अध्याय 11 · श्लोक 17— विश्वरूप दर्शन योग
Read this verse in English →किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम्। पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥
लिप्यंतरण
kirīṭinaṁ gadinaṁ chakriṇaṁ cha tejo-rāśhiṁ sarvato dīptimantam paśhyāmi tvāṁ durnirīkṣhyaṁ samantād dīptānalārka-dyutim aprameyam
शब्दार्थ (अन्वय)
- kirīṭinam
- — adorned with a crown
- gadinam
- — with club
- chakriṇam
- — with discs
- cha
- — and
- tejaḥ-rāśhim
- — abode of splendor
- sarvataḥ
- — everywhere
- dīpti-mantam
- — shining
- paśhyāmi
- — I see
- tvām
- — you
- durnirīkṣhyam
- — difficult to look upon
- samantāt
- — in all directions
- dīpta-anala
- — blazing fire
- arka
- — like the sun
- dyutim
- — effulgence
- aprameyam
- — immeasurable
भावार्थ
मैं आपको किरीट, गदा, चक्र (तथा शङ्ख और पद्म) धारण किये हुए देख रहा हूँ। आपको तेजकी राशि, सब ओर प्रकाश करनेवाले, देदीप्यमान अग्नि तथा सूर्यके समान कान्तिवाले, नेत्रोंके द्वारा कठिनतासे देखे जानेयोग्य और सब तरफसे अप्रमेयस्वरूप देख रहा हूँ।
व्याख्या
अर्जुन जारी रखता है: 'मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र सहित देखता हूँ, हर ओर चमकता तेज का पुंज, देखना कठिन, सूर्य की अग्नि की तरह सब ओर जलता, अमाप।' अर्जुन ब्रह्मांडीय रूप की चकाचौंध और दिव्य प्रतीक वर्णित करता है। वह 'किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च' देखता है — मुकुट, गदा और चक्र धारण किए। रूप 'तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्' है — हर ओर चमकता तेज का पुंज। और यह 'दुर्निरीक्ष्यम्' है — देखना कठिन। शंकराचार्य अब 'दुर्निरीक्ष्यम्' के साथ संयुक्त अभिभूत करने वाले प्रकाश पर आवर्ती बल ध्यान देते हैं। अंतर्दृष्टि ईमानदार है: सबसे गहरी वास्तविकताओं का सामना हमेशा आरामदायक या विशुद्ध आनंदमय नहीं होता। यहाँ, गौरवशाली दृष्टि भी 'देखना कठिन' बन जाती है। हम कभी-कभी कल्पना करते हैं कि गहन अनुभव एकसमान सुखद हैं। पर विशाल वास्तविकता का सामना अभिभूत करने वाला हो सकता है। हर गहन अनुभव या कठिन सत्य के आरामदायक होने की अपेक्षा मत करो। असली देखना हमेशा आसान देखना नहीं।
भगवद्गीता 11.17 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
यहाँ एक सूक्ष्म पर महत्त्वपूर्ण बदलाव होता है: दृष्टि, गौरवशाली होते हुए भी, 'देखना कठिन' बन जाती है। यह एक ईमानदार और यथार्थवादी स्वर है। हम अक्सर कल्पना करते हैं कि गहन आध्यात्मिक अनुभव एकसमान सुखद, आरामदायक हैं — सब आनंद और गर्मजोशी। पर विशाल वास्तविकता का सामना अभिभूत करने वाला हो सकता है। इसका मतलब कुछ गलत नहीं — इसका मतलब तुमने सच में अपनी सामान्य क्षमता से परे कुछ का सामना किया। हर गहन अनुभव के आरामदायक होने की अपेक्षा मत करो। कभी-कभी सबसे महत्त्वपूर्ण वास्तविकताएँ 'देखना कठिन' हैं। और फिर भी उनका सामना करते रहने की इच्छा — आरामदायक की ओर पलायन के बजाय — वास्तविक विकास का हिस्सा है।
भगवद्गीता 11.17 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
यहाँ एक सटल पर इम्पॉर्टेंट शिफ्ट होता है: विज़न, ग्लोरियस होते हुए भी, 'हार्ड टू लुक एट' बन जाता है। यह एक ऑनेस्ट, रियलिस्टिक नोट है। हम अक्सर इमेजिन करते हैं कि प्रोफाउंड स्पिरिचुअल एक्सपीरियंसेज़ यूनिफॉर्मली प्लेज़ेंट, ईज़ी हैं — सब ब्लिस और गुड वाइब्स। पर वास्ट रियलिटी के जेन्युइन एनकाउंटर्स ओवरव्हेल्मिंग हो सकते हैं — टू ब्राइट, टू इंटेंस। इसका मतलब कुछ रॉन्ग नहीं — तुमने अपनी ऑर्डिनरी कैपेसिटी से परे कुछ हिट किया। हर प्रोफाउंड एक्सपीरियंस के कोज़ी होने की एक्सपेक्ट मत करो। कभी-कभी सबसे इम्पॉर्टेंट रियलिटीज़ 'हार्ड टू लुक एट' हैं। फिर भी उनका सामना करते रहना ग्रोथ है।
भगवद्गीता 11.17 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
अर्जुन ब्रह्मांडीय रूप का वर्णन करता रहता है: इसके पास एक सुंदर मुकुट, गदा, और चक्र है, और यह इतना उज्ज्वल चमकता है — अग्नि और सूर्य की तरह हर जगह जलता — कि इसे देखना वास्तव में कठिन है! यह गौरवशाली है, पर सीधे देखने के लिए लगभग बहुत उज्ज्वल और तीव्र! यह हमें कुछ ईमानदार और महत्त्वपूर्ण सिखाता है: कभी-कभी अद्भुत, गहरी चीज़ें हमेशा आसान या आरामदायक नहीं होतीं — वे इतनी बड़ी और तीव्र हो सकती हैं कि उन्हें संभालना कठिन हो! और यह ठीक है — इसका मतलब कुछ गलत नहीं। सबक: मत अपेक्षा करो कि हर बड़ी चीज़ आसान होगी। कभी-कभी तुम्हें बहादुर होना और देखते रहना पड़ता है!
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अध्याय सन्दर्भ
दिव्य दृष्टि पाकर अर्जुन श्रीकृष्ण के विराट विश्वरूप का दर्शन करते हैं जिसमें समस्त लोक, देव और काल समाहित हैं। भयभीत होकर वे पुनः सौम्य रूप के दर्शन की प्रार्थना करते हैं।
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