अध्याय 5 · श्लोक 9— कर्म संन्यास योग
Read this verse in English →प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥
लिप्यंतरण
pralapan visṛjan gṛhṇann unmiṣan nimiṣann api indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan
शब्दार्थ (अन्वय)
- pralapan
- — by talking
- visṛjan
- — by giving up
- gṛhṇan
- — by accepting
- unmiṣan
- — opening
- nimiṣan
- — closing
- api
- — in spite of
- indriyāṇi
- — the senses
- indriya-artheṣu
- — in sense gratification
- vartante
- — let them be so engaged
- iti
- — thus
- dhārayan
- — considering.
भावार्थ
तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता हुआ, श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी 'सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं' -- ऐसा समझकर 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' -- ऐसा माने।
व्याख्या
"प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि, इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्।" — बोलते, छोड़ते, पकड़ते, आँखें खोलते और बंद करते हुए भी — यह धारण करते: 'इन्द्रियाँ इन्द्रिय-विषयों में प्रवृत्त हैं।' यह श्लोक 5.8 के विचार को पूरा करता है। पिछले श्लोक ने अनैच्छिक गतिविधियाँ सूचीबद्ध कीं; यह जोड़ता है जानबूझकर कर्म (बोलना, छोड़ना, पकड़ना) और आँखों का कार्य। 'धारयन्' — यह समझ धारण करते हुए — वह सक्रिय अभ्यास है जो वर्णित है। केवल बौद्धिक रूप से जानना नहीं कि 'इन्द्रियाँ इन्द्रिय-विषयों में प्रवृत्त हैं' बल्कि कार्य होते समय भी उस पहचान को जीवित रखना। शंकराचार्य बताते हैं कि 'उन्मिषन् निमिषन्' — आँखें खोलना और बंद करना — विशेष रूप से इसलिए सम्मिलित है क्योंकि सबसे सरल, सबसे प्रतिवर्ती शारीरिक कर्म भी उसी सिद्धांत से शासित है। तत्त्वज्ञानी किसी भी कर्म को 'मेरा' नहीं दावा करता।
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'कार्य करते हुए यह समझ धारण करना' वह वर्णन है जिसे चिंतनशील साधक 'गतिविधि में पहचान' या 'खुली जागरूकता' कहते हैं। यह समाधि नहीं, संलग्नता से पीछे हटना नहीं। यह वह पृष्ठभूमि-ज्ञान है जो बोलते, प्रतिक्रिया देते, निर्णय लेते हुए भी उपस्थित रहता है। गीता फल नाम देती है: तुम पूर्णतः कार्य करते हो और बंधे नहीं।
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प्रैक्टिस यह है कि पहचान को धारण करना — 'इन्द्रियाँ अपना काम कर रही हैं' — पूरी तरह संलग्न रहते हुए भी। एक बार सोचकर भूल जाने वाला विचार नहीं। जैसे एक बैकग्राउंड टैब खुला रखना: तुम बात कर रहे हो, काम कर रहे हो, जी रहे हो — और नीचे एक शांत जानना है जो बिना दावा किए देखता है।
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रोज़मर्रा की चीज़ें करते हुए भी — बात करना, झपकी लेना, चीज़ें उठाना — बुद्धिमान व्यक्ति एक शांत आंतरिक ज्ञान रखता है: 'मेरा शरीर और इन्द्रियाँ ये कर रहे हैं; असली मैं बस देखता हूँ।' यह फिल्म देखते हुए यह जानने जैसा है कि तुम फिल्म देख रहे हो!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।
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