अध्याय 6 · श्लोक 10— आत्मसंयम योग (ध्यान योग)
Read this verse in English →योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥
लिप्यंतरण
yogī yuñjīta satatam ātmānaṁ rahasi sthitaḥ ekākī yata-chittātmā nirāśhīr aparigrahaḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- yogī
- — a yogi
- yuñjīta
- — should remain engaged in meditation
- satatam
- — constantly
- ātmānam
- — self
- rahasi
- — in seclusion
- sthitaḥ
- — remaining
- ekākī
- — alone
- yata-chitta-ātmā
- — with a controlled mind and body
- nirāśhīḥ
- — free from desires
- aparigrahaḥ
- — free from desires for possessions for enjoyment
भावार्थ
भोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीरको वशमें रखनेवाला योगी अकेला एकान्तमें स्थित होकर मनको निरन्तर परमात्मामें लगाये।
व्याख्या
"योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः, एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।" — योगी निरंतर मन को योग में लगाए, एकांत में स्थित, अकेला, मन और शरीर संयमित, इच्छा और संग्रह से रहित। साकार योगी के गुणों का वर्णन करने के बाद (6.7-9), श्रीकृष्ण अब ध्यान की व्यावहारिक विधि की ओर मुड़ते हैं, जो अध्याय के हृदय में है (6.10-6.15)। यह श्लोक पूर्वशर्तें बताता है। 'सततम्' — निरंतर, नियमित: ध्यान कभी-कभार नहीं बल्कि एक निरंतर अनुशासन है। 'रहसि स्थितः, एकाकी' — एकांत में स्थित, अकेला। 'यतचित्तात्मा' — मन और स्व संयमित। 'निराशीः' — अपेक्षा और लालसा से रहित। 'अपरिग्रह' — संग्रह से रहित। शंकराचार्य यहाँ व्यावहारिक मनोविज्ञान पर ध्यान देते हैं: एकांत और सम्पत्ति और लालसा की अनुपस्थिति वह ईंधन हटाती है जो मन को उत्तेजित रखता है।
भगवद्गीता 6.10 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण की ध्यान-पूर्वशर्तें आश्चर्यजनक रूप से व्यावहारिक और आधुनिक हैं: इसे नियमित करो, एकांत खोजो, अपने शरीर और मन को स्थिर करो, और परिणामों की लालसा और संग्रह की इच्छा दोनों छोड़ो। ध्यान दो कि अंतिम दो — अपेक्षा और संग्रह — मानसिक हैं, केवल शारीरिक नहीं। तुम स्थिरता में नहीं बस सकते जब तुम्हारा मन दर्शकों के लिए प्रदर्शन कर रहा हो या एक 'अच्छे सत्र' का भूखा हो।
भगवद्गीता 6.10 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण का मेडिटेशन स्टार्टर पैक चौंकाने वाला प्रैक्टिकल है: इसे रेगुलरली करो, असली सॉलिट्यूड ढूँढो (इनपुट कट करो), बॉडी और माइंड स्टेडी करो, और दो चीज़ें ड्रॉप करो — रिज़ल्ट की क्रेविंग और अक्युमुलेट करने की अर्ज। नोटिस करो आखिरी दो मेंटल हैं। तुम लिटरली स्टिलनेस में नहीं जा सकते जब तुम्हारा ब्रेन इमेजिनरी ऑडियंस के लिए परफॉर्म कर रहा हो।
भगवद्गीता 6.10 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण अच्छी तरह ध्यान करने का तरीका देते हैं: इसे नियमित करो, एक शांत, शांतिपूर्ण जगह अकेले ढूँढो, अपने शरीर और मन को शांत करो, और इनाम की इच्छा या बहुत सी चीज़ें रखने की चिंता मत करो। यह एक शांतिपूर्ण झपकी के लिए तैयार होने जैसा है — तुम एक शांत जगह ढूँढते हो, बैठ जाते हो, और पहले अपनी सब चिंताएँ छोड़ देते हो!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।
अध्याय पढ़ें →