अध्याय 5 · श्लोक 16— कर्म संन्यास योग
Read this verse in English →ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥
लिप्यंतरण
jñānena tu tad ajñānaṁ yeṣhāṁ nāśhitam ātmanaḥ teṣhām āditya-vaj jñānaṁ prakāśhayati tat param
शब्दार्थ (अन्वय)
- jñānena
- — by divine knowledge
- tu
- — but
- tat
- — that
- ajñānam
- — ignorance
- yeṣhām
- — whose
- nāśhitam
- — has been destroyed
- ātmanaḥ
- — of the self
- teṣhām
- — their
- āditya-vat
- — like the sun
- jñānam
- — knowledge
- prakāśhayati
- — illumines
- tat
- — that
- param
- — Supreme Entity
भावार्थ
परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान-(विवक-) के द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्यकी तरह परमतत्त्व परमात्माको प्रकाशित कर देता है।
व्याख्या
"ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः, तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्।" — पर जिनका आत्मज्ञान से अज्ञान नाश किया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य की तरह उस परम को प्रकाशित करता है। यह श्लोक 5.15 में वर्णित अंधकार का उत्तर देता है। अगर अज्ञान ज्ञान को ढकता है और मोह पैदा करता है, तो आवरण क्या हटाता है? ज्ञान — विशेष रूप से, आत्मा का ज्ञान जो मूल अज्ञान घोलता है। सूर्य-उपमा सटीक है: सूर्य दिन-प्रकाश नहीं बनाता — वह दिन-प्रकाश है। जब तुम बाधा हटाते हो (बादल, दीवारें), सूर्य का प्रकाश बस उपस्थित है। उसी तरह, जब अज्ञान नाश होता है, ज्ञान नया नहीं आता — यह प्रकट होता है जो सदा था। 'तत्परम्' — वह परम — आत्मा को पूर्णता में, ब्रह्म के साथ तादात्म्यित, संदर्भित करता है। शंकराचार्य बताते हैं कि यहाँ ज्ञान वैचारिक समझ नहीं बल्कि अपनी प्रकृति की प्रत्यक्ष पहचान है।
भगवद्गीता 5.16 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
सूर्य-उपमा आध्यात्मिक साधना में एक सामान्य भ्रम हल करती है: लक्ष्य कुछ नया प्राप्त करना नहीं बल्कि जो पहले से उपस्थित है उसे ढकने वाले को हटाना है। यह साधना को पूरी तरह पुनः तैयार करता है — एक नए स्व के निर्माण के रूप में नहीं बल्कि उन परतों को हटाने के रूप में जो स्पष्ट देखने को रोकती हैं। स्पष्टता अधिक आध्यात्मिक ज्ञान संचय से नहीं आती; यह उन मान्यताओं को छोड़ने से आती है जो जो सदा उपस्थित था उसकी सरलता छुपाती हैं।
भगवद्गीता 5.16 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
जब आत्मज्ञान द्वारा अज्ञान नाश होता है, ज्ञान सूर्य की तरह परम को प्रकाशित करता है। सूर्य दिन नहीं बनाता — वह दिन है। जब बादल (अज्ञान) हटते हैं, रोशनी पहले से थी। आत्मज्ञान के साथ भी: यह नया नहीं आता। यह प्रकट होता है जो सदा था। सारी आध्यात्मिक साधना बस बादल साफ कर रही है।
भगवद्गीता 5.16 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
जब बुद्धि हमारे भीतर के अज्ञान को नाश करती है, यह बादलों के पीछे से सूरज निकलने जैसा है। सूरज हमेशा था — बादल बस इसे छुपा रहे थे! जब न-जानने के 'बादल' हटते हैं, समझ की उज्ज्वल रोशनी सब पर चमकती है। आध्यात्मिक साधना बादल साफ करना सीखने जैसी है!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।
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