अध्याय 9 · श्लोक 10— राजविद्या राजगुह्य योग
Read this verse in English →गीता 9.10 बताती है कि संसार कैसे चलता रहता है: प्रकृति समस्त चर-अचर को ईश्वर की मौन अध्यक्षता में प्रकट करती है। प्रभु हर बात को नहीं चलाते; वास्तविकता उसी स्थिर उपस्थिति के अधीन उद्घाटित होती है।
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥
लिप्यंतरण
mayādhyakṣheṇa prakṛitiḥ sūyate sa-charācharam hetunānena kaunteya jagad viparivartate
शब्दार्थ (अन्वय)
- mayā
- — by me
- adhyakṣheṇa
- — direction
- prakṛitiḥ
- — material energy
- sūyate
- — brings into being
- sa
- — both
- chara-acharam
- — the animate and the inanimate
- hetunā
- — reason
- anena
- — this
- kaunteya
- — Arjun, the son of Kunti
- jagat
- — the material world
- viparivartate
- — undergoes the changes
भावार्थ
प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है। हे कुन्तीनन्दन ! इसी हेतुसे जगत् का विविध प्रकारसे परिवर्तन होता है।
व्याख्या
"मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्, हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।" — मेरी अध्यक्षता में, प्रकृति सब चर और अचर को जन्म देती है। इस कारण से, हे कुन्तीपुत्र, जगत् घूमता है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कैसे वे, अनासक्त होते हुए भी (9.9), फिर भी सब सृष्टि के कारण हैं। मुख्य शब्द है 'अध्यक्षेण' — मेरी अध्यक्षता में, मेरी देखरेख में। 'मया अध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्' — मेरी देखरेख में, प्रकृति सब चीज़ों को जन्म देती है। शंकराचार्य सुंदर सम्बन्ध समझाते हैं: दिव्य एक शिल्पकार की तरह सीधे सृष्टि का काम नहीं 'करता।' बल्कि, दिव्य 'अध्यक्ष' है — अध्यक्षता करने वाली चेतना, जिसकी मात्र उपस्थिति में प्रकृति सृष्टि का सब काम करती है। यह सूर्य की तरह है, जो कार्य नहीं करता फिर भी जिसकी उपस्थिति में पृथ्वी पर सब गतिविधि चलती है। यह तनाव हल करता है: दिव्य की कर्तृत्व उपस्थिति और देखरेख की है, श्रमपूर्ण करने की नहीं।
भगवद्गीता 9.10 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण एक सूक्ष्म और सुंदर सम्बन्ध समझाते हैं: दिव्य श्रमपूर्ण, हाथों-हाथ करने से सृष्टि नहीं करता — यह मात्र अध्यक्षता उपस्थिति से सृष्टि करता है, जिसके तहत प्रकृति सब काम करती है। उपमा सूर्य है: सूर्य सक्रिय रूप से कुछ नहीं 'करता,' फिर भी इसकी उपस्थिति में, पृथ्वी पर सब जीवन बढ़ता है। यहाँ प्रभाव का एक गहन मॉडल है। किसी कमरे में सबसे शक्तिशाली उपस्थिति अक्सर वह नहीं जो सबसे अधिक कर रही है, बल्कि वह जिसकी स्थिर उपस्थिति बाकी सब को अच्छी तरह काम करने देती है। सबसे गहरी शक्ति हमेशा उन्मत्त गतिविधि नहीं; कभी-कभी यह तुम्हारी उपस्थिति की गुणवत्ता है।
भगवद्गीता 9.10 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण एक सटल, ब्यूटीफुल रिलेशनशिप समझाते हैं: डिवाइन लेबोरियस हैंड्स-ऑन डूइंग से क्रिएट नहीं करता — यह मात्र प्रिज़ाइडिंग प्रेज़ेंस से क्रिएट करता है। एनालॉजी सूर्य है: यह एक्टिवली कुछ नहीं 'करता,' फिर भी इसकी प्रेज़ेंस में, अर्थ पर सब लाइफ ग्रो करती है। इन्फ्लुएंस का प्रोफाउंड मॉडल है। रूम में सबसे पावरफुल प्रेज़ेंस अक्सर वह नहीं जो सबसे ज़्यादा कर रहा है — वह है जिसकी स्टेडी प्रेज़ेंस बाकी सब को अच्छी तरह फंक्शन करने देती है। डीपेस्ट पावर हमेशा फ्रैंटिक एक्टिविटी नहीं; कभी-कभी यह तुम्हारी प्रेज़ेंस की क्वालिटी है।
भगवद्गीता 9.10 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण समझाते हैं कि वे मुक्त और आराम से रहते हुए सब कुछ कैसे बनाते हैं! वे कहते हैं: प्रकृति चीज़ें बनाने का सब वास्तविक काम करती है, पर यह सब उनकी प्रेमपूर्ण देखरेख और उपस्थिति में होता है! यह सूर्य की तरह है — सूर्य काम करने इधर-उधर नहीं दौड़ता, पर क्योंकि सूर्य चमक रहा है, सब पौधे बढ़ते हैं, फूल खिलते हैं! उसी कोमल तरीके से, भगवान की उपस्थिति सब कुछ काम कराती है। यहाँ एक मज़ेदार सबक है: कभी-कभी सबसे शक्तिशाली चीज़ जल्दबाज़ी में दस लाख काम करना नहीं — यह एक शांत, स्थिर, देखभाल करने वाली उपस्थिति होना है!
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 9.10 का अर्थ क्या है?
ईश्वर की अध्यक्षता में प्रकृति समस्त चर-अचर प्राणियों को प्रकट करती है, और इसी से संसार घूमता है। प्रभु वह स्थिर आधार हैं जिसके अधीन प्रकृति अपना कार्य करती है।
यह श्लोक किसने कहा?
भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, नौवें अध्याय (राजविद्या योग) में, यह बताते हुए कि सृष्टि उनकी अध्यक्षता में कैसे चलती है।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण परम गुह्य ज्ञान प्रकट करते हैं — समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं फिर भी वे उनसे बद्ध नहीं। वे वचन देते हैं कि प्रेमपूर्ण भक्ति पापी को भी तार देती है, और प्रेम से अर्पित सब कुछ वे स्वीकार करते हैं।
अध्याय पढ़ें →✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 9.10 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 9.10 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
Chinmaya Mission
Chinmaya Mission — Swami Chinmayananda's organisation, whose Bhagavad Gita commentary is cited on this site.
Chinmaya Mission →