अध्याय 14 · श्लोक 7— गुणत्रय विभाग योग
Read this verse in English →रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥
लिप्यंतरण
rajo rāgātmakaṁ viddhi tṛiṣhṇā-saṅga-samudbhavam tan nibadhnāti kaunteya karma-saṅgena dehinam
शब्दार्थ (अन्वय)
- rajaḥ
- — mode of passion
- rāga-ātmakam
- — of the nature of passion
- viddhi
- — know
- tṛiṣhṇā
- — desires
- saṅga
- — association
- samudbhavam
- — arises from
- tat
- — that
- nibadhnāti
- — binds
- kaunteya
- — Arjun, the son of Kunti
- karma-saṅgena
- — through attachment to fruitive actions
- dehinam
- — the embodied soul
भावार्थ
हे कुन्तीनन्दन ! तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाले रजोगुणको तुम रागस्वरूप समझो। वह कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण रजस् का वर्णन करते हैं: 'रजस् को जुनून के स्वभाव वाला जानो, लालसा और आसक्ति से उत्पन्न; यह देहधारी को कर्म की आसक्ति से कसकर बाँधता है, हे कुन्तीपुत्र।' श्रीकृष्ण दूसरे गुण, रजस् का वर्णन करते हैं। शंकराचार्य रजस् की गतिशीलता समझाते हैं। रजस् जुनून, बेचैन इच्छा, और तीव्र गतिविधि का गुण है। इसकी जड़ 'तृष्णा' (प्यास, लालसा) और 'संग' (आसक्ति) है — अंतहीन चाहना जो हमें पकड़ने, प्राप्त करने, हासिल करने चलाती है। और यह विशेष रूप से 'कर्म-संग' से बाँधता है — कर्म की आसक्ति, हमेशा कुछ करने की बाध्यकारी चाह। रजसी व्यक्ति बेचैन, इच्छा-चालित गतिविधि में फँसा है, कभी विश्राम नहीं कर पाता। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि रजस् का सटीक और असहज रूप से पहचानने योग्य वर्णन है — बेचैन लालसा और बाध्यकारी करने की ऊर्जा — विशेष रूप से आधुनिक जीवन के प्रमुख जाल के रूप में। ध्यान दो यह कितनी सटीकता से इतने समकालीन जीवन की बनावट का वर्णन करता है: निरंतर व्यस्त, बेचैन, चालित, हमेशा अगले लक्ष्य के लिए पहुँचते — और कभी संतुष्ट नहीं। हमारी पूरी संस्कृति अक्सर रजस् पर चलती और इसकी महिमा करती है। सबक: अपने जीवन में रजसी बाध्यता को नोटिस करो। विश्राम करना सीखो। रजसी ट्रेडमिल से उतरो।
भगवद्गीता 14.7 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि रजस् का सटीक और असहज रूप से पहचानने योग्य वर्णन है — बेचैन लालसा और बाध्यकारी करने की ऊर्जा — विशेष रूप से आधुनिक जीवन के प्रमुख जाल के रूप में। रजस् 'तृष्णा' और 'कर्म-संग' का गुण है: अंतहीन चाहना, विश्राम करने में असमर्थता, हमेशा कुछ करने, हासिल करने, अगली चीज़ का पीछा करने की बाध्यकारी चाह। ध्यान दो यह कितनी सटीकता से इतने समकालीन जीवन की बनावट का वर्णन करता है: निरंतर व्यस्त, बेचैन, चालित, हमेशा अगले लक्ष्य के लिए पहुँचते — और कभी संतुष्ट नहीं, क्योंकि रजस् अपनी प्रकृति से संतुष्टि में विश्राम नहीं कर सकता। हमारी पूरी संस्कृति अक्सर रजस् पर चलती और इसकी महिमा करती है — हसल, ग्राइंड का जश्न मनाती। सबक: अपने जीवन में रजसी बाध्यता को नोटिस करो। यह स्वस्थ कर्म जैसा नहीं। विश्राम करना सीखो। रजसी ट्रेडमिल से उतरो — मंद निष्क्रियता में नहीं, बल्कि शांति से बहने वाले कर्म में।
भगवद्गीता 14.7 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट रजस् का प्रिसाइज़ और अनकम्फर्टेबली रिकग्नाइज़ेबल डिस्क्रिप्शन है — रेस्टलेस क्रेविंग और कम्पल्सिव डूइंग की एनर्जी — स्पेसिफिकली मॉडर्न लाइफ के डॉमिनेंट ट्रैप के रूप में। रजस् 'तृष्णा' (क्रेविंग) और 'कर्म-संग' (एक्शन से अटैचमेंट) का गुण है: एंडलेस वॉन्टिंग, रेस्ट करने में असमर्थता, हमेशा कुछ करने, अचीव करने, अगली चीज़ चेज़ करने का कम्पल्सिव ड्राइव। नोटिस करो यह कितनी प्रिसाइज़ली इतने कंटेम्पररी लाइफ की टेक्सचर डिस्क्राइब करता है: परपेचुअली बिज़ी, रेस्टलेस, ड्रिवन, हमेशा अगले गोल के लिए रीचिंग — और कभी सैटिस्फाइड नहीं। हमारी पूरी कल्चर अक्सर रजस् पर चलती और इसे ग्लोरिफाई करती है — हसल, ग्राइंड को सेलिब्रेट करती। सबक: अपनी लाइफ में रजसिक कम्पल्शन को नोटिस करो। यह हेल्दी एक्शन जैसा नहीं। रेस्ट करना सीखो। रजसिक ट्रेडमिल से उतरो।
भगवद्गीता 14.7 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण दूसरी ऊर्जा, रजस् का वर्णन करते हैं — व्यस्त, बेचैन, हमेशा-और-चाहने वाली ऊर्जा! रजस् एक प्यास की तरह है जो कभी संतुष्ट नहीं होती: तुम कुछ चाहते हो, तुम इसे पाते हो, और फिर तुम तुरंत अगली चीज़ चाहते हो! यह तुम्हें बहुत व्यस्त और बेचैन रखता है, हमेशा पीछा करते, हमेशा करते, कभी जो तुम्हारे पास है उससे खुश नहीं। सोचो: क्या तुमने कभी एक खिलौना सच में चाहा, फिर पाया, थोड़ी देर खेला, और फिर तुरंत एक और खिलौना चाहा? वह रजस् है — चाहना जो कभी नहीं रुकता! रजस् तुम्हें दौड़ाता और दौड़ाता रखता है, पहिये पर हम्सटर की तरह जो कभी कहीं नहीं पहुँचता! अब, अच्छी चीज़ें करना और कड़ी मेहनत करना अद्भुत है! पर रजस् जाल तब है जब तुम कभी विश्राम नहीं कर सकते। तो सबक: धीमा होना और विश्राम करना ठीक है! तुम अभी खुश और शांत हो सकते हो!
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अध्याय सन्दर्भ
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