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अध्याय 18 · श्लोक 39मोक्ष संन्यास योग

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श्लोक 39 / 78

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥

लिप्यंतरण

yad agre chānubandhe cha sukhaṁ mohanam ātmanaḥ nidrālasya-pramādotthaṁ tat tāmasam udāhṛitam

शब्दार्थ (अन्वय)

yat
which
agre
from beginning
cha
and
anubandhe
to end
cha
and
sukham
happiness
mohanam
illusory
ātmanaḥ
of the self
nidrā
sleep
ālasya
indolence
pramāda
negligence
uttham
derived from
tat
that
tāmasam
in the mode of ignorance
udāhṛitam
is said to be

भावार्थ

निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है।

व्याख्या

श्रीकृष्ण तामसिक सुख का वर्णन करते हैं: 'वह सुख जो आरंभ और अंत दोनों में स्व को भ्रमित करता है, नींद, आलस्य, और प्रमाद से उत्पन्न — वह तामसिक घोषित किया जाता है।' श्रीकृष्ण सुख का सबसे निम्न रूप देते हैं। शंकराचार्य अन्य दो से अंतर उजागर करते हैं: सात्त्विक सुख कड़वा-फिर-मीठा है, राजसिक मीठा-फिर-कड़वा, पर तामसिक सुख पूरे समय भ्रमित करता है — आरंभ और अंत दोनों में। शुरुआत में भी कोई वास्तविक मिठास नहीं; यह एक झूठा, धुँधला 'सुख' है जो आरंभ से अंत तक भ्रमित करता है। और इसका स्रोत बताने वाला है: नींद, आलस्य, प्रमाद। यह मात्र विस्मृति, सुन्न करने, चेक-आउट करने का 'सुख' है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि एक नकली 'सुख' की पहचान है जो वास्तव में बस विस्मृति और सुन्न करना है — सुखद-प्रतीत पर शुरू से अंत तक भ्रमित करता, वास्तविक आनंद के बजाय मंदता से उठता। यह दोनों अन्य प्रकारों से महत्त्वपूर्ण रूप से अलग है। तामसिक 'सुख' पूरे रास्ते नकली है। यह बिल्कुल वास्तविक सुख नहीं बल्कि चेक-आउट करने, सुन्न करने, विस्मृति में डूबने का झूठा आराम है। यह सुन्न करने वाले 'आरामों' की आधुनिक महामारी का वर्णन करता है जो वास्तव में आनंददायक नहीं पर विश्राम के लिए भ्रमित किए जाते हैं: मन रहित स्क्रॉलिंग के घंटे, अधिक सोना जो पुनर्स्थापित नहीं करता। सबक: मात्र सुन्न करने और विस्मृति के नकली 'सुख' को पहचानो। वास्तविक विश्राम और तामसिक सुन्न करने के बीच अंतर बताना सीखो। जब तुम्हारा 'विश्राम' तुम्हें पहले से अधिक थका, धुँधला छोड़ता है, तामसिक नकली-सुख पर संदेह करो।

भगवद्गीता 18.39 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि एक नकली 'सुख' की तीक्ष्ण पहचान है जो वास्तव में बस विस्मृति और सुन्न करना है — सतह पर सुखद-प्रतीत पर शुरू से अंत तक भ्रमित करता, किसी वास्तविक आनंद के बजाय मंदता से उठता। यह सुख के दोनों अन्य प्रकारों से महत्त्वपूर्ण और उपयोगी रूप से अलग है। सात्त्विक सुख कठिन-फिर-सच में-अद्भुत है; राजसिक मीठा-फिर-कड़वा; पर तामसिक 'सुख' पूरे रास्ते नकली और भ्रमित करने वाला है — यह आरंभ और अंत में समान रूप से भ्रमित करता है। यह बिल्कुल वास्तविक सुख नहीं, बल्कि चेक-आउट करने, सुन्न करने का झूठा आराम है। इसके स्रोत — नींद, आलस्य, प्रमाद — ठीक प्रकट करते हैं कि यह वास्तव में क्या है। यह सुन्न करने वाले 'आरामों' की आधुनिक महामारी का दर्दनाक सटीकता से वर्णन करता है। मुख्य शब्द 'भ्रमित करना' है। सबक: मात्र सुन्न करने और विस्मृति के नकली 'सुख' को स्पष्ट रूप से पहचानना सीखो। वास्तविक विश्राम और तामसिक सुन्न करने के बीच वास्तविक अंतर बताना सीखो। जब तुम्हारा 'विश्राम' तुम्हें पहले से अधिक थका, धुँधला छोड़ता है, तामसिक नकली-सुख पर दृढ़ता से संदेह करो।

भगवद्गीता 18.39 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट एक काउंटरफिट 'हैप्पीनेस' की शार्प रिकग्निशन है जो वास्तव में बस ऑब्लिवियन और नंबिंग है — सरफेस पर प्लेज़ेंट-सीमिंग पर स्टार्ट से फिनिश तक डिल्यूडिंग। सात्त्विक हैप्पीनेस हार्ड-फिर-वंडरफुल है; रजसिक स्वीट-फिर-बिटर; पर तामसिक 'हैप्पीनेस' पूरे रास्ते फेक है। इसके सोर्सेज़ — स्लीप, लेज़िनेस, नेग्लिजेंस — रिवील करते हैं कि यह क्या है: प्रेज़ेंट न होने का 'प्लेज़र'। यह नंबिंग 'कम्फर्ट्स' की मॉडर्न एपिडेमिक का वर्णन करता है: माइंडलेस स्क्रॉलिंग के घंटे, ओवरस्लीपिंग, ज़ोन्ड-आउट चेकिंग-आउट। की वर्ड 'डिल्यूडिंग' है। सबक: मात्र नंबिंग और ऑब्लिवियन के काउंटरफिट 'हैप्पीनेस' को रिकग्नाइज़ करो। रियल रेस्ट और तामसिक नंबिंग के बीच डिफरेंस बताना सीखो। जब तुम्हारा 'रिलैक्सेशन' तुम्हें पहले से ज़्यादा डिप्लीटेड छोड़ता है, तामसिक काउंटरफिट-हैप्पीनेस को सस्पेक्ट करो।

भगवद्गीता 18.39 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण 'सुख' का सबसे बुरा प्रकार वर्णन करते हैं — तामसिक! और यहाँ इसके बारे में चालाक बात है: यह पूरे रास्ते नकली है — यह तुम्हें आरंभ और अंत दोनों में धोखा देता है! यह वास्तव में सुख बिल्कुल नहीं! यह नींद, आलस्य, और ज़ोनिंग आउट से आता है — यह बस चेक-आउट करने और कोहरे में होने का 'आराम' है! यहाँ महत्त्वपूर्ण विचार है: अब तुम तीनों प्रकार देख सकते हो! सबसे अच्छा सुख पहले-कठिन-बाद-अद्भुत है। मध्य प्रकार पहले-स्वादिष्ट-बाद-बुरा है। पर यह सबसे बुरा प्रकार पूरे समय नकली है! सोचो: क्या तुमने कभी घंटों स्क्रीन पर स्क्रॉल किया, वास्तव में आनंद भी नहीं लेते, बस ज़ोन्ड आउट — और बाद में थका, खाली महसूस किया? वह तामसिक नकली-सुख है! तो नकली 'आराम' से सावधान रहो जो वास्तव में बस ज़ोनिंग आउट है! वास्तविक विश्राम वास्तव में तुम्हें तरोताज़ा महसूस कराता है। जब तुम्हारा 'विश्राम' तुम्हें बाद में बुरा महसूस कराता है, वह नकली प्रकार है!

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अध्याय सन्दर्भ

सबसे बड़ा यह अध्याय समस्त गीता का सार है: संन्यास और त्याग का भेद, गुणों के अनुसार कर्म, स्वभावज कर्तव्य, और परम उपदेश — सब कुछ भगवान के शरण हो जाओ, वे समस्त पापों से मुक्त कर देंगे।

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