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अध्याय 5 · श्लोक 1कर्म संन्यास योग

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श्लोक 1 / 29

अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्िचतम्॥

लिप्यंतरण

arjuna uvācha sannyāsaṁ karmaṇāṁ kṛiṣhṇa punar yogaṁ cha śhansasi yach chhreya etayor ekaṁ tan me brūhi su-niśhchitam

शब्दार्थ (अन्वय)

arjunaḥ uvācha
Arjun said
sanyāsam
renunciation
karmaṇām
of actions
kṛiṣhṇa
Shree Krishna
punaḥ
again
yogam
about karm yog
cha
also
śhansasi
you praise
yat
which
śhreyaḥ
more beneficial
etayoḥ
of the two
ekam
one
tat
that
me
unto me
brūhi
please tell
su-niśhchitam
conclusively

भावार्थ

अर्जुन बोले -- हे कृष्ण ! आप कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी और फिर कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं। अतः इन दोनों साधनोंमें जो एक निश्चितरूपसे कल्याणकारक हो, उसको मेरे लिये कहिये।

व्याख्या

अर्जुन वह प्रश्न पूछता है जिसने अध्याय 3 से गीता के कई पाठकों को भ्रमित किया है: श्रीकृष्ण ने कर्म-संन्यास और कर्म-योग दोनों की प्रशंसा की है। निश्चित रूप से कौन बेहतर है? यह केवल दार्शनिक जिज्ञासा नहीं — अर्जुन को जानना है कि लड़े (कार्य करे) या युद्धभूमि छोड़ दे। प्रश्न एक सामान्य गलत पठन प्रकट करता है: कि संन्यास और कर्म योग विरोधी पथ हैं, एक स्पष्ट रूप से श्रेष्ठ। अर्जुन मानता है कि श्रीकृष्ण एक को प्राथमिकता देते होंगे। शंकराचार्य बताते हैं कि प्रश्न स्वयं अधूरी समझ प्रकट करता है — अर्जुन अभी भी बाहरी संन्यास को संन्यास का सर्वोच्च रूप मान रहा है। गीता यह स्पष्ट करेगी कि वास्तविक संन्यास आंतरिक है: कर्म के अहंकार-स्वामित्व और परिणामों की इच्छा का त्याग। प्रश्न व्यक्तिगत रूप से भी अत्यावश्यक है: दोनों पथ अर्जुन के लिए इस क्षण उपलब्ध हैं। वह धनुष रख सकता है या अनासक्ति के साथ लड़ सकता है। श्रीकृष्ण का उत्तर दिखाएगा कि दूसरा पथ अधिक सुलभ और अधिकांश लोगों के लिए अधिक प्रभावी है।

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प्रश्न 'क्या मुझे त्यागना चाहिए या संलग्न रहना चाहिए?' चिरंतन है। हर पीढ़ी इसका सामना अलग-अलग रूपों में करती है: कठिन नौकरी में रहें या छोड़ें? कठिन रिश्ते में रहें या समाप्त करें? कर्म की दुनिया में रहें या चिंतन की ओर पीछे हटें? गीता का उत्तर सरल द्विभाजन नहीं है। प्रश्न स्वयं गलत आधार पर टिका हो सकता है — कि बाहरी संन्यास आवश्यक रूप से संलग्न, अनासक्त कर्म से अधिक आध्यात्मिक है।

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अर्जुन बेसिकली पूछता है: क्या मुझे सब छोड़कर साधु बनना चाहिए, या दुनिया में रहकर अनासक्ति से कर्तव्य करना चाहिए? 'क्या मुझे सब छोड़कर खुद को खोजने जाना चाहिए या यहाँ रहकर ज़िम्मेदारियों से निपटना चाहिए?' का पुराना संस्करण। श्रीकृष्ण का जवाब या/या से सूक्ष्म है।

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अर्जुन श्रीकृष्ण से एक बड़ा प्रश्न पूछता है: 'कौन बेहतर है — सब काम छोड़कर शांत साधु बनना, या दुनिया में कर्तव्य करते रहना?' यह एक बढ़िया प्रश्न है! श्रीकृष्ण बताने वाले हैं कि अंदर की बात बाहर से अधिक मायने रखती है।

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण संन्यास और कर्मयोग में समन्वय करते हैं — दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर निष्काम कर्म सुगम है। ज्ञानी कमलपत्र की भाँति अनासक्त रहकर कर्म करता है।

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