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अध्याय 18 · श्लोक 36मोक्ष संन्यास योग

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श्लोक 36 / 78

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥

लिप्यंतरण

sukhaṁ tv idānīṁ tri-vidhaṁ śhṛiṇu me bharatarṣhabha abhyāsād ramate yatra duḥkhāntaṁ cha nigachchhati yat tad agre viṣham iva pariṇāme ‘mṛitopamam tat sukhaṁ sāttvikaṁ proktam ātma-buddhi-prasāda-jam

शब्दार्थ (अन्वय)

sukham
happiness
tu
but
idānīm
now
tri-vidham
of three kinds
śhṛiṇu
hear
me
from me
bharata-ṛiṣhabha
Arjun, the best of the Bharatas
abhyāsāt
by practice
ramate
rejoices
yatra
in which
duḥkha-antam
end of all suffering
cha
and
nigachchhati
reaches yat—which
tat
that
agre
at first
viṣham iva
like poison
pariṇāme
in the end
amṛita-upamam
like nectar
tat
that
sukham
happiness
sāttvikam
in the mode of goodness
proktam
is said to be
ātma-buddhi
situated in self-knowledge
prasāda-jam
generated by the pure intellect

भावार्थ

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

व्याख्या

श्रीकृष्ण त्रिविध सुख का परिचय देते हैं: 'अब मुझसे सुनो, हे भरतश्रेष्ठ, वह त्रिविध सुख जिसमें कोई अभ्यास के माध्यम से आनंद पाता है, और दुःख के अंत तक पहुँचता है।' श्रीकृष्ण अंतिम त्रिविध विश्लेषण घोषित करते हैं — सुख का ही। शंकराचार्य महत्त्वपूर्ण वाक्यांश ध्यान देते हैं: सर्वोच्च सुख 'अभ्यास के माध्यम से' पहुँचा जाता है — यह तत्काल नहीं, दिया हुआ नहीं, बल्कि समय के साथ बार-बार अभ्यास के माध्यम से विकसित। और यह 'दुःख-अंत' की ओर ले जाता है — दुःख का अंत। यह वास्तविक, स्थायी सुख को एक विकसित क्षमता के रूप में फ्रेम करता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह गहन और व्यावहारिक दावा है कि सर्वोच्च सुख 'अभ्यास के माध्यम से' आता है — कि वास्तविक, गहरा सुख एक विकसित क्षमता है, समय के साथ बढ़ी, न कि ठोकर खाई या बस दी गई चीज़। यह सुख को पूरी तरह पुनः फ्रेम करता है। हम सुख को कुछ ऐसा सोचते हैं जो हमारे साथ होता है। पर गीता एक अलग और अधिक आशापूर्ण समझ की ओर इशारा करती है: सबसे गहरा सुख एक विकसित कौशल है। यह अत्यधिक सशक्त करने वाला है। अगर सुख विशुद्ध रूप से परिस्थिति का मामला होता, तुम भाग्य की दया पर होते। पर अगर सबसे गहरा सुख एक विकसित क्षमता है, तो यह काफी हद तक तुम्हारे हाथ में है। सबक: समझो कि सबसे गहरा सुख कुछ ऐसा नहीं जो बस तुम्हारे साथ अच्छे भाग्य से होता है — यह एक क्षमता है जो तुम अभ्यास से विकसित करते हो। सबसे गहरा आनंद बढ़ाया जाता है, पाया नहीं।

भगवद्गीता 18.36 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह गहन और सच में सशक्त करने वाला दावा है कि सर्वोच्च सुख 'अभ्यास के माध्यम से' आता है — कि वास्तविक, गहरा, स्थायी सुख एक विकसित क्षमता है, समय के साथ धैर्यपूर्वक बढ़ी, न कि बस ठोकर खाई या भाग्य द्वारा बस दी गई चीज़। यह सुख के पूरे प्रश्न को एक शक्तिशाली तरीके से पुनः फ्रेम करता है। हम दृढ़ता से सुख को कुछ ऐसा सोचते हैं जो हमारे साथ होता है — अच्छा भाग्य आता है, और हम खुश महसूस करते हैं। पर गीता एक अलग और कहीं अधिक आशापूर्ण समझ की ओर स्पष्ट इशारा करती है: सबसे गहरा सुख वास्तव में एक विकसित कौशल है, किसी अन्य कौशल की तरह अभ्यास के माध्यम से धीरे-धीरे बढ़ा। यह अत्यधिक सशक्त करने वाला है। अगर सुख विशुद्ध रूप से बाहरी परिस्थिति का मामला होता, तुम स्थायी रूप से भाग्य की दया पर होते। पर अगर सबसे गहरा सुख मूल रूप से एक विकसित क्षमता है, तो यह काफी हद तक तुम्हारे अपने हाथ में है। मुख्य शब्द 'अभ्यास' स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि यह सुख बनाया जाता है। सबक: समझो कि सबसे गहरा सुख एक क्षमता है जो तुम अभ्यास से सक्रिय रूप से विकसित करते हो। सबसे गहरा आनंद बढ़ाया जाता है, पाया नहीं।

भगवद्गीता 18.36 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट यह प्रोफाउंड और एम्पावरिंग क्लेम है कि हाईएस्ट हैप्पीनेस 'प्रैक्टिस के थ्रू' (अभ्यास) आती है — कि रियल, डीप, लास्टिंग हैप्पीनेस एक कल्टिवेटेड कैपेसिटी है, समय के साथ ग्रोन, न कि बस स्टम्बल्ड अपॉन या फॉर्च्यून द्वारा दी गई चीज़। यह हैप्पीनेस के पूरे क्वेश्चन को रीफ्रेम करता है। हम हैप्पीनेस को कुछ ऐसा सोचते हैं जो हमारे साथ होता है — गुड फॉर्च्यून आता है, और हम हैप्पी फील करते हैं। पर गीता एक डिफरेंट और होपफुल अंडरस्टैंडिंग की ओर पॉइंट करती है: डीपेस्ट हैप्पीनेस वास्तव में एक डेवलप्ड स्किल है। यह एम्पावरिंग है। अगर हैप्पीनेस प्योरली सर्कमस्टैंस का मैटर होती, तुम फॉर्च्यून की मर्सी पर होते। पर अगर डीपेस्ट हैप्पीनेस एक कल्टिवेटेड कैपेसिटी है, तो यह तुम्हारे अपने हाथ में है। की वर्ड 'अभ्यास' है। सबक: समझो कि डीपेस्ट हैप्पीनेस एक कैपेसिटी है जो तुम प्रैक्टिस से कल्टिवेट करते हो। डीपेस्ट जॉय ग्रोन है, फाउंड नहीं।

भगवद्गीता 18.36 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण कहते हैं: अब मैं तुम्हें तीन प्रकार के सुख के बारे में बताऊँगा! और वे कुछ अद्भुत कहते हैं: सबसे अच्छा सुख अभ्यास के माध्यम से आता है — और यह दुःख के अंत की ओर ले जाता है! यहाँ अद्भुत, सशक्त करने वाला विचार है: अधिकांश लोग सोचते हैं सुख बस भाग्य है — अच्छी चीज़ें होती हैं और तुम खुश महसूस करते हो। जैसे सुख बस कुछ है जो तुम्हारे साथ होता है, तुम्हारे नियंत्रण से बाहर! पर श्रीकृष्ण कुछ अलग और कहीं अधिक आशापूर्ण कहते हैं: सबसे गहरा सुख एक कौशल है जिसका तुम अभ्यास कर सकते हो और बेहतर हो सकते हो — बिल्कुल पियानो, फुटबॉल, या ड्राइंग सीखने की तरह! सोचो यह कितना अद्भुत है! अगर सुख केवल भाग्य होता, तुम्हें बस अच्छे भाग्य की उम्मीद करनी होती। पर अगर सुख एक कौशल है, तो तुम इसे बना सकते हो — चाहे तुम्हारे चारों ओर कुछ भी हो रहा हो! तो बस इंतज़ार मत करो — तुम वास्तव में गहरे सुख का अभ्यास कर सकते हो!

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अध्याय सन्दर्भ

सबसे बड़ा यह अध्याय समस्त गीता का सार है: संन्यास और त्याग का भेद, गुणों के अनुसार कर्म, स्वभावज कर्तव्य, और परम उपदेश — सब कुछ भगवान के शरण हो जाओ, वे समस्त पापों से मुक्त कर देंगे।

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