अध्याय 10 · श्लोक 25— विभूति योग
Read this verse in English →महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥
लिप्यंतरण
maharṣhīṇāṁ bhṛigur ahaṁ girām asmyekam akṣharam yajñānāṁ japa-yajño ’smi sthāvarāṇāṁ himālayaḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- mahā-ṛiṣhīṇām
- — among the great seers
- bhṛiguḥ
- — Bhrigu
- aham
- — I
- girām
- — amongst chants
- asmi
- — I am
- ekam akṣharam
- — the syllable Om
- yajñānām
- — of sacrifices
- japa-yajñaḥ
- — sacrifice of the devotional repetition of the divine names of God
- asmi
- — I am
- sthāvarāṇām
- — amongst immovable things
- himālayaḥ
- — the Himalayas
भावार्थ
महर्षियोंमें भृगु और वाणियों-(शब्दों-) में एक अक्षर अर्थात् प्रणव मैं हूँ। सम्पूर्ण यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय मैं हूँ।
व्याख्या
"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्, यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः।" — महर्षियों में मैं भृगु हूँ; वाणी में मैं एक अक्षर ॐ हूँ; यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ; अचल वस्तुओं में मैं हिमालय हूँ। श्रीकृष्ण जारी रखते हैं। 'महर्षीणां भृगुः अहम्' — महर्षियों में, मैं भृगु हूँ। 'गिराम् अस्मि एकम् अक्षरम्' — वाणी में, मैं एक अविनाशी अक्षर ॐ हूँ। 'यज्ञानां जपयज्ञः अस्मि' — यज्ञों में, मैं जप-यज्ञ हूँ। 'स्थावराणां हिमालयः' — अचल वस्तुओं में, मैं हिमालय हूँ। शंकराचार्य 'जपयज्ञः' पर विशेष ध्यान देते हैं। यज्ञ और पूजा के सब रूपों में, श्रीकृष्ण स्वयं को जप से पहचानते हैं। जप को कोई विस्तृत सामग्री, कोई बाहरी उपकरण, कोई विशेष स्थान नहीं चाहिए। यह सब यज्ञों में सबसे सुलभ और सबसे आंतरिक है। अंतर्दृष्टि प्रोत्साहनजनक है: अभ्यास के उच्चतम रूप अक्सर सबसे सरल और सबसे आंतरिक होते हैं। सबसे अच्छी चीज़ें अक्सर सबसे सुलभ हैं।
भगवद्गीता 10.25 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
पूजा के सब रूपों में, श्रीकृष्ण 'जप-यज्ञ' को चुनते हैं — एक पवित्र नाम का सरल, मौन, आंतरिक दोहराव — और इसे सबसे अग्रणी यज्ञ नाम करते हैं। यह शांति से गहन है। सब विस्तृत अनुष्ठानों में, सबसे ऊँचा वह है जिसे केवल तुम्हारे अपने ध्यान के अलावा कुछ नहीं चाहिए। अंतर्दृष्टि प्रोत्साहनजनक है: सबसे मूल्यवान अभ्यास अक्सर सबसे सरल और सबसे आंतरिक होते हैं। हम मानते हैं कि किसी भी चीज़ का 'गंभीर' संस्करण विस्तृत होना चाहिए। श्रीकृष्ण इसे पलट देते हैं। सबसे रूपांतरकारी आदतें आमतौर पर लगातार की गई सरल होती हैं। सरलता कमतर नहीं। सबसे अच्छी चीज़ें अक्सर सबसे सुलभ हैं।
भगवद्गीता 10.25 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
पूजा के सब फॉर्म्स में, श्रीकृष्ण 'जप-यज्ञ' को सिंगल आउट करते हैं — एक सेक्रेड नेम का सिंपल, साइलेंट, इनवर्ड रिपीटिशन — और इसे फोरमोस्ट सैक्रिफाइस नेम करते हैं। यह क्वायटली प्रोफाउंड है। सब इलैबोरेट रिचुअल्स में, हाईएस्ट वह है जिसे केवल तुम्हारे अपने अटेंशन के अलावा कुछ नहीं चाहिए। इनसाइट एनकरेजिंग है: सबसे वैल्युएबल प्रैक्टिसेज़ अक्सर सबसे सिंपल और इनवर्ड होते हैं, सबसे कॉम्प्लिकेटेड नहीं। हम मानते हैं किसी भी चीज़ का 'सीरियस' वर्ज़न इलैबोरेट होना चाहिए। श्रीकृष्ण इसे फ्लिप करते हैं। सबसे ट्रांसफॉर्मेटिव हैबिट्स आमतौर पर कंसिस्टेंटली की गई सिंपल होती हैं। सिंप्लिसिटी लेसर नहीं।
भगवद्गीता 10.25 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण अपनी सूची जारी रखते हैं, और एक उदाहरण सच में विशेष है! पूजा के सब तरीकों में, वे कहते हैं वे 'जप' हैं — एक पवित्र नाम या शब्द का सरल, शांत दोहराव! यह विशेष क्यों है? क्योंकि जप इतना सरल है — तुम्हें कोई फैंसी उपकरण, विशेष जगह, या जटिल कदम नहीं चाहिए। तुम इसे कहीं भी, कभी भी कर सकते हो, बस प्यार से एक पवित्र शब्द शांति से दोहराकर! और श्रीकृष्ण कहते हैं यह सरल अभ्यास सबसे महान है! सबक: सबसे अच्छी और सबसे शक्तिशाली चीज़ें हमेशा सबसे फैंसी या जटिल नहीं होतीं। अक्सर सबसे सरल चीज़ें — प्रेम से और अक्सर की गई — सबसे अद्भुत हैं!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं — वे प्रत्येक श्रेणी में श्रेष्ठ और सार रूप हैं। उन्हें सबका मूल जानकर भक्त का प्रेम पूर्ण समर्पण में बदल जाता है।
अध्याय पढ़ें →