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अध्याय 14 · श्लोक 6गुणत्रय विभाग योग

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श्लोक 6 / 27

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥

लिप्यंतरण

tatra sattvaṁ nirmalatvāt prakāśhakam anāmayam sukha-saṅgena badhnāti jñāna-saṅgena chānagha

शब्दार्थ (अन्वय)

tatra
amongst these
sattvam
mode of goodness
nirmalatvāt
being purest
prakāśhakam
illuminating
anāmayam
healthy and full of well-being
sukha
happiness
saṅgena
attachment
badhnāti
binds
jñāna
knowledge
saṅgena
attachment
cha
also
anagha
Arjun, the sinless one

भावार्थ

हे पापरहित अर्जुन ! उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है। वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे (देहीको) बाँधता है।

व्याख्या

श्रीकृष्ण सत्त्व का वर्णन करते हैं: 'इनमें से, सत्त्व, शुद्ध होने से, प्रकाशमान और निर्दोष है; यह सुख की आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है, हे निष्पाप।' श्रीकृष्ण पहले गुण, सत्त्व का वर्णन करते हैं। शंकराचार्य सत्त्व के बंधन की सूक्ष्म प्रकृति समझाते हैं। सत्त्व तीन गुणों में सर्वोच्च है: शुद्ध, प्रकाशमान, स्वस्थ। यह सुख और ज्ञान उत्पन्न करता है। फिर भी — यहाँ सूक्ष्म बिंदु है — सत्त्व भी बाँधता है। कैसे? आसक्ति के माध्यम से: इसके लाए सुख की आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति। जब कोई सत्त्व की सुंदर शांति और स्पष्टता से आसक्त हो जाता है ('मैं शांत हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ'), यही आसक्ति एक महीन, सुनहरी जंजीर बन जाती है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह सूक्ष्म चेतावनी है कि अच्छी अवस्थाएँ भी तुम्हें बाँध सकती हैं — उनके प्रति आसक्ति के माध्यम से। सत्त्व सच में तीन गुणों में सर्वश्रेष्ठ है। पर गीता एक सूक्ष्म चेतावनी देती है: सत्त्व भी बाँधता है, विशेष रूप से इसके लाए सुख और स्पष्टता के प्रति आसक्ति के माध्यम से। हमारी अच्छी अवस्थाएँ भी एक सूक्ष्म जाल बन सकती हैं अगर हम उनसे आसक्त हो जाते हैं। सबक: स्पष्टता और आंतरिक शांति विकसित करो — पर इन अच्छी अवस्थाओं से भी आसक्त मत हो। प्रकाश विकसित करो, पर प्रकाश से भी मत चिपको।

भगवद्गीता 14.6 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह सूक्ष्म और सच में महत्त्वपूर्ण चेतावनी है कि अच्छी अवस्थाएँ भी तुम्हें बाँध सकती हैं — विशेष रूप से उनके प्रति आसक्ति के माध्यम से। सत्त्व सच में तीन गुणों में सर्वश्रेष्ठ है: यह स्पष्टता, शांति, समझ लाता है। सत्त्व में कुछ गलत नहीं; यह सुंदर है और विकसित करने योग्य। पर गीता एक सूक्ष्म चेतावनी देती है जिसे चूकना बहुत आसान है: सत्त्व भी बाँधता है, इसके लाए सुख और स्पष्टता के प्रति आसक्ति के माध्यम से। यह एक परिष्कृत आध्यात्मिक बिंदु है। हम आसानी से समझते हैं कि नकारात्मक अवस्थाएँ बाँधती हैं। पर गीता ध्यान देती है कि हमारी अच्छी अवस्थाएँ भी — शांति, स्पष्टता — एक सूक्ष्म जाल बन सकती हैं अगर हम उनसे आसक्त हो जाते हैं और उनके आसपास अपनी पहचान बनाते हैं। सबक: स्पष्टता और शांति विकसित करो — पर इनसे भी आसक्त मत हो। प्रकाश विकसित करो, पर प्रकाश से भी मत चिपको।

भगवद्गीता 14.6 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट यह सटल और जेन्युइनली इम्पॉर्टेंट वॉर्निंग है कि गुड स्टेट्स भी तुम्हें बाइंड कर सकती हैं — स्पेसिफिकली उनके प्रति अटैचमेंट के माध्यम से। सत्त्व सच में तीन क्वालिटीज़ में बेस्ट है: यह क्लैरिटी, पीस, अंडरस्टैंडिंग लाता है। सत्त्व में कुछ गलत नहीं; यह ब्यूटीफुल और कल्टिवेट करने योग्य है। पर गीता एक सटल वॉर्निंग देती है जिसे मिस करना बहुत आसान है: सत्त्व भी बाइंड करता है, इसके लाए सुख और क्लैरिटी के प्रति अटैचमेंट के माध्यम से। हम आसानी से समझते हैं कि नेगेटिव स्टेट्स बाइंड करती हैं। पर गीता नोट करती है कि हमारी गुड स्टेट्स भी — पीस, क्लैरिटी — एक सटल ट्रैप बन सकती हैं अगर हम उनसे अटैच हो जाते हैं और उनके आसपास अपनी आइडेंटिटी बनाते हैं ('मैं इतना पीसफुल, स्पिरिचुअल पर्सन हूँ')। सबक: क्लैरिटी और पीस कल्टिवेट करो — पर इनसे भी अटैच मत हो। लाइट कल्टिवेट करो, पर लाइट से भी मत क्लिंग करो।

भगवद्गीता 14.6 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण पहली ऊर्जा, सत्त्व का वर्णन करते हैं — शांत, स्पष्ट, उज्ज्वल, सुखद ऊर्जा! यह तीनों में सबसे अच्छी है: यह तुम्हें खुश, शांत, स्वस्थ महसूस कराती है, और चीज़ों को स्पष्ट समझने में मदद करती है। यह अद्भुत है! पर श्रीकृष्ण एक आश्चर्यजनक छोटी चेतावनी देते हैं: यह अच्छी ऊर्जा भी तुम्हें थोड़ा 'फँसा' सकती है — अगर तुम इससे बहुत आसक्त हो जाओ! अच्छी भावनाएँ जाल कैसे हो सकती हैं? कल्पना करो तुम बहुत शांत महसूस करते हो, और तुम सोचने लगते हो, 'मुझे ऐसा महसूस करना पसंद है! मैं इतना शांत व्यक्ति हूँ!' और फिर तुम परेशान हो जाते हो जब भी तुम शांत महसूस नहीं करते। अब तुम फँसे हो! तो बुद्धिमान सबक: शांत महसूस करना बढ़िया है — पर इसे धीरे से थामो, खुले हाथ से! उज्ज्वल ऊर्जा का आनंद लो — पर इसे हल्के से थामो, खुले हाथ पर तितली की तरह!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण तीन गुणों — सत्त्व, रज और तम — का वर्णन करते हैं कि वे आत्मा को कैसे बाँधते हैं, उनके लक्षण, और गुणातीत होकर अमरत्व की प्राप्ति बताते हैं।

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