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अध्याय 10 · श्लोक 7विभूति योग

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श्लोक 7 / 42

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥

लिप्यंतरण

etāṁ vibhūtiṁ yogaṁ cha mama yo vetti tattvataḥ so ’vikampena yogena yujyate nātra sanśhayaḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

etām
these
vibhūtim
glories
yogam
divine powers
cha
and
mama
my
yaḥ
those who
vetti
know
tattvataḥ
in truth
saḥ
they
avikalpena
unwavering
yogena
in bhakti yog
yujyate
becomes united
na
never
atra
here
sanśhayaḥ
doubt

भावार्थ

जो मनुष्य मेरी इस विभूतिको और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् दृढ़तापूर्वक मानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है; इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

व्याख्या

"एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः, सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः।" — जो मेरी इस विभूति और योग को तत्त्व से जानता है, वह अविचल योग से युक्त होता है। इसमें कोई संदेह नहीं। श्रीकृष्ण अपनी विभूति और शक्ति को सच में समझने का फल बताते हैं। 'एतां विभूतिं योगं च मम यः वेत्ति तत्त्वतः' — जो तत्त्व से इस 'विभूति' (दिव्य महिमा) और 'योग' (दिव्य शक्ति) को जानता है। 'सः अविकम्पेन योगेन युज्यते' — वह व्यक्ति 'अविकम्प योग' — अविचल, अडिग योग से युक्त होता है। शंकराचार्य सम्बन्ध समझाते हैं: जब कोई सच में पहचानता है कि सब गुण, सब प्राणी, संसार की सब महिमा एक दिव्य से उत्पन्न होती और उसे अभिव्यक्त करती है, उनकी भक्ति 'अविकम्प' — अडिग बन जाती है। हर जगह पवित्र देखना तुम्हें स्थिर करता है। जहाँ भी तुम देखते हो, तुम जिसे प्रेम करते हो वह पाते हो। यही अविचल योग है।

भगवद्गीता 10.7 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण समझाते हैं कि हर चीज़ में दिव्य महिमा पहचानना व्यावहारिक रूप से क्यों मायने रखता है: यह अडिग आंतरिक स्थिरता उत्पन्न करता है। अंतर्दृष्टि गहन है: हर जगह पवित्र देखना तुम्हें स्थिर करता है। तर्क यह है: अगर तुम्हारा अर्थ, सम्बन्ध और शांति का भाव कुछ विशेष चीज़ों पर निर्भर है — यह स्वाभाविक रूप से नाज़ुक है, क्योंकि वे खोई या बदली जा सकती हैं। पर अगर तुम अपने चारों ओर हर चीज़ में अभिव्यक्त गहनतम वास्तविकता पहचानते हो, तब तुम्हारी स्थिरता किसी विशेष परिस्थिति पर निर्भर नहीं। हर जगह पवित्र देखना तुम्हें अडिग बनाता है।

भगवद्गीता 10.7 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण समझाते हैं हर चीज़ में डिवाइन ग्लोरी रिकग्नाइज़ करना प्रैक्टिकली क्यों मैटर करता है: यह अनशेकेबल इनर स्टेडीनेस प्रोड्यूस करता है। इनसाइट प्रोफाउंड है: हर जगह सेक्रेड देखना तुम्हें स्टेबिलाइज़ करता है। लॉजिक: अगर तुम्हारा मीनिंग और पीस का सेंस कुछ स्पेशल चीज़ों पर डिपेंड करता है — यह फ्रैजाइल है, क्योंकि वे लॉस्ट हो सकती हैं। पर अगर तुम हर चीज़ में एक्सप्रेस्ड डीपेस्ट रियलिटी रिकग्नाइज़ करते हो, तुम्हारी स्टेडीनेस किसी एक सर्कमस्टेंस पर हिंज नहीं करती। हर जगह सेक्रेड देखना लिटरली तुम्हें अनशेकेबल बनाता है।

भगवद्गीता 10.7 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण समझाते हैं कि हर चीज़ में भगवान को देखना इतना सहायक क्यों है: यह तुम्हें अंदर से बहुत स्थिर और मज़बूत बनाता है, एक पहाड़ की तरह जिसे हिलाया नहीं जा सकता! यहाँ क्यों है: कल्पना करो अगर तुम्हारी खुशी केवल एक विशेष खिलौने से आती — अगर तुम इसे खो देते, तुम उदास होते! पर अगर तुम अपने चारों ओर हर चीज़ में कुछ अद्भुत देख सकते? तब चाहे कुछ भी हो, तुम हमेशा अद्भुत चीज़ों से घिरे रहते! जब तुम सब चीज़ों में दिव्य अच्छाई देखना सीखते हो, तुम्हारा हृदय शांत और स्थिर हो जाता है! कुछ भी तुम्हें हिला नहीं सकता!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं — वे प्रत्येक श्रेणी में श्रेष्ठ और सार रूप हैं। उन्हें सबका मूल जानकर भक्त का प्रेम पूर्ण समर्पण में बदल जाता है।

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