अध्याय 14 · श्लोक 22— गुणत्रय विभाग योग
Read this verse in English →श्री भगवानुवाचप्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥
लिप्यंतरण
śhrī-bhagavān uvācha prakāśhaṁ cha pravṛittiṁ cha moham eva cha pāṇḍava na dveṣhṭi sampravṛittāni na nivṛittāni kāṅkṣhati
शब्दार्थ (अन्वय)
- śhrī-bhagavān uvācha
- — the Supreme Divine Personality said
- prakāśham
- — illumination
- cha
- — and
- pravṛittim
- — activity
- cha
- — and
- moham
- — delusion
- eva
- — even
- cha
- — and
- pāṇḍava
- — Arjun, the son of Pandu
- na dveṣhṭi
- — do not hate
- sampravṛittāni
- — when present
- na
- — nor
- nivṛittāni
- — when absent
- kāṅkṣhati
- — longs
भावार्थ
श्रीभगवान् बोले -- हे पाण्डव ! प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह -- ये सभी अच्छी तरहसे प्रवृत्त हो जायँ तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्वेष नहीं करता, और ये सभी निवृत्त हो जायँ तो इनकी इच्छा नहीं करता।
व्याख्या
श्रीकृष्ण उत्तर देना शुरू करते हैं: 'वह प्रकाश, गतिविधि, या भ्रम से घृणा नहीं करता जब वे उठते हैं, हे पांडव, न उनकी लालसा करता है जब वे रुक जाते हैं।' श्रीकृष्ण गुणों को लाँघने वाले का वर्णन शुरू करते हैं (14.21 के प्रश्नों का उत्तर देते हुए)। शंकराचार्य गुणों से परे व्यक्ति का पहला और मुख्य चिह्न समझाते हैं: सब तीन गुणों के प्रति एक गहन समता जैसे वे आते-जाते हैं। जब सत्त्व की स्पष्टता उपस्थित है, वह इसे पकड़ता नहीं; जब यह जाती है, वह इसके लिए तरसता नहीं। जब तमस् का भ्रम उतरता है, वह इससे घृणा नहीं करता। उसके पास सब अवस्थाओं के प्रति वही समता है — यहाँ तक कि 'अच्छी' अवस्था की लालसा या 'बुरी' अवस्था से घृणा भी नहीं। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि अपनी अवस्थाओं के साथ युद्ध में न होने की उल्लेखनीय स्वतंत्रता है — न अच्छी को पकड़ना न बुरी से घृणा करना। हमारी अवस्थाओं के आसपास हमारी अधिकांश पीड़ा अवस्थाओं से नहीं बल्कि उनके प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं से आती है। जब तुम निचले मूड में फँसे हो और खुद से घृणा भी कर रहे हो इसमें होने के लिए, तुम दुगुना पीड़ित होते हो। सबक: अपनी आंतरिक अवस्थाओं के साथ युद्ध में होना बंद करो। उन्हें मौसम की तरह आने-जाने दो, बिना सुखद को पकड़े या अप्रिय से लड़े। यह अप्रतिरोध स्वयं एक गहन स्वतंत्रता है।
भगवद्गीता 14.22 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
निकालने योग्य अंतर्दृष्टि अपनी आंतरिक अवस्थाओं के साथ युद्ध में न होने की उल्लेखनीय स्वतंत्रता है — न अच्छी को पकड़ना न बुरी से घृणा करना, बल्कि उन सबको वास्तविक समता के साथ आने-जाने देना। यह पहली नज़र से अधिक सूक्ष्म और गहरा है। हम अच्छी अवस्थाएँ विकसित करने और बुरी से बचने के विचार के आदी हैं। पर श्रीकृष्ण कुछ गहरा वर्णन करते हैं: सच में मुक्त व्यक्ति अच्छी अवस्थाओं की लालसा या बुरी से घृणा भी नहीं करता। मुख्य अहसास: हमारी अवस्थाओं के आसपास हमारी अधिकांश पीड़ा अवस्थाओं से नहीं बल्कि उनके प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं से आती है — अच्छी को बेताबी से पकड़ना और बुरी से घृणा और प्रतिरोध (जो विरोधाभासी रूप से उन्हें बदतर बनाता है)। सबक: अपनी आंतरिक अवस्थाओं के साथ युद्ध में होना बंद करो। उन्हें गुज़रते मौसम की तरह आने-जाने दो। यह अप्रतिरोध स्वयं एक गहन स्वतंत्रता है। अपने आंतरिक मौसम के साथ शांति बनाओ।
भगवद्गीता 14.22 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
निकालने योग्य इनसाइट अपनी इनर स्टेट्स के साथ वॉर में न होने की रिमार्केबल फ्रीडम है — न गुड वाली को ग्रास्प करना न बैड वाली से हेट करना, बल्कि उन सबको जेन्युइन इक्वैनिमिटी के साथ आने-जाने देना। यह पहली नज़र से ज़्यादा सटल है। हम गुड स्टेट्स कल्टिवेट करने और बैड से अवॉइड करने के आइडिया के आदी हैं। पर श्रीकृष्ण कुछ डीपर डिस्क्राइब करते हैं: सच में लिबरेटेड व्यक्ति गुड स्टेट्स की क्रेविंग या बैड से हेट भी नहीं करता। की रियलाइज़ेशन: हमारी स्टेट्स के आसपास हमारी अधिकांश सफरिंग स्टेट्स से नहीं बल्कि उनके प्रति हमारी रिएक्शन्स से आती है — गुड को डेस्परेटली ग्रास्प करना और बैड से हेट (जो आइरॉनिकली उन्हें वर्स बनाता है)। जब तुम लो मूड में कॉट हो AND खुद से हेट भी कर रहे हो, तुम डबल सफर करते हो। सबक: अपनी इनर स्टेट्स के साथ वॉर में होना बंद करो। उन्हें वेदर की तरह आने-जाने दो। यह नॉन-रेज़िस्टेंस खुद एक प्रोफाउंड फ्रीडम है।
भगवद्गीता 14.22 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्नों का उत्तर देना शुरू करते हैं, सच में मुक्त व्यक्ति के पहले चिह्न से! यहाँ यह है: एक मुक्त व्यक्ति अपनी भावनाओं और ऊर्जाओं से नहीं लड़ता! जब उज्ज्वल ऊर्जा आती है, वे इसका आनंद लेते हैं पर इसे कसकर नहीं पकड़ते। जब यह जाती है, वे इसके लिए नहीं रोते। जब धुंधली ऊर्जा आती है, वे इससे घृणा नहीं करते। वे सब ऊर्जाओं के आने-जाने के साथ शांत हैं! यहाँ एक बहुत सहायक विचार है: हमारी बहुत सी नाखुशी हमारी भावनाओं से नहीं, बल्कि भावनाओं से लड़ने से आती है! सोचो: जब तुम उदास महसूस करते हो और उदास महसूस करने के लिए खुद पर गुस्सा होते हो, तुम दुगुना बुरा महसूस करते हो! पर एक शांत व्यक्ति बस भावनाओं को आने-जाने देता है, आकाश में गुज़रते बादलों की तरह! और यहाँ जादू है: जब तुम एक बुरी भावना से लड़ना बंद करते हो, यह अक्सर तेज़ी से गुज़रती है! तो अपनी भावनाओं से युद्ध में मत रहो!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण तीन गुणों — सत्त्व, रज और तम — का वर्णन करते हैं कि वे आत्मा को कैसे बाँधते हैं, उनके लक्षण, और गुणातीत होकर अमरत्व की प्राप्ति बताते हैं।
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