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अध्याय 18 · श्लोक 57मोक्ष संन्यास योग

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श्लोक 57 / 78

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥

लिप्यंतरण

chetasā sarva-karmāṇi mayi sannyasya mat-paraḥ buddhi-yogam upāśhritya mach-chittaḥ satataṁ bhava

शब्दार्थ (अन्वय)

chetasā
by consciousness
sarva-karmāṇi
every activity
mayi
to me
sannyasya
dedicating
mat-paraḥ
having me as the supreme goal
buddhi-yogam
having the intellect united with God
upāśhritya
taking shelter of
mat-chittaḥ
consciousness absorbed in me
satatam
always
bhava
be

भावार्थ

चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा।

व्याख्या

श्रीकृष्ण अर्जुन को मानसिक समर्पण सिखाते हैं: 'मन से सब कर्म मुझे समर्पित करते हुए, मुझे सर्वोच्च मानते हुए, बुद्धि-योग का आश्रय लेते हुए, अपना मन सदा मुझमें स्थिर रखो।' श्रीकृष्ण सब दिव्य को समर्पित करने का अभ्यास देते हैं। शंकराचार्य आंतरिक अभ्यास उजागर करते हैं: 'चेतसा... संन्यस्य' — मन से सब कर्म दिव्य को समर्पित करना। यह आंतरिक प्रकार का त्याग है — कर्म को बाहरी रूप से नहीं त्यागना, बल्कि भीतर से सब कर्म दिव्य को अर्पित करना, दिव्य को सर्वोच्च मानना, और मन को निरंतर इसकी ओर मोड़ना। गीता जो त्याग अंततः सिखाती है वह आंतरिक है: तुम कार्य करते रहते हो, पर तुम मानसिक रूप से इसे सब समर्पित करते हो। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि गीता जो त्याग अंततः सिखाती है उसकी प्रकृति है: यह आंतरिक और मानसिक है — 'मन से सब कर्म समर्पित करना' दिव्य को — न कि कर्म का बाहरी त्याग। यह पूरी शिक्षा का व्यावहारिक हृदय है। पूरी गीता में एक प्रश्न रहा है: 'त्याग' करने का वास्तव में क्या मतलब है? यहाँ यह सुंदर रूप से स्पष्ट किया गया है: तुम बाहरी रूप से कार्य करना बंद नहीं करते; तुम भीतर से अपना सब कर्म अपने से बड़े किसी को अर्पित करते हो। त्याग तुम्हारे आंतरिक झुकाव में होता है, तुम्हारी बाहरी गतिविधि में नहीं। यह वही कर्मों को पूरी तरह बदल देता है: बाहरी रूप से समान, भीतर से पूरी तरह अलग। सबक: सबसे गहरा छोड़ना अपनी गतिविधियों को बाहरी रूप से त्यागना नहीं; यह एक आंतरिक, मानसिक समर्पण है। तो जो तुम करते हो उसे अपने से बड़े किसी को मानसिक रूप से समर्पित करने का अभ्यास करो। बाहरी गतिविधि वही रहती है; आंतरिक झुकाव सब बदल देता है।

भगवद्गीता 18.57 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि गीता जो त्याग अंततः सिखाती है उसकी सटीक प्रकृति है: यह मूल रूप से आंतरिक और मानसिक है — 'मन से सब कर्म समर्पित करना' अपने से बड़े किसी को — और ज़ोर देकर कर्म और गतिविधि का बाहरी त्याग नहीं। यह सच में पूरी शिक्षा का व्यावहारिक हृदय है। पूरी गीता में एक निरंतर अंतर्निहित प्रश्न रहा है: 'त्याग' करने का वास्तव में क्या मतलब है? यहाँ यह अंततः सुंदर और व्यावहारिक रूप से स्पष्ट किया गया है: तुम बाहरी रूप से कार्य करना बंद नहीं करते या जीवन से नहीं हटते; बल्कि, तुम भीतर से अपना सब कर्म अपने से बड़े किसी को अर्पित करते हो, उसे सर्वोच्च मानते हुए, और मन को निरंतर इसकी ओर मोड़ते हुए। वास्तविक त्याग पूरी तरह तुम्हारे आंतरिक झुकाव में होता है, तुम्हारी बाहरी गतिविधि में नहीं। यह सूक्ष्म आंतरिक बदलाव वही कर्मों को पूरी तरह बदल देता है: बाहरी रूप से समान, भीतर से पूरी तरह अलग। सबक: सबसे गहरा छोड़ना अपनी गतिविधियों को बाहरी रूप से त्यागना नहीं; यह एक आंतरिक, मानसिक समर्पण है। तो जो तुम करते हो उसे अपने से बड़े किसी को मानसिक रूप से समर्पित करने का अभ्यास करो। बाहरी गतिविधि वही रहती है; आंतरिक झुकाव सब बदल देता है।

भगवद्गीता 18.57 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट गीता जो रिनन्सिएशन अंततः सिखाती है उसकी प्रिसाइज़ नेचर है: यह फंडामेंटली इनर और मेंटल है — 'मन से सब एक्शन्स डेडिकेट करना' अपने से बड़े किसी को — और एम्फेटिकली एक्शन का आउटर एबैंडनमेंट नहीं। यह सच में पूरी टीचिंग का प्रैक्टिकल हार्ट है। पूरी गीता में एक क्वेश्चन रहा है: 'रिनाउंस' करने का वास्तव में क्या मतलब है? यहाँ यह क्लियर किया गया है: तुम आउटवर्डली एक्ट करना बंद नहीं करते; बल्कि, तुम भीतर से अपना सब एक्शन अपने से बड़े किसी को ऑफर करते हो, और मन को निरंतर इसकी ओर मोड़ते हो। रियल रिनन्सिएशन तुम्हारे इनर ओरिएंटेशन में होता है, आउटर एक्टिविटी में नहीं। यह वही एक्शन्स को पूरी तरह बदल देता है: आउटवर्डली सेम, भीतर से पूरी तरह अलग — क्योंकि ओरिएंटेशन ग्रास्पिंग से ऑफरिंग में शिफ्ट हो गया है। सबक: सबसे डीप लेटिंग-गो अपनी एक्टिविटीज़ को आउटवर्डली एबैंडन करना नहीं; यह एक इनर, मेंटल डेडिकेशन है। तो जो तुम करते हो उसे अपने से बड़े किसी को मेंटली डेडिकेट करने का प्रैक्टिस करो। आउटर एक्टिविटी सेम रहती है; इनर ओरिएंटेशन सब बदल देता है।

भगवद्गीता 18.57 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण एक सुंदर आंतरिक अभ्यास सिखाते हैं: अपने सब कर्म करो, पर अपने मन और हृदय में, उन सबको भगवान को अर्पित करो! भगवान को सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ रखो, और जाते हुए अपना मन धीरे से भगवान की ओर मोड़े रखो। यहाँ अद्भुत विचार है: 'छोड़ना' या 'त्यागना' का मतलब यह नहीं कि तुम चीज़ें करना बंद कर दो! इसका मतलब तुम सब कुछ करते रहो — पर अपने हृदय के अंदर, तुम यह सब किसी बड़े और अच्छे को समर्पित करते हो! यह एक अंदरूनी बदलाव है, बाहरी नहीं! सोचो: कल्पना करो दो बच्चे दोनों अपना कमरा साफ कर रहे हैं। एक बड़बड़ाते हुए करता है, बस इनाम के लिए। दूसरा खुशी से करता है, सोचते हुए 'मैं यह प्रेम से एक उपहार के रूप में कर रहा हूँ।' वे बिल्कुल वही काम कर रहे हैं — पर अंदर, यह पूरी तरह अलग है! तो तुम्हें 'छोड़ने' के लिए अपनी गतिविधियाँ रोकने की ज़रूरत नहीं — तुम बस बदलते हो कि तुम उन्हें अंदर क्यों और कैसे करते हो! सब कुछ करो जो तुम सामान्य रूप से करते हो — पर इसे एक देने वाले हृदय से करो!

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अध्याय सन्दर्भ

सबसे बड़ा यह अध्याय समस्त गीता का सार है: संन्यास और त्याग का भेद, गुणों के अनुसार कर्म, स्वभावज कर्तव्य, और परम उपदेश — सब कुछ भगवान के शरण हो जाओ, वे समस्त पापों से मुक्त कर देंगे।

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