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अध्याय 8 · श्लोक 18अक्षरब्रह्म योग

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श्लोक 18 / 28

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥

लिप्यंतरण

avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyahar-āgame rātryāgame pralīyante tatraivāvyakta-sanjñake

शब्दार्थ (अन्वय)

avyaktāt
from the unmanifested
vyaktayaḥ
the manifested
sarvāḥ
all
prabhavanti
emanate
ahaḥ-āgame
at the advent of Brahma’s day
rātri-āgame
at the fall of Brahma’s night
pralīyante
they dissolve
tatra
into that
eva
certainly
avyakta-sanjñake
in that which is called the unmanifest

भावार्थ

ब्रह्माजीके दिनके आरम्भकालमें अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं और ब्रह्माजीकी रातके आरम्भकालमें उसी अव्यक्तमें सम्पूर्ण प्राणी लीन हो जाते हैं।

व्याख्या

"अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे, रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।" — (ब्रह्मा के) दिन के आगमन पर, सब व्यक्तियाँ अव्यक्त से उत्पन्न होती हैं; रात्रि के आगमन पर, वे उसी अव्यक्त में विलीन हो जाती हैं। श्रीकृष्ण ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति और विघटन की महान लय का वर्णन करते हैं। 'अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्ति अहरागमे' — ब्रह्मा के दिन के आगमन पर, सब व्यक्त प्राणी 'अव्यक्त,' अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं। 'रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्र एव अव्यक्तसंज्ञके' — रात्रि के आगमन पर, वे उसी अव्यक्त में विलीन हो जाती हैं। शंकराचार्य इस ब्रह्मांडीय लय को समझाते हैं: पूरा व्यक्त ब्रह्माण्ड समय-समय पर एक अव्यक्त अवस्था से उभरता है, उस दिन की विशाल अवधि के लिए रहता है, और फिर अव्यक्त में वापस सिमट जाता है। यह ब्रह्माण्ड की महान श्वास है।

भगवद्गीता 8.18 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण ब्रह्माण्ड को ही श्वास लेते वर्णित करते हैं — अव्यक्त से अभिव्यक्ति उठती है, रहती है, फिर वापस विलीन होती है, विशाल दोहराव चक्रों में। यहाँ तक कि पूरा ब्रह्माण्ड भी उठने और गुज़रने की लय से मुक्त नहीं। इस सार्वभौमिक पैटर्न को पहचानने में गहरी शांति उपलब्ध है: जो कुछ प्रकट होता है अंततः अपने स्रोत में वापस विलीन होता है, और यह त्रासदी नहीं — यह अस्तित्व की मौलिक लय है। आधुनिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान इसे प्रतिध्वनित करता है: तारे बनते और मरते हैं। जब तुम इस लय से लड़ना बंद करते हो, एक गहन स्वीकृति सम्भव होती है।

भगवद्गीता 8.18 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण कॉस्मॉस को ही ब्रीदिंग के रूप में डिस्क्राइब करते हैं — अव्यक्त से मैनिफेस्टेशन उठता है, एग्ज़िस्ट करता है, फिर वापस डिज़ॉल्व होता है, इमेन्स रिपीटिंग साइकल्स में। यहाँ तक कि पूरा यूनिवर्स भी अराइज़िंग और पासिंग की रिदम से एग्ज़ेम्प्ट नहीं। इस यूनिवर्सल पैटर्न को रिकग्नाइज़ करने में डीप पीस अवेलेबल है: जो प्रकट होता है अंततः अपने सोर्स में वापस डिज़ॉल्व होता है, और यह ट्रैजेडी नहीं — यह एग्ज़िस्टेंस की फंडामेंटल रिदम है। एंडिंग्स फेलियर नहीं; रियलिटी की ब्रीदिंग का हिस्सा हैं।

भगवद्गीता 8.18 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण वर्णन करते हैं कि पूरा ब्रह्माण्ड एक बड़ी लय में कैसे काम करता है, साँस अंदर-बाहर लेने जैसे! जब ब्रह्मा का 'दिन' शुरू होता है, सब कुछ एक अदृश्य, छिपी अवस्था से प्रकट होता और जीवित होता है। जब उनकी 'रात्रि' आती है, सब कुछ धीरे से उसी छिपी अवस्था में आराम के लिए वापस चला जाता है। फिर यह सब फिर शुरू होता है! यह वैसे ही है जैसे फूल वसंत में खिलते हैं और सर्दियों में आराम करते हैं, बार-बार। जो कुछ प्रकट होता है अंततः वहीं लौटता है जहाँ से आया — और यह उदास नहीं, यह सुंदर लय है!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म आदि की परिभाषा देते हैं और बताते हैं कि अन्तकाल का स्मरण अगली गति निर्धारित करता है। शुक्ल और कृष्ण मार्ग तथा निरंतर ईश्वर-स्मरण का महत्त्व बताया गया है।

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