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अध्याय 7 · श्लोक 30ज्ञान विज्ञान योग

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श्लोक 30 / 30

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः। प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥

लिप्यंतरण

sādhibhūtādhidaivaṁ māṁ sādhiyajñaṁ cha ye viduḥ prayāṇa-kāle ’pi cha māṁ te vidur yukta-chetasaḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

sa-adhibhūta
governing principle of the field of matter
adhidaivam
governing principle of the celestial gods
mām
me
sa-adhiyajñam
governing principle of the Lord all sacrificial performances
cha
and
ye
who
viduḥ
know
prayāṇa
of death
kāle
at the time
api
even
cha
and
mām
me
te
they
viduḥ
know
yukta-chetasaḥ
in full consciousness of me

भावार्थ

जो मनुष्य अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझे जानते हैं, वे युक्तचेता मनुष्य अन्तकालमें भी मुझे ही जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं।

व्याख्या

"साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः, प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः।" — जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित जानते हैं — वे युक्त चित्त वाले मृत्यु के समय भी मुझे जानते हैं। श्रीकृष्ण अध्याय 7 को वास्तविकता के कई और पहलू नाम करके समाप्त करते हैं जिन्हें साकार भक्त जानने आता है — और इस ज्ञान का सर्वोच्च फल प्रकट करते हैं: मृत्यु के क्षण में भी दिव्य की दृढ़ जागरूकता। जो श्रीकृष्ण को 'अधिभूत' (नश्वर भौतिक संसार का सिद्धांत), 'अधिदैव' (दिव्य/ब्रह्मांडीय शक्तियों का सिद्धांत), और 'अधियज्ञ' (यज्ञ का सिद्धांत) के अंतर्निहित वास्तविकता के रूप में जानते हैं — ऐसे ज्ञाता दिव्य को हर आयाम के नीचे एकल आधार के रूप में पकड़ते हैं। पराकाष्ठा वाक्यांश: 'प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः' — मृत्यु के समय, दृढ़ युक्त मन से, वे मुझे जानते हैं। यह अध्याय 8 के लिए पूर्णतः मंच तैयार करता है।

भगवद्गीता 7.30 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण अध्याय को किसी भी आंतरिक बोध की परम परीक्षा की ओर इशारा करते हुए समाप्त करते हैं: क्या यह मृत्यु के क्षण टिकता है? मृत्यु तब है जब मन सबसे अधिक बिखरने की सम्भावना रखता है — भय, दर्द, और सब परिचित की हानि से अभिभूत। साकार व्यक्ति, श्रीकृष्ण कहते हैं, तब भी स्थिर और जागरूक रहता है। यह किसी भी वास्तविक आंतरिक कार्य के लिए एक गहन मानक है: तुम अच्छे दिन कितने शांत हो यह नहीं, बल्कि क्या तुम्हारी समता तब टिकती है जब सब कुछ ढह रहा हो। अभी तुम जो विकसित करते हो वही उपलब्ध होगा जब यह सबसे अधिक मायने रखता है।

भगवद्गीता 7.30 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण चैप्टर को किसी भी इनर रियलाइज़ेशन के अल्टिमेट टेस्ट की ओर इशारा करते हुए एंड करते हैं: क्या यह डेथ के मोमेंट होल्ड करता है? डेथ तब है जब माइंड सबसे ज़्यादा स्कैटर होने की सम्भावना रखता है — फियर, पेन, सब फैमिलियर खोने से ओवरव्हेल्म्ड। रियलाइज़्ड व्यक्ति तब भी स्टेडी रहता है। यह बेंचमार्क है: गुड डे पर कितने ज़ेन हो नहीं, बल्कि क्या तुम्हारी इक्वैनिमिटी तब होल्ड करती है जब सब ढह रहा हो। अभी तुम जो कल्टिवेट करते हो वही अवेलेबल होगा जब यह सबसे ज़्यादा मैटर करता है।

भगवद्गीता 7.30 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण इस अध्याय को एक सुंदर, बहादुर विचार से समाप्त करते हैं! वे कहते हैं जो लोग सच में भगवान को सबके पीछे एक के रूप में जानते हैं — भौतिक संसार, स्वर्गीय शक्तियाँ, और हमारी सब भेंट — वे जीवन के बिल्कुल अंत में भी भगवान से जुड़े रहते हैं, जब उनका शरीर चला जाता है! यह गहरी श्रद्धा का परम संकेत है: सबसे कठिन क्षण में भी भगवान से शांत और जुड़े रहना। प्यारा सबक: जो प्रेम और बुद्धि तुम अभी बनाते हो वह तुम्हारे पूरे जीवन भर तुम्हारी शक्ति बनती है!

सम्बंधित श्लोक

अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण अपनी पराा और अपरा प्रकृति, समस्त सृष्टि में अपनी व्याप्ति, चार प्रकार के भक्त, तथा माया द्वारा सत्य के आवरण का वर्णन करते हैं।

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