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अध्याय 14 · श्लोक 17गुणत्रय विभाग योग

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श्लोक 17 / 27

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥

लिप्यंतरण

sattvāt sañjāyate jñānaṁ rajaso lobha eva cha pramāda-mohau tamaso bhavato ’jñānam eva cha

शब्दार्थ (अन्वय)

sattvāt
from the mode of goodness
sañjāyate
arises
jñānam
knowledge
rajasaḥ
from the mode of passion
lobhaḥ
greed
eva
indeed
cha
and
pramāda
negligence
mohau
delusion
tamasaḥ
from the mode of ignorance
bhavataḥ
arise
ajñānam
ignorance
eva
indeed
cha
and

भावार्थ

सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है।

व्याख्या

श्रीकृष्ण बताते हैं कि हर गुण क्या उत्पन्न करता है: 'सत्त्व से ज्ञान उठता है; रजस् से लोभ; और तमस् से प्रमाद, मोह, और अज्ञान उठते हैं।' श्रीकृष्ण वर्णन करते हैं कि हर गुण विशेष रूप से क्या उत्पन्न करता है। शंकराचार्य समझाते हैं। सत्त्व, स्पष्टता और प्रकाश का गुण होने से, स्वाभाविक रूप से ज्ञान को जन्म देता है। रजस्, बेचैन इच्छा का गुण होने से, लोभ को जन्म देता है। और तमस्, अंधकार का गुण होने से, लापरवाही, भ्रम, और अज्ञान को जन्म देता है। हर गुण अपना विशिष्ट मानसिक फल उत्पन्न करता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह पहचान है कि ज्ञान और स्पष्टता विशेष रूप से एक सात्त्विक अवस्था से उठते हैं — यानी वास्तविक समझ को सही आंतरिक स्थितियों की ज़रूरत है, न कि केवल प्रयास या बुद्धि की। हम सोचते हैं ज्ञान बस कड़ी सोच से आता है। पर गीता बताती है कि वास्तविक ज्ञान विशेष रूप से सत्त्व से उठता है। तुम रजसी उत्तेजना या तमसी मंदता की अवस्था से स्पष्ट नहीं सोच सकते। यह उद्वेलित पानी में अपना प्रतिबिंब देखने की कोशिश जैसा है; तुम्हें पहले पानी को बसने देना होगा। सबक: जब तुम्हें सच में कुछ समझना हो, बस उत्तेजित मन से कठिन धक्का मत दो। पहले अपनी आंतरिक अवस्था बसाओ और स्पष्ट करो। बुद्धि एक स्पष्ट तालाब से आती है।

भगवद्गीता 14.17 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि यह सच में उपयोगी पहचान है कि ज्ञान और स्पष्टता विशेष रूप से एक सात्त्विक अवस्था से उठते हैं — यानी वास्तविक समझ को सही आंतरिक स्थितियों की ज़रूरत है, न कि केवल प्रयास, जानकारी, या बुद्धि की। 'सत्त्व से ज्ञान उठता है।' यह वास्तविक समझ कैसे काम करती है इसके बारे में एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है। हम सोचते हैं ज्ञान बस कड़ी सोच, अधिक जानकारी से आता है। पर गीता बताती है कि वास्तविक ज्ञान विशेष रूप से सत्त्व से उठता है। तुम रजसी उत्तेजना या तमसी मंदता की अवस्था से स्पष्ट नहीं सोच सकते। यह उद्वेलित पानी में अपना प्रतिबिंब देखने की कोशिश जैसा है; तुम्हें पहले पानी को बसने देना होगा। यही कारण है कि मन को शांत और स्पष्ट करने वाले अभ्यास इतने महत्त्वपूर्ण हैं। सबक: जब तुम्हें सच में कुछ समझना हो, बस उत्तेजित मन से कठिन धक्का मत दो। पहले अपनी आंतरिक अवस्था बसाओ और स्पष्ट करो। बुद्धि एक स्पष्ट, स्थिर तालाब से आती है।

भगवद्गीता 14.17 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट यह जेन्युइनली यूज़फुल रिकग्निशन है कि नॉलेज और क्लैरिटी स्पेसिफिकली एक सात्त्विक स्टेट से उठते हैं — यानी रियल अंडरस्टैंडिंग को राइट इनर कंडीशन्स चाहिए, न कि केवल एफर्ट, इन्फॉर्मेशन, या इंटेलिजेंस। 'सत्त्व से ज्ञान उठता है।' यह जेन्युइन अंडरस्टैंडिंग कैसे काम करती है इसके बारे में एक क्रूशियल पॉइंट है। हम सोचते हैं नॉलेज बस हार्ड थिंकिंग, ज़्यादा इन्फो से आती है। पर गीता पॉइंट आउट करती है कि जेन्युइन नॉलेज स्पेसिफिकली सत्त्व से उठती है। तुम रजसिक एजिटेशन या तमसिक डलनेस की स्टेट से क्लियरली नहीं सोच सकते। यह टर्बुलेंट वॉटर में अपना रिफ्लेक्शन देखने की कोशिश जैसा है; तुम्हें पहले वॉटर को सेटल होने देना होगा। यही कारण है कि माइंड को काम और क्लैरिफाई करने वाले प्रैक्टिसेज़ इतने इम्पॉर्टेंट हैं। सबक: जब तुम्हें सच में कुछ समझना हो, बस एजिटेटेड माइंड से हार्ड पुश मत करो। पहले अपनी इनर स्टेट सेटल और क्लैरिफाई करो। विज़डम एक क्लियर, स्टिल पूल से आती है।

भगवद्गीता 14.17 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि हर ऊर्जा हमारे अंदर क्या बनाती है! उज्ज्वल, स्पष्ट सत्त्व ऊर्जा ज्ञान और बुद्धि बनाती है — जब तुम शांत और स्पष्ट हो, तुम चीज़ें अच्छी तरह समझते हो! बेचैन रजस् ऊर्जा लोभ बनाती है — जब तुम बेचैन हो, तुम बस और-और चाहते हो! और धुंधली तमस् ऊर्जा भ्रम और लापरवाही बनाती है — जब तुम धुँधले हो, तुम सीधा नहीं सोच सकते! यहाँ एक महत्त्वपूर्ण और सहायक विचार है: स्पष्ट समझ एक शांत, स्पष्ट मन से आती है! तुम स्पष्ट नहीं सोच सकते जब तुम्हारा मन उद्वेलित और बेचैन हो! यह एक तालाब में अपना चेहरा देखने की कोशिश जैसा है: अगर पानी छप-छप कर रहा है, तुम अपना प्रतिबिंब बिल्कुल नहीं देख सकते! पर अगर तुम पानी के शांत होने का इंतज़ार करो, तुम स्पष्ट देख सकते हो! तो जब तुम्हें सच में कुछ समझना हो, पहले शांत हो जाओ! शांत, स्पष्ट मन सबसे अच्छा समझते हैं!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण तीन गुणों — सत्त्व, रज और तम — का वर्णन करते हैं कि वे आत्मा को कैसे बाँधते हैं, उनके लक्षण, और गुणातीत होकर अमरत्व की प्राप्ति बताते हैं।

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