अध्याय 6 · श्लोक 45— आत्मसंयम योग (ध्यान योग)
Read this verse in English →प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥
लिप्यंतरण
prayatnād yatamānas tu yogī sanśhuddha-kilbiṣhaḥ aneka-janma-sansiddhas tato yāti parāṁ gatim
शब्दार्थ (अन्वय)
- prayatnāt
- — with great effort
- yatamānaḥ
- — endeavoring
- tu
- — and
- yogī
- — a yogi
- sanśhuddha
- — purified
- kilbiṣhaḥ
- — from material desires
- aneka
- — after many, many
- janma
- — births
- sansiddhaḥ
- — attain perfection
- tataḥ
- — then
- yāti
- — attains
- parām
- — the highest
- gatim
- — path
भावार्थ
परन्तु जो योगी प्रयत्नपूर्वक यत्न करता है और जिसके पाप नष्ट हो गये हैं तथा जो अनेक जन्मोंसे सिद्ध हुआ है, वह योगी फिर परमगतिको प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या
"प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः, अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।" — पर लगन से प्रयास करने वाला योगी, सब पापों से शुद्ध, अनेक जन्मों में सिद्ध होकर, तब परम गति को प्राप्त करता है। श्रीकृष्ण कम पड़ने वाले साधक के बारे में सांत्वना उपदेश (6.37-45) को एक निश्चायक वादे से समाप्त करते हैं। 'प्रयत्नाद्यतमानः' — निरंतर, लगन भरे प्रयास से प्रयास करते हुए। 'संशुद्धकिल्बिषः' — सब पापों (किल्बिष) से पूर्णतः शुद्ध। 'अनेकजन्मसंसिद्धः' — अनेक जन्मों में सिद्ध: शंकराचार्य इस वाक्यांश पर बल देते हैं। पूर्णता को कई जीवनों भर प्रयास चाहिए हो सकता है। पर — और यह आश्वस्ति है — संचयी प्रयास अंततः पूर्णता तक पहुँचता है। 'ततो याति परां गतिम्' — तब वह परम गति को प्राप्त करता है। यह अर्जुन के चिंतित प्रश्न का विजयी समाधान है। पथ पूरी तरह सुरक्षित है।
भगवद्गीता 6.45 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण का इस पर अंतिम शब्द एक पूर्ण गारंटी है: जो साधक प्रयास करता रहता है वह उच्चतम लक्ष्य तक पहुँचेगा ही — शायद एक जीवन में नहीं, पर प्रयास की सुरक्षित निरंतरता से, अंततः और निश्चित रूप से। 'अनेक जन्मों में सिद्ध' वाक्यांश गहन तनाव-राहत लाता है: तुम्हें सब कुछ अभी, एक बार में, दबाव में हासिल नहीं करना। यात्रा लम्बी पर पूरी तरह सुरक्षित है। हमारी उपलब्धि-ग्रस्त, तत्काल-परिणाम संस्कृति के लिए यह औषधि है।
भगवद्गीता 6.45 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण का यहाँ फाइनल वर्ड एक कम्प्लीट गारंटी है: जो सीकर स्ट्राइव करता रहता है वह हाईएस्ट गोल तक पहुँचेगा ही — शायद एक लाइफटाइम में नहीं, पर एफर्ट की सिक्योर्ड कंटिन्युटी से, एवेंचुअली और सर्टनली। 'अनेक जन्मों में सिद्ध' फ्रेज़ बड़ी स्ट्रेस-रिलीफ लाता है: तुम्हें सब कुछ अभी, एक शॉट में अचीव नहीं करना। जर्नी लम्बी पर टोटली सेफ है। हमारी इंस्टेंट-रिज़ल्ट्स कल्चर के लिए यह मेडिसिन है।
भगवद्गीता 6.45 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण सबसे आश्वस्त करने वाला वादा देते हैं! वे कहते हैं: जो साधक अपना सर्वश्रेष्ठ करता रहता है, अधिक से अधिक शुद्ध होता हुआ, निश्चित रूप से उच्चतम लक्ष्य तक पहुँचेगा — भले ही इसमें कई, कई जीवन लगें! तो तुम्हें तुरंत परफेक्ट नहीं होना या सब कुछ एक बार में नहीं करना। बस अच्छे हृदय से कोशिश करते रहो, थोड़ा-थोड़ा, और तुम वहाँ ज़रूर पहुँचोगे! बस चलते रहो!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।
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