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अध्याय 14 · श्लोक 23गुणत्रय विभाग योग

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श्लोक 23 / 27

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥

लिप्यंतरण

udāsīna-vad āsīno guṇair yo na vichālyate guṇā vartanta ity evaṁ yo ’vatiṣhṭhati neṅgate

शब्दार्थ (अन्वय)

udāsīna-vat
neutral
āsīnaḥ
situated
guṇaiḥ
to the modes of material nature
yaḥ
who
na
not
vichālyate
are disturbed
guṇāḥ
modes of material nature
vartante
act
iti-evam
knowing it in this way
yaḥ
who
avatiṣhṭhati
established in the self
na
not
iṅgate
wavering

भावार्थ

जो उदासीनकी तरह स्थित है और जो गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही (गुणोंमें) बरत रहे हैं -- इस भावसे जो अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता।

व्याख्या

श्रीकृष्ण गुणों से परे का वर्णन जारी रखते हैं: 'जो उदासीन की तरह बैठा, गुणों से विचलित नहीं होता; जो, यह जानते हुए कि केवल गुण कार्य करते हैं, स्थिर रहता है और हिलता नहीं।' श्रीकृष्ण वर्णन जारी रखते हैं। शंकराचार्य सुंदर वाक्यांश 'उदासीनवत्' समझाते हैं — 'उदासीन की तरह' बैठा, एक तटस्थ, अनासक्त साक्षी की तरह। गुणों से परे व्यक्ति तीन गुणों के खेल को एक अलग दर्शक की तरह देखता है। इस स्थिरता को आधार देने वाली मुख्य समझ है: 'गुण वर्तन्ते' — 'केवल गुण ही संचालित हो रहे हैं।' यह जानते हुए कि सब गतिविधि बस गुणों का अपना काम करना है (सच्चा स्व नहीं), वह स्थिर और अविचल रहता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि दो वाक्यांशों में पकड़ी शक्तिशाली मुद्रा है: 'उदासीन की तरह' बैठना और इसे इस ज्ञान में आधार देना कि 'केवल गुण कार्य करते हैं।' जब बेचैनी उठती है, 'मैं बेचैन हूँ' के बजाय, 'बेचैनी, रजस् की एक गति, हो रही है' है। फ्रेमिंग में यह सूक्ष्म बदलाव — 'मैं यह अवस्था हूँ' से 'यह अवस्था हो रही है' — फँसे होने और मुक्त होने के बीच पूरा अंतर बनाता है। सबक: अपनी आंतरिक अवस्थाओं के प्रति शांत, तटस्थ साक्षी की मुद्रा विकसित करो। तुम नदी नहीं; तुम वह हो जो इसे बहते देखता है।

भगवद्गीता 14.23 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि दो मुख्य वाक्यांशों में पकड़ी शक्तिशाली व्यावहारिक मुद्रा है: 'उदासीन की तरह' बैठना (एक शांत, तटस्थ साक्षी की तरह) और इस स्थिरता को इस ज्ञान में आधार देना कि 'केवल गुण कार्य करते हैं।' यह साक्षी की वास्तविक व्यावहारिक मुद्रा है, ठोस बनाई। जब गुण खेलते हैं, मुक्त व्यक्ति एक शांत, तटस्थ दर्शक की तरह देखता है। और इसे संभव बनाने वाली एक विशिष्ट समझ है: 'केवल गुण ही संचालित हो रहे हैं।' जब बेचैनी उठती है, 'मैं बेचैन हूँ' के बजाय, 'बेचैनी, रजस् की एक गति, अभी हो रही है' है। फ्रेमिंग में यह सूक्ष्म पर विशाल बदलाव फँसे होने और मुक्त होने के बीच पूरा अंतर बनाता है। यह बहती नदी में बह जाने और किनारे पर खड़े होकर नदी को बहते देखने के बीच का अंतर है। 'उदासीन की तरह' ठंडी अनासक्ति नहीं — यह साक्षी की शांत तटस्थता है। सबक: अपनी आंतरिक अवस्थाओं के प्रति शांत, तटस्थ साक्षी की मुद्रा विकसित करो। तुम नदी नहीं; तुम वह हो जो इसे शांति से बहते देखता है।

भगवद्गीता 14.23 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट दो की फ्रेज़ेज़ में कैप्चर्ड पावरफुल प्रैक्टिकल स्टांस है: 'उदासीन की तरह' बैठना (एक काम, न्यूट्रल विटनेस की तरह) और इस स्टेडीनेस को इस नॉलेज में ग्राउंड करना कि 'केवल गुण एक्ट करते हैं।' यह विटनेस की असली प्रैक्टिकल पोस्चर है, कंक्रीट बनाई। जब गुण प्ले होते हैं, लिबरेटेड व्यक्ति एक काम, न्यूट्रल स्पेक्टेटर की तरह वॉच करता है। और इसे पॉसिबल बनाने वाली एक स्पेसिफिक अंडरस्टैंडिंग है: 'केवल गुण ही ऑपरेट हो रहे हैं।' जब रेस्टलेसनेस उठती है, 'मैं रेस्टलेस हूँ' के बजाय, 'रेस्टलेसनेस, रजस् की एक मूवमेंट, अभी हो रही है' है। फ्रेमिंग में यह सटल पर ह्यूज शिफ्ट कैप्चर्ड होने और फ्री होने के बीच पूरा फर्क बनाता है। यह रशिंग रिवर में बह जाने और बैंक पर खड़े होकर रिवर को बहते देखने के बीच का फर्क है। सबक: अपनी इनर स्टेट्स के प्रति काम, न्यूट्रल विटनेस का स्टांस कल्टिवेट करो। तुम रिवर नहीं; तुम वह हो जो इसे काम्ली बहते देखता है।

भगवद्गीता 14.23 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण मुक्त व्यक्ति का और वर्णन करते हैं: वे एक शांत देखने वाले की तरह शांति से बैठते हैं, बदलती ऊर्जाओं से इधर-उधर नहीं फेंके जाते! और यहाँ रहस्य है जो उन्हें इतना स्थिर बनाता है: वे जानते हैं कि 'यह बस ऊर्जाएँ अपना काम कर रही हैं, असली मैं नहीं!' यहाँ शब्दों का एक जादुई ट्रिक है जो बहुत मदद करता है: 'मैं बेचैन हूँ' या 'मैं चिड़चिड़ा हूँ' कहने के बजाय, तुम कह सकते हो 'बेचैनी अभी हो रही है' या 'एक चिड़चिड़ी भावना गुज़र रही है।' अंतर देखो? जब तुम 'मैं चिड़चिड़ा हूँ' कहते हो, चिड़चिड़ापन ने तुम्हें पूरी तरह पकड़ लिया! पर जब तुम 'एक चिड़चिड़ी भावना गुज़र रही है' कहते हो, तुम इसे नोटिस करने वाले शांत देखने वाले बन जाते हो — और तुम मुक्त हो! यह बहती नदी में बह जाने बनाम किनारे पर सुरक्षित खड़े होकर देखने के बीच का अंतर है! तो किनारे पर शांत देखने वाले बनो!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण तीन गुणों — सत्त्व, रज और तम — का वर्णन करते हैं कि वे आत्मा को कैसे बाँधते हैं, उनके लक्षण, और गुणातीत होकर अमरत्व की प्राप्ति बताते हैं।

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