किसी के लिए जिसने अपना एफर्ट अनविटनेस्ड वैनिश होते फील किया, यह क्वायटली पावरफुल है।

भगवद्गीता 8.4 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण सब शब्द समझाना समाप्त करते हैं! वे कहते हैं बदलती भौतिक दुनिया 'अधिभूत' है, ब्रह्मांडीय दिव्य पुरुष 'अधिदैव' है, और सबसे अद्भुत — वे स्वयं हमारे शरीर के अंदर 'अधियज्ञ' के रूप में रहते हैं, वह जो प्यार से हमारी सब भेंट और अच्छे कर्म प्राप्त करता है! क्या यह अद्भुत नहीं? भगवान बस आसमान में दूर नहीं — भगवान तुम्हारे अंदर रहते हैं और तुम्हारा हर दयालु काम प्राप्त करते हैं! जो भी प्रेमपूर्ण चीज़ तुम अर्पित करते हो कभी नहीं खोती!

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म आदि की परिभाषा देते हैं और बताते हैं कि अन्तकाल का स्मरण अगली गति निर्धारित करता है। शुक्ल और कृष्ण मार्ग तथा निरंतर ईश्वर-स्मरण का महत्त्व बताया गया है।

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