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अध्याय 10 · श्लोक 15विभूति योग

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श्लोक 15 / 42

स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥

लिप्यंतरण

swayam evātmanātmānaṁ vettha tvaṁ puruṣhottama bhūta-bhāvana bhūteśha deva-deva jagat-pate

शब्दार्थ (अन्वय)

swayam
yourself
eva
indeed
ātmanā
by yourself
ātmānam
yourself
vettha
know
tvam
you
puruṣha-uttama
the Supreme Personality
bhūta-bhāvana
the Creator of all beings
bhūta-īśha
the Lord of everything
deva-deva
the God of gods
jagat-pate
the Lord of the universe

भावार्थ

हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवदेव ! हे जगत्पते ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं।

व्याख्या

"स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम, भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते।" — हे पुरुषोत्तम, आप स्वयं ही अपने द्वारा अपने को जानते हैं, हे भूतभावन, भूतेश, देवदेव, जगत्पते! अर्जुन परम बिंदु स्वीकार करता है: केवल दिव्य ही दिव्य को पूरी तरह जान सकता है। 'स्वयम् एव आत्मना आत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम' — आप स्वयं ही, अपने द्वारा, अपने को जानते हैं। चूँकि दिव्य अनंत स्रोत है जो सब सृजित प्राणियों की समझ से परे है, केवल दिव्य स्वयं अपनी प्रकृति को पूरी तरह जान सकता है। शंकराचार्य ज्ञानमीमांसीय विनम्रता को भक्तिमय पहचान के साथ जुड़ा ध्यान देते हैं। अंतर्दृष्टि मुक्तिदायक है: तुम्हें किसी चीज़ को सच में पहचानने, उससे सम्बन्ध बनाने, और उसकी श्रद्धा करने के लिए उसे पूरी तरह समझने की ज़रूरत नहीं। सबसे गहरे सम्बन्ध ठीक उसी के साथ हैं जिसे हम कभी पूरी तरह नहीं समझ सकते पर पूरे दिल से अपना सकते हैं।

भगवद्गीता 10.15 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

अर्जुन परम बिंदु स्वीकार करता है — केवल अनंत ही अनंत को पूरी तरह जान सकता है — फिर भी वह पूरे दिल से दिव्य को पहचानता, प्रशंसा करता, और उससे सम्बन्ध बनाता है। यह एक सुंदर संतुलन पूरा करता है: पूर्ण भक्तिमय सम्बन्ध, ईमानदार विनम्रता के साथ जुड़ा। मुक्तिदायक अंतर्दृष्टि: तुम्हें किसी चीज़ को सच में पहचानने और श्रद्धा करने के लिए पूरी तरह समझने की ज़रूरत नहीं। तुम प्रेम को पूरी तरह नहीं समझते, फिर भी प्रेम करते हो। जीवन के सबसे गहरे सम्बन्ध ठीक उसी के साथ हैं जिसे हम कभी पूरी तरह नहीं समझ सकते। रहस्य को फिर भी पूरे दिल से अपनाओ।

भगवद्गीता 10.15 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

अर्जुन अल्टिमेट पॉइंट एक्नॉलेज करता है — केवल इन्फिनिट ही इन्फिनिट को पूरी तरह जान सकता है — फिर भी वह होलहार्टेडली डिवाइन को रिकग्नाइज़, प्रेज़ और रिलेट करता है। यह एक ब्यूटीफुल बैलेंस कम्प्लीट करता है: फुल डिवोशनल कनेक्शन प्लस ऑनेस्ट ह्यूमिलिटी। लिबरेटिंग इनसाइट: तुम्हें किसी चीज़ को रिकग्नाइज़ और रिवीयर करने के लिए पूरी तरह कॉम्प्रिहेंड करने की ज़रूरत नहीं। तुम लव को पूरी तरह नहीं समझते, फिर भी लव करते हो। तुम कॉन्शियसनेस को पूरी तरह नहीं समझते, फिर भी कॉन्शियस हो। सबसे डीप रिलेशनशिप्स ठीक उसी के साथ हैं जिसे हम कभी पूरी तरह कॉम्प्रिहेंड नहीं कर सकते। मिस्ट्री को फिर भी होलहार्टेडली एम्ब्रेस करो।

भगवद्गीता 10.15 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

अर्जुन कुछ गहरा कहता है: 'केवल आप ही अपने को पूरी तरह जान सकते हैं, भगवान! आप सब प्राणियों के स्रोत हैं, सबके प्रभु, देवों के देव!' अर्जुन स्वीकार करता है कि भगवान के अलावा कोई भगवान को पूरी तरह नहीं समझ सकता — भगवान बस बहुत विशाल और अद्भुत हैं! पर यहाँ अद्भुत हिस्सा है: भले अर्जुन भगवान को पूरी तरह नहीं समझ सकता, वह फिर भी भगवान को प्रेम कर सकता है, प्रशंसा कर सकता है, और करीब महसूस कर सकता है! यह हमें कुछ मुक्त करने वाला सिखाता है: तुम्हें किसी चीज़ को प्रेम करने और जुड़ा महसूस करने के लिए पूरी तरह समझने की ज़रूरत नहीं! अद्भुत रहस्य को अपनाओ!

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं — वे प्रत्येक श्रेणी में श्रेष्ठ और सार रूप हैं। उन्हें सबका मूल जानकर भक्त का प्रेम पूर्ण समर्पण में बदल जाता है।

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