अध्याय 11 · श्लोक 39— विश्वरूप दर्शन योग
Read this verse in English →वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च। नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
लिप्यंतरण
vāyur yamo ’gnir varuṇaḥ śhaśhāṅkaḥ prajāpatis tvaṁ prapitāmahaśh cha namo namas te ’stu sahasra-kṛitvaḥ punaśh cha bhūyo ’pi namo namas te
शब्दार्थ (अन्वय)
- vāyuḥ
- — the god of wind
- yamaḥ
- — the god of death
- agniḥ
- — the god of fire
- varuṇaḥ
- — the god of water
- śhaśha-aṅkaḥ
- — the moon-God
- prajāpatiḥ
- — Brahma
- tvam
- — you
- prapitāmahaḥ
- — the great-grandfather
- cha
- — and
- namaḥ
- — my salutations
- namaḥ
- — my salutations
- te
- — unto you
- astu
- — let there be
- sahasra-kṛitvaḥ
- — a thousand times
- punaḥ cha
- — and again
- bhūyaḥ
- — again
- api
- — also
- namaḥ
- — (offering) my salutations
- namaḥ te
- — offering my salutations unto you
भावार्थ
आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, दक्ष आदि प्रजापति और प्रपितामह (ब्रह्माजीके भी पिता) हैं। आपको हजारों बार नमस्कार हो! नमस्कार हो ! ! और फिर भी आपको बार-बार नमस्कार हो ! नमस्कार हो !
व्याख्या
अर्जुन अपना स्तुति-गीत जारी रखता है: 'आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्र, प्रजापति, और प्रपितामह हैं। आपको हज़ार बार नमस्कार, और बार-बार, आपको नमस्कार!' अर्जुन दिव्य को विभिन्न ब्रह्मांडीय शक्तियों के रूप में नाम करता है और बार-बार नमस्कार में फूट पड़ता है। शंकराचार्य 'नमः' (नमस्कार) की पुनरावृत्ति ध्यान देते हैं — बार-बार उमड़ती, 'हज़ार बार' और 'फिर-फिर।' यह अभिभूत श्रद्धा का स्वाभाविक उमड़ना है। अंतर्दृष्टि वास्तविक श्रद्धा और कृतज्ञता के स्वाभाविक उमड़ने के बारे में है। जब तुम सच में प्रभावित होते हो, स्तुति के शब्द पूरी तरह अपर्याप्त महसूस हो सकते हैं, और हृदय की प्रतिक्रिया कुछ सरल और दोहराए में उमड़ती है: बार-बार झुकना, 'धन्यवाद, धन्यवाद' कहना। हम अक्सर सोचते हैं कि गहन के प्रति सही प्रतिक्रिया वाक्पटु होनी चाहिए। पर कभी-कभी सबसे सच्ची प्रतिक्रिया सरल, दोहराया उमड़ना है। जब श्रद्धा या कृतज्ञता तुम्हें उमड़ाए, इसे उमड़ने दो।
भगवद्गीता 11.39 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
अर्जुन, अभिभूत, केवल बार-बार झुक सकता है — 'हज़ार बार, फिर-फिर।' उसकी श्रद्धा मापे, वाक्पटु शब्दों की क्षमता से परे सरल, दोहराए नमस्कार में उमड़ती है। अंतर्दृष्टि वास्तविक श्रद्धा और कृतज्ञता के स्वाभाविक उमड़ने के बारे में है। जब तुम सच में प्रभावित होते हो, वाक्पटु शब्द पूरी तरह अपर्याप्त महसूस हो सकते हैं, और हृदय की प्रतिक्रिया कुछ सरल और दोहराए में उमड़ती है: बार-बार झुकना, 'धन्यवाद' कहना। हम अक्सर मानते हैं कि गहन के प्रति 'सही' प्रतिक्रिया वाक्पटु होनी चाहिए। पर कभी-कभी सबसे सच्ची प्रतिक्रिया सरल, दोहराया उमड़ना है। सच में प्रभावित हृदय का दोहराया उमड़ना किसी पॉलिश्ड अभिव्यक्ति से अधिक प्रामाणिक है। जब श्रद्धा उमड़े, इसे उमड़ने दो।
भगवद्गीता 11.39 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
अर्जुन, ओवरव्हेल्म्ड, केवल बार-बार झुक सकता है — 'हज़ार बार, अगेन एंड अगेन।' उसकी रेवरेंस मेज़र्ड, एलोक्वेंट वर्ड्स की कैपेसिटी से परे सिंपल, रिपीटेड सैल्यूटेशन में ओवरफ्लो होती है। इनसाइट जेन्युइन रेवरेंस और ग्रैटिट्यूड के नैचुरल ओवरफ्लो के बारे में है। जब तुम सच में मूव्ड होते हो, एलोक्वेंट वर्ड्स टोटली इनएडिक्वेट फील हो सकते हैं, और तुम्हारा हार्ट कुछ सिंपल और रिपीटेड में ओवरफ्लो होता है: बार-बार झुकना, 'थैंक यू' कहना। हम अक्सर असम्यूम करते हैं कि प्रोफाउंड के प्रति 'राइट' रिस्पॉन्स एलोक्वेंट होनी चाहिए। पर कभी-कभी ट्रूएस्ट रिस्पॉन्स सिंपल, रिपीटेड ओवरफ्लो है। जब रेवरेंस ओवरफ्लो हो, इसे ओवरफ्लो होने दो।
भगवद्गीता 11.39 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
अर्जुन विस्मय और सम्मान से इतना भरा है कि वह बस बार-बार झुकता है, कहता है 'मैं आपको हज़ार बार नमन करता हूँ! और बार-बार, मैं आपको नमन करता हूँ!' उसे पर्याप्त शब्द नहीं मिलते — तो उसका हृदय बस बार-बार 'धन्यवाद, धन्यवाद' कहता रहता है! यह हमें कुछ सुंदर दिखाता है: जब तुम सच में आभारी या चकित महसूस करते हो, कभी-कभी फैंसी शब्द पर्याप्त नहीं — तुम्हारा हृदय बस वही सरल बात बार-बार कहना चाहता है! क्या तुम कभी इतने खुश या आभारी रहे कि बस 'धन्यवाद, धन्यवाद!' या 'वाह, वाह!' कहते रहे? यह अद्भुत और बिल्कुल ठीक है! सबसे सरल, सबसे हार्दिक 'धन्यवाद' — पूरे हृदय से बार-बार दोहराया — दुनिया की सबसे सुंदर चीज़ों में से एक है!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
दिव्य दृष्टि पाकर अर्जुन श्रीकृष्ण के विराट विश्वरूप का दर्शन करते हैं जिसमें समस्त लोक, देव और काल समाहित हैं। भयभीत होकर वे पुनः सौम्य रूप के दर्शन की प्रार्थना करते हैं।
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