अध्याय 14 · श्लोक 18— गुणत्रय विभाग योग
Read this verse in English →ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥
लिप्यंतरण
ūrdhvaṁ gachchhanti sattva-sthā madhye tiṣhṭhanti rājasāḥ jaghanya-guṇa-vṛitti-sthā adho gachchhanti tāmasāḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- ūrdhvam
- — upward
- gachchhanti
- — rise
- sattva-sthāḥ
- — those situated in the mode of goodness
- madhye
- — in the middle
- tiṣhṭhanti
- — stay
- rājasāḥ
- — those in the mode of passion
- jaghanya
- — abominable
- guṇa
- — quality
- vṛitti-sthāḥ
- — engaged in activities
- adhaḥ
- — down
- gachchhanti
- — go
- tāmasāḥ
- — those in the mode of ignorance
भावार्थ
सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं।
व्याख्या
श्रीकृष्ण गुणों के प्रक्षेपवक्र का वर्णन करते हैं: 'सत्त्व में स्थित ऊपर जाते हैं; रजसी बीच में रहते हैं; और तमसी, निम्नतम गुण में रहते हुए, नीचे जाते हैं।' श्रीकृष्ण हर गुण से जुड़ी दिशात्मक गति का वर्णन करते हैं। शंकराचार्य प्रक्षेपवक्र समझाते हैं। तीन गुण तीन गति की दिशाओं के अनुरूप हैं: सत्त्व ऊपर ले जाता है, रजस् बीच में रखता है, और तमस् नीचे खींचता है। यह मनमाना नहीं; यह हर गुण की प्रकृति से अनुसरण करता है। स्पष्टता स्वाभाविक रूप से ऊपर उठाती है; बेचैन लालसा बीच की दुनिया में बाँधे रखती है; अंधकार स्वाभाविक रूप से नीचे खींचता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि जीवन को दिशात्मक के रूप में शक्तिशाली छवि है — कि चेतना की गुणवत्ता जो तुम विकसित करते हो बस एक स्थिर अवस्था नहीं बल्कि गति की एक दिशा है: ऊपर, समतल, या नीचे। महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि यह है कि तुम हमेशा किसी दिशा में बढ़ रहे हो; कोई सच में स्थिर अवस्था नहीं। हर दिन, जो गुणवत्ता तुम विकसित करते हो, तुम या तो उठ रहे हो, समतल रह रहे हो, या डूब रहे हो। सबक: पहचानो कि तुम्हारे आंतरिक जीवन की एक दिशा है। ईमानदारी से पूछो: क्या मैं उठ रहा हूँ, समतल रह रहा हूँ, या डूब रहा हूँ? सत्त्व खिलाओ, और तुम उठते हो। हर दिन चढ़ने का चुनाव करो।
भगवद्गीता 14.18 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि जीवन को दिशात्मक के रूप में शक्तिशाली छवि है — कि चेतना की गुणवत्ता जो तुम विकसित करते हो बस एक स्थिर अवस्था नहीं बल्कि गति की एक दिशा है: ऊपर, समतल, या नीचे। सत्त्व विकसित करना तुम्हें ऊपर ले जाता है — अधिक परिष्कार, अधिक चेतना की ओर। रजस् में रहना तुम्हें समतल रखता है — बीच की दुनिया के ट्रेडमिल पर कड़ी दौड़ते। तमस् में डूबना तुम्हें नीचे ले जाता है — अधिक भ्रम की ओर। महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि यह है कि तुम हमेशा किसी दिशा में बढ़ रहे हो; कोई सच में स्थिर अवस्था उपलब्ध नहीं। यह संयमी और प्रेरक दोनों है। सबक: पहचानो कि तुम्हारे आंतरिक जीवन की एक दिशा है। ईमानदारी से पूछो: क्या मैं उठ रहा हूँ, समतल रह रहा हूँ, या धीरे डूब रहा हूँ? तुम पूर्णतः स्थिर नहीं रह सकते — तो ऊपर बढ़ने का चुनाव करो। सत्त्व खिलाओ, और तुम उठते हो। हर दिन चढ़ने का चुनाव करो।
भगवद्गीता 14.18 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट लाइफ को डायरेक्शनल के रूप में पावरफुल इमेज है — कि कॉन्शियसनेस की क्वालिटी जो तुम कल्टिवेट करते हो बस एक स्टैटिक स्टेट नहीं बल्कि मूवमेंट की एक डायरेक्शन है: अपवर्ड, लेवल, या डाउनवर्ड। सत्त्व कल्टिवेट करना तुम्हें ऊपर ले जाता है। रजस् में रहना तुम्हें लेवल रखता है — मिडल वर्ल्ड के ट्रेडमिल पर दौड़ते। तमस् में संक होना तुम्हें नीचे ले जाता है। क्रूशियल इनसाइट यह है कि तुम हमेशा किसी डायरेक्शन में मूव कर रहे हो; कोई सच में स्टैटिक स्टेट उपलब्ध नहीं। यह सोबरिंग और मोटिवेटिंग दोनों है। सबक: रिकग्नाइज़ करो कि तुम्हारी इनर लाइफ की एक डायरेक्शन है। ऑनेस्टली पूछो: क्या मैं राइज़ कर रहा हूँ, लेवल रह रहा हूँ, या स्लोली संक हो रहा हूँ? तुम परफेक्टली स्टिल नहीं रह सकते — तो अपवर्ड मूव करने का चॉइस करो। सत्त्व फीड करो, और तुम राइज़ करते हो। हर दिन क्लाइंब करने का चॉइस करो।
भगवद्गीता 14.18 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि हर ऊर्जा तुम्हें एक अलग दिशा में ले जाती है! उज्ज्वल, स्पष्ट सत्त्व ऊर्जा तुम्हें ऊपर ले जाती है — तुम बेहतर, बुद्धिमान, और अधिक अद्भुत बढ़ते हो! व्यस्त, बेचैन रजस् ऊर्जा तुम्हें बीच में रखती है — व्यस्त रूप से दौड़ते पर वास्तव में ऊपर या नीचे नहीं जाते। और भारी, धुंधली तमस् ऊर्जा तुम्हें नीचे खींचती है। यहाँ बड़ा विचार है: तुम हमेशा किसी दिशा में बढ़ रहे हो — ऊपर, समतल, या नीचे! पूरी तरह स्थिर खड़े रहना नहीं है! हर दिन, इस पर निर्भर करते हुए कि तुम कौन सी ऊर्जा खिलाते हो, तुम या तो चढ़ रहे हो, समतल रह रहे हो, या फिसल रहे हो! इसे एक पहाड़ी की तरह सोचो: अगर तुम ऊपर नहीं चढ़ रहे, तुम शायद नीचे फिसल रहे हो! तो खुद से पूछने वाला सवाल: 'आज, क्या मैं चढ़ रहा हूँ, समतल हूँ, या फिसल रहा हूँ?' और अद्भुत खबर: तुम चुन सकते हो! तो हर दिन थोड़ा चढ़ने का चुनाव करो!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण तीन गुणों — सत्त्व, रज और तम — का वर्णन करते हैं कि वे आत्मा को कैसे बाँधते हैं, उनके लक्षण, और गुणातीत होकर अमरत्व की प्राप्ति बताते हैं।
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