अध्याय 16 · श्लोक 10— दैवासुर सम्पद् विभाग योग
Read this verse in English →काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥
लिप्यंतरण
kāmam āśhritya duṣhpūraṁ dambha-māna-madānvitāḥ mohād gṛihītvāsad-grāhān pravartante ’śhuchi-vratāḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- kāmam
- — lust
- āśhritya
- — harboring
- duṣhpūram
- — insatiable
- dambha
- — hypocrisy
- māna
- — arrogance
- mada-anvitāḥ
- — clinging to false tenets
- mohāt
- — the illusioned
- gṛihītvā
- — being attracted to
- asat
- — impermanent
- grāhān
- — things
- pravartante
- — they flourish
- aśhuchi-vratāḥ
- — with impure resolve
भावार्थ
कभी पूरी न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेकर दम्भ, अभिमान और मदमें चूर रहनेवाले तथा अपवित्र व्रत धारण करनेवाले मनुष्य मोहके कारण दुराग्रहोंको धारण करके संसारमें विचरते रहते हैं।
व्याख्या
श्रीकृष्ण इच्छा में आसुरी तल्लीनता का वर्णन करते हैं: 'अतृप्त इच्छा से चिपके, पाखंड, अभिमान, और मद से भरे, मोह के कारण मिथ्या दृष्टि थामे, वे अशुद्ध संकल्पों से कार्य करते हैं।' श्रीकृष्ण आसुरी की आंतरिक स्थिति का वर्णन करते हैं। शंकराचार्य मुख्य वाक्यांश 'कामं दुष्पूरम्' को उजागर करते हैं — अतृप्त इच्छा, इच्छा जो कभी भरी नहीं जा सकती। यह आसुरी जीवन का इंजन है: एक लालसा जो, चाहे कितना भी पाए, कभी संतुष्ट नहीं, हमेशा और माँगती। इस अतृप्त इच्छा में 'शरण' लेकर (इसे जीवन का केंद्र और चालक शक्ति बनाकर), और पाखंड, अभिमान, और मद से भरे, आसुरी मिथ्या दृष्टि थामते हैं। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि 'कामं दुष्पूरम्' का सटीक निदान है — अतृप्त इच्छा, लालसा जो कभी भरी नहीं जा सकती — एक अपमानित जीवन के इंजन के रूप में। यह एक विशेष और बहुत सामान्य जाल का तीव्रता से सटीक वर्णन है। 'अतृप्त' शब्द ध्यान दो: यह इच्छा स्वयं नहीं जो समस्या के रूप में नाम की गई, बल्कि इच्छा जो कभी संतुष्ट नहीं हो सकती। त्रासदी 'अतृप्त' शब्द में निर्मित है: क्योंकि इच्छा कभी वास्तव में भरी नहीं जा सकती, इसके चारों ओर संगठित जीवन निरंतर असंतोष के लिए अभिशप्त है। यह एक उपभोक्ता संस्कृति में तीव्रता से प्रासंगिक है जो ठीक हमारी इच्छाओं को अतृप्त रखने के लिए बनाई गई है। सबक: अतृप्त इच्छा के जाल को नोटिस करो। बाहर का रास्ता और पाना नहीं — यह संतोष में अपना केंद्र खोजना है।
भगवद्गीता 16.10 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि 'कामं दुष्पूरम्' का तीव्रता से सटीक निदान है — अतृप्त इच्छा, लालसा जो कभी भरी नहीं जा सकती — एक अपमानित जीवन के इंजन के रूप में। यह एक विशेष और अत्यंत सामान्य आधुनिक जाल का उल्लेखनीय रूप से सटीक वर्णन है। महत्त्वपूर्ण शब्द 'अतृप्त' ध्यान दो: यह इच्छा स्वयं नहीं जो समस्या के रूप में नाम की गई (इच्छा स्वाभाविक है), बल्कि इच्छा जो कभी संतुष्ट नहीं हो सकती — अथाह लालसा जो, चाहे कितना भी पाए, हमेशा तुरंत और माँगती है। यह अंतहीन चाहना का ट्रेडमिल है, यहाँ अपने सबसे भस्म करने वाले रूप में: इस अतृप्त लालसा को अपने पूरे जीवन का केंद्र और शरण बनाना। त्रासदी 'अतृप्त' शब्द में निर्मित है: क्योंकि इच्छा कभी वास्तव में भरी नहीं जा सकती, इसके चारों ओर संगठित जीवन निरंतर असंतोष के लिए संरचनात्मक रूप से अभिशप्त है। यह एक उपभोक्ता संस्कृति में तीव्रता से प्रासंगिक है जो ठीक हमारी इच्छाओं को अतृप्त रखने के लिए बनाई गई है। सबक: अतृप्त इच्छा के जाल को स्पष्ट रूप से नोटिस करो। बाहर का रास्ता और पाना नहीं — यह संतोष में अपना केंद्र खोजना है।
भगवद्गीता 16.10 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट 'कामं दुष्पूरम्' का पियर्सिंगली प्रिसाइज़ डायग्नोसिस है — इनसेशिएबल डिज़ायर, क्रेविंग जो कभी फिल नहीं हो सकती — एक डिग्रेडेड लाइफ के इंजन के रूप में। यह एक एक्सट्रीमली कॉमन मॉडर्न ट्रैप का रिमार्केबली एक्यूरेट डिस्क्रिप्शन है। क्रूशियल शब्द 'इनसेशिएबल' नोटिस करो: यह डिज़ायर खुद नहीं जो प्रॉब्लम के रूप में नेम की गई (डिज़ायर नैचुरल है), बल्कि डिज़ायर जो कभी सैटिस्फाइड नहीं हो सकती — बॉटमलेस क्रेविंग जो, चाहे कितना भी पाए, हमेशा तुरंत और डिमांड करती है। यह एंडलेस वॉन्टिंग का ट्रेडमिल है, यहाँ अपने सबसे कंज़्यूमिंग फॉर्म में: इस इनसेशिएबल क्रेविंग को अपनी पूरी लाइफ का सेंटर और रेफ्यूज बनाना। ट्रैजेडी 'इनसेशिएबल' शब्द में बिल्ट है: क्योंकि डिज़ायर कभी फिल नहीं हो सकती, इसके आसपास ऑर्गनाइज़्ड लाइफ परपेचुअल डिससैटिस्फैक्शन के लिए डूम्ड है। यह एक कंज़्यूमर कल्चर में रेलेवेंट है जो ठीक हमारी डिज़ायर्स को इनसेशिएबल रखने के लिए इंजीनियर्ड है। सबक: इनसेशिएबल डिज़ायर के ट्रैप को नोटिस करो। बाहर का रास्ता और पाना नहीं — यह कंटेंटमेंट में अपना सेंटर खोजना है।
भगवद्गीता 16.10 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण वर्णन करते हैं कि अच्छे-नहीं लोगों को अंदर क्या चलाता है: एक इच्छा जो कभी भरी नहीं जा सकती — वे हमेशा और चाहते हैं, और कभी संतुष्ट नहीं! और वे इस कभी न समाप्त होने वाली चाहना को अपने पूरे जीवन का केंद्र बनाते हैं, मानो यह उनका भगवान हो। यहाँ मुख्य शब्द है: 'कभी संतुष्ट नहीं'! क्या तुमने नोटिस किया है कि कभी-कभी तुम कुछ सच में चाहते हो, अंततः पाते हो, एक छोटे क्षण के लिए खुश होते हो — और फिर तुरंत अगली चीज़ चाहते हो? वह जाल है जो श्रीकृष्ण वर्णन कर रहे हैं! जब तुम 'और चाहना' को अपने जीवन का केंद्र बनाते हो, तुम कभी खुश नहीं हो सकते! यह एक बाल्टी भरने की कोशिश जैसा है जिसके तल में छेद है! और कुछ महत्त्वपूर्ण: बहुत सारे विज्ञापन तुम्हें हमेशा और चाहते रहने के लिए बनाए गए हैं! तो बाहर का रास्ता संतुष्ट होने में खुशी पाना है — जो तुम्हारे पास है उससे कृतज्ञ और खुश होना! संतुष्ट रहो, और तुम मुक्त हो!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण मोक्ष की ओर ले जाने वाले दैवी गुणों और बंधन में डालने वाले आसुरी गुणों का अंतर बताते हैं। काम, क्रोध और लोभ — नरक के तीन द्वार — से सचेत करते हैं और शास्त्र को प्रमाण बताते हैं।
अध्याय पढ़ें →