अध्याय 16 · श्लोक 12— दैवासुर सम्पद् विभाग योग
Read this verse in English →आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥
लिप्यंतरण
āśhā-pāśha-śhatair baddhāḥ kāma-krodha-parāyaṇāḥ īhante kāma-bhogārtham anyāyenārtha-sañchayān
शब्दार्थ (अन्वय)
- āśhā-pāśha
- — bondage of desires
- śhataiḥ
- — by hundreds
- baddhāḥ
- — bound
- kāma
- — lust
- krodha
- — anger
- parāyaṇāḥ
- — dedicated to
- īhante
- — strive
- kāma
- — lust
- bhoga
- — gratification of the senses
- artham
- — for
- anyāyena
- — by unjust means
- artha
- — wealth
- sañchayān
- — to accumulate
भावार्थ
वे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धन-संचय करनेकी चेष्टा करते रहते हैं।
व्याख्या
श्रीकृष्ण इच्छा के बाँधने वाले प्रभाव का वर्णन करते हैं: 'आशा के सैकड़ों बंधनों से बँधे, काम और क्रोध में लीन, वे इच्छाओं की तृप्ति के लिए अन्यायपूर्ण साधनों से धन के ढेर इकट्ठा करने का प्रयास करते हैं।' श्रीकृष्ण आसुरी जीवन का वर्णन जारी रखते हैं। शंकराचार्य जीवंत छवि 'आशा-पाश-शत' को उजागर करते हैं — 'आशा के सैकड़ों बंधनों से बँधे।' इच्छा-चालित व्यक्ति मुक्त नहीं बल्कि बँधा है — आशा, अपेक्षा, और लालसा के अनगिनत बंधनों से बँधा, हर इच्छा एक और रस्सी उन्हें बाँधती। और, इच्छा और क्रोध में लीन, वे धन का पीछा 'अन्यायपूर्ण साधनों' से भी करते हैं। यह दिखाता है कि इच्छा-चालित जीवन स्वाभाविक रूप से अनैतिक आचरण की ओर ले जाता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि शक्तिशाली और विरोधाभासी छवि है: 'आशा के सैकड़ों बंधनों से बँधे' — यह पहचान कि इच्छा का निर्दयी पीछा, स्वतंत्रता होने से दूर, वास्तव में बंधन का एक गहरा रूप है। हम सोचते हैं कि अपनी सब इच्छाओं का स्वतंत्र रूप से पीछा करने वाला व्यक्ति स्वतंत्रता की तस्वीर है। पर गीता विपरीत सत्य प्रकट करती है: ऐसा व्यक्ति 'सैकड़ों बंधनों से बँधा' है — हर आशा, हर लालसा एक और रस्सी। क्यों? क्योंकि हर इच्छा एक निर्भरता बनाती है। जितना अधिक तुम चाहते हो, उतने अधिक बंधन तुम्हें बाँधते हैं। सबक: इस धारणा पर प्रश्न करो कि अपनी सब इच्छाओं का स्वतंत्र पीछा स्वतंत्रता है। वास्तविक स्वतंत्रता हर इच्छा को संतुष्ट करना नहीं; यह अंतहीन इच्छा द्वारा शासित होने से मुक्त होना है।
भगवद्गीता 16.12 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि शक्तिशाली और गहराई से विरोधाभासी छवि है: 'आशा के सैकड़ों बंधनों से बँधे' — यह पहचान कि इच्छा का निर्दयी पीछा, स्वतंत्रता होने से दूर, वास्तव में बंधन का एक गहरा और अक्सर अपरिचित रूप है। हम दृढ़ता से सोचते हैं कि अपनी सब इच्छाओं का स्वतंत्र रूप से पीछा करने वाला व्यक्ति स्वतंत्रता की तस्वीर है — जो चाहे करता, असीमित। पर गीता ठीक विपरीत सत्य प्रकट करती है: ऐसा व्यक्ति वास्तव में 'सैकड़ों बंधनों से बँधा' है — हर आशा, हर लालसा एक और रस्सी। क्यों? क्योंकि हर एक इच्छा एक नई निर्भरता बनाती है: अब तुम्हारी शांति इस विशेष चीज़ को पाने पर निर्भर है। जितना अधिक तुम चाहते हो, उतने अधिक बंधन तुम्हें बाँधते हैं। और आगे का परिणाम ध्यान दो: जब इच्छा सब कुछ बन जाती है, नैतिकता बलिदान होती है। इच्छा केवल बाँधती नहीं; यह भ्रष्ट करती है। सबक: इस धारणा पर प्रश्न करो कि अपनी सब इच्छाओं का स्वतंत्र पीछा स्वतंत्रता के बराबर है। वास्तविक स्वतंत्रता अंतहीन इच्छा द्वारा शासित होने से मुक्त होना है।
भगवद्गीता 16.12 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट पावरफुल और डीपली पैराडॉक्सिकल इमेज है: 'आशा के सैकड़ों कॉर्ड्स से बँधे' — यह रिकग्निशन कि डिज़ायर का रिलेंटलेस पर्स्यूट, फ्रीडम होने से दूर, वास्तव में बॉन्डेज का एक प्रोफाउंड फॉर्म है। हम सोचते हैं कि अपनी सब डिज़ायर्स का फ्रीली पीछा करने वाला व्यक्ति फ्रीडम की पिक्चर है — जो चाहे करता, अनकंस्ट्रेन्ड। पर गीता ठीक ऑपोज़िट ट्रुथ रिवील करती है: ऐसा व्यक्ति वास्तव में 'सैकड़ों कॉर्ड्स से बँधा' है — हर होप, हर क्रेविंग एक और रोप। क्यों? क्योंकि हर एक डिज़ायर एक नई डिपेंडेंसी बनाती है: अब तुम्हारी पीस इस चीज़ को पाने पर डिपेंड है। जितना ज़्यादा तुम चाहते हो, उतने ज़्यादा कॉर्ड्स तुम्हें बाइंड करते हैं। और आगे का कन्सीक्वेंस नोटिस करो: जब डिज़ायर सब कुछ बन जाती है, एथिक्स सैक्रिफाइस होती है। डिज़ायर केवल बाइंड नहीं करती; यह करप्ट करती है। सबक: इस असम्प्शन पर सवाल करो कि अपनी सब डिज़ायर्स का फ्री पीछा फ्रीडम के बराबर है। रियल फ्रीडम एंडलेस डिज़ायर द्वारा रूल्ड होने से फ्री होना है।
भगवद्गीता 16.12 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण एक शक्तिशाली तस्वीर से एक आश्चर्यजनक विचार साझा करते हैं: वे कहते हैं अंतहीन इच्छा से चालित लोग 'सैकड़ों रस्सियों से बँधे' हैं! वे बिल्कुल मुक्त नहीं — वे सब उलझे और बँधे हैं! यहाँ आश्चर्यजनक हिस्सा है: हम आमतौर पर सोचते हैं कोई जो जो चाहे कर सकता है वह मुक्त है। पर श्रीकृष्ण विपरीत कहते हैं — वे वास्तव में सबसे ज़्यादा बँधे हैं! कैसे? सोचो: हर एक चीज़ जो तुम्हें 'चाहिए ही' एक रस्सी बन जाती है जो तुम्हें बाँधती है! 'मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए...' — उनमें से हर एक एक रस्सी है! जितनी अधिक चीज़ें तुम बेताबी से चाहते हो, उतनी अधिक रस्सियाँ तुम्हारे चारों ओर लिपटी हैं! तो सब कुछ चाहना स्वतंत्रता नहीं — यह सौ रस्सियों से बँधना है! और एक और समस्या: जब जो चाहते हो उसे पाना सबसे महत्त्वपूर्ण बन जाता है, लोग इसे पाने के लिए गलत चीज़ें करने लगते हैं! तो वास्तविक स्वतंत्रता सब कुछ पाना नहीं — यह अंतहीन चाहना से शासित न होना है! कम इच्छाएँ, कम रस्सियाँ, अधिक स्वतंत्रता!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण मोक्ष की ओर ले जाने वाले दैवी गुणों और बंधन में डालने वाले आसुरी गुणों का अंतर बताते हैं। काम, क्रोध और लोभ — नरक के तीन द्वार — से सचेत करते हैं और शास्त्र को प्रमाण बताते हैं।
अध्याय पढ़ें →