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अध्याय 6 · श्लोक 40आत्मसंयम योग (ध्यान योग)

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श्लोक 40 / 47

श्री भगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। नहि कल्याणकृत्कश्िचद्दुर्गतिं तात गच्छति॥

लिप्यंतरण

śhrī bhagavān uvācha pārtha naiveha nāmutra vināśhas tasya vidyate na hi kalyāṇa-kṛit kaśhchid durgatiṁ tāta gachchhati

शब्दार्थ (अन्वय)

śhrī-bhagavān uvācha
the Supreme Lord said
pārtha
Arjun, the son of Pritha
na eva
never
iha
in this world
na
never
amutra
in the next world
vināśhaḥ
destruction
tasya
his
vidyate
exists
na
never
hi
certainly
kalyāṇa-kṛit
one who strives for God-realization
kaśhchit
anyone
durgatim
evil destination
tāta
my friend
gachchhati
goes

भावार्थ

श्रीभगवान् बोले -- हे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता।

व्याख्या

"श्रीभगवानुवाच: पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते, न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति।" — श्रीभगवान ने कहा: हे पार्थ, उसका न इस लोक में न परलोक में विनाश होता है; क्योंकि हे प्रिय, कल्याण करने वाला कोई दुर्गति को नहीं जाता। श्रीकृष्ण का उत्तर एक ज़ोरदार, पूर्ण आश्वासन से शुरू होता है, अर्जुन द्वारा 6.37-38 में बनाए पूरे डर को घोलते हुए। 'न एव इह न अमुत्र विनाशः तस्य विद्यते' — उसका विनाश न यहाँ न वहाँ है। बिखरे बादल की भयावह छवि सीधे अस्वीकार कर दी जाती है। फिर गीता में सबसे सुंदर आश्वासनों में से एक: 'न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति' — कोई भी जो भला करता है कभी बुरी गति को नहीं जाता। श्रीकृष्ण अर्जुन को कोमलता से 'तात' — स्नेहपूर्ण सम्बोधन, जैसे 'प्रिय बच्चे' — कहते हैं। यह श्लोक आशा की नींव है। भले की ओर कोई वास्तविक कदम कभी व्यर्थ नहीं जाता।

भगवद्गीता 6.40 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण का उत्तर शुद्ध आश्वासन है, और यह गहन है: कोई भी जो भला करता है कभी बुरी गति को नहीं जाता — न इस जीवन में, न बाद में। भयावह 'बिखरे बादल' परिदृश्य को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया जाता है। गहरा सिद्धांत: भले की ओर ईमानदार प्रयास स्वयं अच्छा कर्म है, और अच्छा कर्म कभी विनाश की ओर नहीं ले जाता। इसका मतलब विकास की ओर तुम्हारा हर वास्तविक कदम गिना जाता है, और कभी व्यर्थ नहीं जाता।

भगवद्गीता 6.40 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण का आंसर प्योर रीअश्योरेंस है और डीप जाता है: कोई भी जो गुड करता है कभी बैड एंड को नहीं जाता — न इस लाइफ में, न बाद में। वह डरावना 'स्कैटर्ड क्लाउड, दोनों तरफ से लॉस्ट' सिनेरियो? फ्लैटली रिजेक्टेड। कोर प्रिंसिपल: गुड की ओर सिन्सियर एफर्ट खुद गुड एक्शन है, और गुड एक्शन कभी रुइन की ओर नहीं ले जाता। ट्रांसलेशन: ग्रोथ की ओर तुम्हारा हर जेन्युइन स्टेप काउंट करता है, कभी वेस्ट नहीं होता।

भगवद्गीता 6.40 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण एक अद्भुत, सांत्वना देने वाला उत्तर देते हैं! वे प्यार से अर्जुन को 'प्रिय' कहते हैं और कहते हैं: 'चिंता मत करो! एक अच्छा व्यक्ति कभी नष्ट नहीं होता, न इस जीवन में न अगले में। कोई भी जो अच्छे काम करता है कभी बुरी गति को नहीं जाता!' तो अगर तुम अच्छा बनने और अच्छा करने की पूरी कोशिश करते हो — भले ही तुम पूरी तरह सफल न हो — तुम्हारा प्रयास हमेशा गिना जाता है! अच्छाई कभी व्यर्थ नहीं जाती!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

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