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अध्याय 11 · श्लोक 18विश्वरूप दर्शन योग

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श्लोक 18 / 55

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥

लिप्यंतरण

tvam akṣharaṁ paramaṁ veditavyaṁ tvam asya viśhvasya paraṁ nidhānam tvam avyayaḥ śhāśhvata-dharma-goptā sanātanas tvaṁ puruṣho mato me

शब्दार्थ (अन्वय)

tvam
you
akṣharam
the imperishable
paramam
the supreme being
veditavyam
worthy of being known
tvam
you
asya
of this
viśhwasya
of the creation
param
supreme
nidhānam
support
tvam
you
avyayaḥ
eternal
śhāśhvata-dharma-goptā
protector of the eternal religion
sanātanaḥ
everlasting
tvam
you
puruṣhaḥ
the Supreme Divine Person
mataḥ me
my opinion

भावार्थ

आप ही जाननेयोग्य परम अक्षर (अक्षरब्रह्म) हैं, आप ही इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं, आप ही सनातनधर्मके रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं -- ऐसा मैं मानता हूँ।

व्याख्या

"त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्, त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।" — आप जानने योग्य परम अक्षर हैं; आप इस विश्व के परम आधार हैं; आप शाश्वत धर्म के अविनाशी रक्षक हैं; आप, मेरे निश्चय में, सनातन पुरुष हैं। अर्जुन का स्तुति-गीत श्रीकृष्ण की परम प्रकृति की पहचान तक उठता है। 'त्वम् अक्षरं परमं वेदितव्यम्' — आप जानने योग्य परम अक्षर हैं। 'त्वम् अव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता' — आप शाश्वत धर्म के अविनाशी रक्षक हैं। शंकराचार्य विशेष रूप से 'शाश्वतधर्मगोप्ता' उजागर करते हैं — शाश्वत धर्म के रक्षक। सब ब्रह्मांडीय भव्यता के बीच, अर्जुन पहचानता है कि यह सर्वोच्च वास्तविकता धार्मिकता का रक्षक भी है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि 'शाश्वत धर्म का रक्षक' है। सबसे गहरी वास्तविकता नैतिक रूप से उदासीन नहीं — यह एक शाश्वत धार्मिकता की रक्षक है। अच्छाई एक नाज़ुक मानवीय रचना नहीं; यह वास्तविकता की गहनतम प्रकृति में बुनी है। अच्छाई का ब्रह्मांडीय समर्थन है।

भगवद्गीता 11.18 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

सब अभिभूत करने वाली ब्रह्मांडीय विशालता के बीच, अर्जुन कुछ महत्त्वपूर्ण पहचानता है: सबसे गहरी वास्तविकता 'शाश्वत धर्म की रक्षक' है — नैतिक रूप से उदासीन नहीं, बल्कि अस्तित्व में बुनी शाश्वत धार्मिकता की रक्षक। यह एक गहरी आधुनिक चिंता को संबोधित करता है। जब तुम ब्रह्माण्ड के विशाल पैमाने पर विचार करते हो, यह डरना आसान है कि ऐसा ब्रह्माण्ड ठंडा, अनैतिक होगा — कि अच्छाई बस एक नाज़ुक मानवीय आविष्कार है। पर अर्जुन विपरीत देखता है: सर्वोच्च वास्तविकता स्वयं शाश्वत धर्म की रक्षा करती है। तुम्हारा सही जीने का प्रयास एक उदासीन ब्रह्माण्ड के विरुद्ध अकेला प्रयास नहीं। अच्छाई का ब्रह्मांडीय समर्थन है। जब तुम सही चुनते हो, तुम ब्रह्माण्ड के विरुद्ध नहीं तैर रहे — तुम इसकी गहनतम धारा के साथ चल रहे हो।

भगवद्गीता 11.18 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

सब ओवरव्हेल्मिंग कॉस्मिक वास्टनेस के बीच, अर्जुन कुछ क्रूशियल रिकग्नाइज़ करता है: डीपेस्ट रियलिटी 'इटरनल धर्म की गार्डियन' है — मॉरली इंडिफरेंट नहीं, बल्कि एग्ज़िस्टेंस में बुनी इटरनल राइटियसनेस की प्रोटेक्टर। यह एक डीप मॉडर्न एंग्ज़ायटी को एड्रेस करता है। कॉस्मॉस के स्केल पर विचार करते समय, डरना आसान है कि ऐसा यूनिवर्स कोल्ड, अमॉरल होगा — कि गुडनेस बस एक फ्रैजाइल ह्यूमन इन्वेंशन है। पर अर्जुन ऑपोज़िट देखता है: सुप्रीम रियलिटी खुद इटरनल धर्म गार्ड करती है। तुम्हारा राइट जीने का स्ट्राइविंग एक इंडिफरेंट यूनिवर्स के विरुद्ध लोनली एफर्ट नहीं। गुडनेस का कॉस्मिक बैकिंग है। जब तुम राइट चूज़ करते हो, तुम यूनिवर्स के डीपेस्ट करंट के साथ मूव कर रहे हो।

भगवद्गीता 11.18 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

अर्जुन श्रीकृष्ण के बारे में कुछ अद्भुत पहचानता है: 'आप जानने योग्य परम सत्य हैं, पूरे ब्रह्माण्ड की नींव, और शाश्वत अच्छाई तथा जो सही है उसके रक्षक!' वह आखिरी हिस्सा बहुत महत्त्वपूर्ण है: ब्रह्माण्ड की सबसे गहरी वास्तविकता सही-गलत के बारे में ठंडी या परवाह न करने वाली नहीं — यह वास्तव में अच्छाई और निष्पक्षता की रक्षा करती है! यह बहुत सांत्वना देने वाला है! कभी-कभी ब्रह्माण्ड इतना विशाल लगता है कि हम सोच सकते हैं: क्या अच्छाई मायने रखती है? अर्जुन का उत्तर हाँ है — सब अस्तित्व की सबसे गहरी शक्ति अच्छाई की रक्षा करती है! तो जब तुम दयालु, ईमानदार होना चुनते हो, तुम अकेले नहीं — पूरा ब्रह्माण्ड तुम्हारा हौसला बढ़ा रहा है!

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अध्याय सन्दर्भ

दिव्य दृष्टि पाकर अर्जुन श्रीकृष्ण के विराट विश्वरूप का दर्शन करते हैं जिसमें समस्त लोक, देव और काल समाहित हैं। भयभीत होकर वे पुनः सौम्य रूप के दर्शन की प्रार्थना करते हैं।

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