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अध्याय 10 · श्लोक 11विभूति योग

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श्लोक 11 / 42

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥

लिप्यंतरण

teṣhām evānukampārtham aham ajñāna-jaṁ tamaḥ nāśhayāmyātma-bhāva-stho jñāna-dīpena bhāsvatā

शब्दार्थ (अन्वय)

teṣhām
for them
eva
only
anukampā-artham
out of compassion
aham
I
ajñāna-jam
born of ignorance
tamaḥ
darkness
nāśhayāmi
destroy
ātma-bhāva
within their hearts
sthaḥ
dwelling
jñāna
of knowledge
dīpena
with the lamp
bhāsvatā
luminous

भावार्थ

उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ।

व्याख्या

"तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः, नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।" — उन पर करुणा से, मैं, उनके अपने अस्तित्व में स्थित होकर, अज्ञान से जन्मे अंधकार को ज्ञान के तेजस्वी दीपक से नष्ट करता हूँ। श्रीकृष्ण 10.10 की कृपा की शिक्षा जारी रखते हैं, अब इसे गीता की सबसे कोमल छवियों में से एक से वर्णित करते हुए। 'तेषाम् एव अनुकम्पार्थम्' — उन पर करुणा से। 'अहम् अज्ञानजं तमः नाशयामि' — मैं अज्ञान से जन्मे अंधकार को नष्ट करता हूँ। और महत्त्वपूर्ण रूप से, 'आत्मभावस्थः' — उनके अपने अस्तित्व में स्थित होकर। और साधन: 'ज्ञानदीपेन भास्वता' — ज्ञान के तेजस्वी दीपक से। यह श्लोक कृपा की शिक्षा को गहन कोमलता से पूरा करता है। जो बुद्धि मुक्त करती है वह एक ठंडा बाहरी अर्जन नहीं; यह तुम्हारे अपने हृदय में रहते करुणामय दिव्य द्वारा जलाया गया प्रकाश है। तुम अपने भ्रम में परित्यक्त नहीं हो।

भगवद्गीता 10.11 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

यह पूरी गीता की सबसे कोमल छवियों में से एक है: दिव्य, शुद्ध करुणा से, तुम्हारे अपने हृदय के भीतर रहते हुए, बुद्धि का तेजस्वी दीपक जलाता है जो तुम्हारा अंधकार दूर करता है। मुख्य विवरण के साथ बैठो: मदद भीतर से आती है, किसी दूर के प्राधिकरण से नहीं। जो प्रकाश तुम्हें अपना भ्रम साफ करने के लिए चाहिए वह दूर नहीं — यह तुम्हारी अपनी गहराइयों में, प्रेम से जलाया जाता है। यह अंधकार में संघर्ष करने वाले किसी के लिए गहराई से सांत्वना देने वाला है। तुम अपना भ्रम में परित्यक्त नहीं हो। तुम अपना दीपक ले चलते हो। इसे जलने दो।

भगवद्गीता 10.11 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

यह पूरी गीता की सबसे टेंडर इमेजेज़ में से एक है: डिवाइन, प्योर कम्पैशन से, तुम्हारे अपने हार्ट के WITHIN रहते हुए, विज़डम का रेडिएंट लैंप जलाता है जो तुम्हारा डार्कनेस डिस्पेल करता है। की डिटेल के साथ बैठो: हेल्प WITHIN से आती है, किसी डिस्टेंट अथॉरिटी से नहीं। जो लाइट तुम्हें अपना कन्फ्यूज़न क्लियर करने को चाहिए वह दूर नहीं — यह तुम्हारी अपनी डेप्थ्स में, लव से जलाई जाती है। यह डार्कनेस में स्ट्रगल करने वाले किसी के लिए कम्फर्टिंग है। तुम अपने कन्फ्यूज़न में अबैंडन नहीं हो। तुम अपना खुद का लैंप कैरी करते हो। इसे जलने दो।

भगवद्गीता 10.11 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण सबसे कोमल, सुंदर छवि साझा करते हैं! वे कहते हैं: अपने भक्तों के लिए प्रेम और करुणा से, वे उनके हृदय के बिल्कुल अंदर रहते हैं और बुद्धि का एक उज्ज्वल, चमकता दीपक जलाते हैं जो भ्रम के अंधकार को भगा देता है! क्या यह सुंदर नहीं? जो प्रकाश तुम्हें चीज़ें समझने और स्पष्ट महसूस करने के लिए चाहिए वह दूर नहीं — यह तुम्हारे अंदर ही है, और भगवान इसे शुद्ध प्रेम से जलाते हैं! तो जब भी तुम भ्रमित, खोए, या किसी चीज़ के बारे में अंधेरे में महसूस करो — याद रखो कि एक अद्भुत प्रकाश तुम्हारे अपने हृदय में रहता है! तुम हमेशा अपना प्रकाश अपने अंदर ले चलते हो!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं — वे प्रत्येक श्रेणी में श्रेष्ठ और सार रूप हैं। उन्हें सबका मूल जानकर भक्त का प्रेम पूर्ण समर्पण में बदल जाता है।

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