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अध्याय 13 · श्लोक 14क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

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श्लोक 14 / 35

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥

लिप्यंतरण

sarvataḥ pāṇi-pādaṁ tat sarvato ’kṣhi-śhiro-mukham sarvataḥ śhrutimal loke sarvam āvṛitya tiṣhṭhati

शब्दार्थ (अन्वय)

sarvataḥ
everywhere
pāṇi
hands
pādam
feet
tat
that
sarvataḥ
everywhere
akṣhi
eyes
śhiraḥ
heads
mukham
faces
sarvataḥ
everywhere
śhruti-mat
having ears
loke
in the universe
sarvam
everything
āvṛitya
pervades
tiṣhṭhati
exists

भावार्थ

वे (परमात्मा) सब जगह हाथों और पैरोंवाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखोंवाले तथा सब जगह कानोंवाले हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं।

व्याख्या

श्रीकृष्ण ज्ञेय का वर्णन विरोधाभास से करते हैं: 'सब ओर हाथ-पैर, सब ओर आँखें, सिर, और मुख, सब ओर कान — वह संसार में सब कुछ ढककर स्थित है।' श्रीकृष्ण परम वास्तविकता का वर्णन एक प्रभावशाली विरोधाभास से करते हैं। शंकराचार्य विरोधाभासी कल्पना समझाते हैं। परम वास्तविकता का अपना कोई विशेष शरीर नहीं — फिर भी क्योंकि यह सब प्राणियों में उपस्थित चेतना है, पूरे ब्रह्मांड के सब हाथ, पैर, आँखें इसके हैं। हर जोड़ी आँखें जो देखती हैं, कहीं भी — एक चेतना की अभिव्यक्ति है जो असंख्य रूपों के माध्यम से कार्य और अनुभव करती है। अंतर्दृष्टि, 13.2 की दृष्टि को गहरा करते हुए, एक एकल चेतना की चौंका देने वाली छवि है जो हर आँख से देखती है, हर हाथ से कार्य करती है। इसका मतलब क्या है उसके साथ बैठो। कहीं भी होने वाला हर देखने का कार्य, गहनतम स्तर पर, एक चेतना है जो उस विशेष जोड़ी आँखों से देख रही है। यह एकता की एक चौंका देने वाली दृष्टि है। जब तुम सच में महसूस करते हो कि वही जागरूकता तुम्हारी आँखों और हर किसी की आँखों से देख रही है, 'मैं' और 'वे' के बीच गहरा अलगाव घुलने लगता है। हर जगह एक जागरूकता देखने का अभ्यास करो। वही रोशनी हर खिड़की से चमकती है।

भगवद्गीता 13.14 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण परम वास्तविकता का वर्णन एक चौंका देने वाली छवि से करते हैं, 13.2 की दृष्टि को गहरा करते हुए: एक एकल चेतना जो हर आँख से देखती है, हर हाथ से कार्य करती है, पूरे ब्रह्मांड में हर कान से सुनती है। इसका मतलब क्या है उसके साथ बैठो। अभी कहीं भी होने वाला हर देखने का कार्य, गहनतम स्तर पर, एक चेतना है जो उस विशेष जोड़ी आँखों से देख रही है। यह एकता की एक चौंका देने वाली दृष्टि है: यह नहीं कि हम अलग प्राणी हैं जो संयोग से समान हैं, बल्कि एक अंतर्निहित चेतना हम सबके माध्यम से बाहर देख रही है। इसकी व्यावहारिक शक्ति अपार है। जब तुम सच में महसूस करते हो कि वही जागरूकता तुम्हारी और हर किसी की आँखों से देख रही है, 'मैं' और 'वे' के बीच अलगाव घुलने लगता है। तुम्हारे सामने का व्यक्ति मूल रूप से अन्य नहीं — वे उसी वास्तविकता का दूसरा चेहरा हैं जो तुम हो। हर जगह एक जागरूकता देखने का अभ्यास करो।

भगवद्गीता 13.14 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण परम रियलिटी का वर्णन एक स्टैगरिंग इमेज से करते हैं, 13.2 की विज़न को डीपन करते हुए: एक सिंगल कॉन्शियसनेस जो हर आँख से देखती है, हर हाथ से एक्ट करती है, पूरे यूनिवर्स में हर कान से सुनती है। इसका मतलब क्या है उसके साथ बैठो। अभी कहीं भी होने वाला हर सीइंग का एक्ट, डीपेस्ट लेवल पर, एक कॉन्शियसनेस है जो उस पर्टिकुलर जोड़ी आँखों से देख रही है। यह यूनिटी की ब्रेथटेकिंग विज़न है। इसकी प्रैक्टिकल पावर ह्यूज है। जब तुम सच में महसूस करते हो कि वही अवेयरनेस तुम्हारी और हर किसी की आँखों से देख रही है, 'मी' और 'देम' के बीच सेपरेशन डिज़ॉल्व होने लगता है। तुम्हारे सामने का व्यक्ति फंडामेंटली अदर नहीं — वे उसी रियलिटी का दूसरा फेस हैं जो तुम हो। हर जगह एक अवेयरनेस देखने का प्रैक्टिस करो।

भगवद्गीता 13.14 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण सबसे अद्भुत वास्तविकता का वर्णन एक सुंदर, चकित करने वाली तस्वीर से करते हैं: वे कहते हैं इसके सब जगह हाथ हैं, सब जगह आँखें हैं, सब जगह कान हैं! इसका क्या मतलब? इसका मतलब एक अद्भुत जागरूकता हर किसी की आँखों से देखती है, हर किसी के हाथों से काम करती है, और हर किसी के कानों से सुनती है! इसे ऐसे सोचो: कल्पना करो एक रोशनी पूरी दुनिया में लाखों खिड़कियों से चमक रही है। रोशनी एक है, पर यह हर खिड़की से चमकती है! उसी तरह, एक अद्भुत जागरूकता हर व्यक्ति की आँखों से बाहर देखती है — तुम्हारी, तुम्हारे दोस्त की, हर किसी की! यह हर किसी के प्रति दयालु होने का सुंदर कारण है! जब तुम किसी और व्यक्ति को देखो, याद रखो: वही रोशनी जो मुझ में है उनमें भी चमक रही है! हम सब गहराई से जुड़े हैं!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर व प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद बताते हैं। वे यथार्थ ज्ञान, प्रकृति-पुरुष का स्वरूप और इनके विवेक से मोक्ष का वर्णन करते हैं।

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