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अध्याय 10 · श्लोक 5विभूति योग

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श्लोक 5 / 42

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥

लिप्यंतरण

ahiṁsā samatā tuṣṭis tapo dānaṁ yaśo 'yaśaḥ bhavanti bhāvā bhūtānāṁ matta eva pṛthag-vidhāḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

ahiṁsā
nonviolence
samatā
equilibrium
tuṣṭiḥ
satisfaction
tapaḥ
penance
dānam
charity
yaśaḥ
fame
ayaśaḥ
infamy
bhavanti
become
bhāvāḥ
natures
bhūtānām
of living entities
mattaḥ
from Me
eva
certainly
pṛthakvidhāḥ
differently arranged.

भावार्थ

बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश -- प्राणियोंके ये अनेक प्रकारके और अलग-अलग (बीस) भाव मेरेसे ही होते हैं।

व्याख्या

श्रीकृष्ण 10.4 में शुरू सूची पूरी करते हैं: 'अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश, और अपयश — प्राणियों के ये विविध भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।' श्रीकृष्ण उन गुणों की गणना जारी रखते हैं जो उनसे उत्पन्न होते हैं: 'अहिंसा,' 'समता,' 'तुष्टिः' (संतोष), 'तपः,' 'दानम्,' 'यशः' (यश), और 'अयशः' (अपयश)। फिर वे निष्कर्ष बताते हैं: 'भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः' — प्राणियों के ये विविध भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। शंकराचार्य सारांश कथन पर बल देते हैं: सब विविध गुण और दशाएँ — पूरा स्पेक्ट्रम, सकारात्मक और नकारात्मक — एक दिव्य स्रोत से उत्पन्न होती हैं। फिर विपरीतों का समावेश ध्यान दो: 'यशः' और 'अयशः।' यह कुल दिव्य व्याप्ति की विषयवस्तु जारी रखता है। हम अच्छे को बढ़ा सकते हैं जबकि पूर्ण को स्वीकार करते हैं।

भगवद्गीता 10.5 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण मानव गुणों की अपनी सूची पूरी करते हैं, और दोहरी शिक्षा समृद्ध है। पहली: जो गुण तुम चाहते हो — अहिंसा, समता, संतोष, उदारता — तुम में दिव्य रूप से जड़े हैं (10.4 के अनुसार), तो उन्हें विकसित करना स्वाभाविक है। दूसरी, विपरीतों का समावेश ध्यान दो: यहाँ तक कि 'यश और अपयश' एक ही स्रोत से उत्पन्न होते हैं। अनुभव की पूरी श्रृंखला — जिन हिस्सों का हम विरोध करते हैं उनसहित — एक पूर्णता से आती है। यह संयोजन व्यावहारिक रूप से शक्तिशाली है: सक्रिय रूप से गुण विकसित करो, और अनुभव की पूरी श्रृंखला को समभाव से स्वीकार करो। अच्छे को बढ़ाओ, पूर्ण को स्वीकार करो।

भगवद्गीता 10.5 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण ह्यूमन क्वालिटीज़ का अपना कैटलॉग कम्प्लीट करते हैं, और ड्यूल टीचिंग रिच है। फर्स्ट: जो वर्च्यूज़ तुम चाहते हो — नॉन-वायलेंस, इक्वैनिमिटी, कंटेंटमेंट, जेनरोसिटी — तुम में डिवाइनली रूटेड हैं (10.4), तो उन्हें ग्रो करना नैचुरल है। सेकंड, विपरीतों का समावेश नोट करो: यहाँ तक कि 'फेम और इल-फेम' एक ही सोर्स से अराइज़ होते हैं। एक्सपीरियंस की पूरी रेंज एक होलनेस से आती है। कॉम्बो पावरफुल है: गुड को ग्रो करो (सीड्स पहले से तुम में हैं), AND हार्ड पार्ट्स को इक्वैनिमिटी से होल्ड करो। ग्रो द गुड, एक्सेप्ट द होल।

भगवद्गीता 10.5 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण अपनी सुंदर सूची पूरी करते हैं! वे कहते हैं दयालु और कोमल होना (अहिंसा), शांत और संतुलित होना, संतुष्ट महसूस करना, मेहनत करना, उदार होना, और यहाँ तक कि अच्छा नाम या बुरा नाम होना जैसे गुण — ये सब उनसे आते हैं! यहाँ दो प्यारे सबक हैं: पहला, जो अच्छे गुण तुम चाहते हो — दया, शांति, संतोष, उदारता — वे पहले से तुम्हारे अंदर बीजों की तरह हैं! दूसरा, जीवन का पूरा मिश्रण — यहाँ तक कि जिन हिस्सों को हम प्रेम नहीं करते — सब बड़े अद्भुत पूर्ण का हिस्सा है। तो हम दो चीज़ें कर सकते हैं: खुशी से अच्छे गुण बढ़ाओ, और शांति से सब जीवन स्वीकार करो!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं — वे प्रत्येक श्रेणी में श्रेष्ठ और सार रूप हैं। उन्हें सबका मूल जानकर भक्त का प्रेम पूर्ण समर्पण में बदल जाता है।

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