अध्याय 9 · श्लोक 12— राजविद्या राजगुह्य योग
Read this verse in English →मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥
लिप्यंतरण
moghāśhā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vichetasaḥ rākṣhasīm āsurīṁ chaiva prakṛitiṁ mohinīṁ śhritāḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- mogha-āśhāḥ
- — of vain hopes
- mogha-karmāṇaḥ
- — of vain actions
- mogha-jñānāḥ
- — of baffled knowledge
- vichetasaḥ
- — deluded
- rākṣhasīm
- — demoniac
- āsurīm
- — atheistic
- cha
- — and
- eva
- — certainly
- prakṛitim
- — material energy
- mohinīm
- — bewildered
- śhritāḥ
- — take shelter
भावार्थ
जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ-कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान सत्-फल देनेवाले नहीं होते, ऐसे अविवेकी मनुष्य आसुरी, राक्षसी और मोहिनी फकृतिका आश्रय लेते हैं।
व्याख्या
"मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः, राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।" — व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म, व्यर्थ ज्ञान वाले, विवेकहीन, वे एक मोहिनी, राक्षसी और आसुरी प्रकृति का आश्रय लेते हैं। श्रीकृष्ण उनके परिणाम वर्णित करते हैं जो, मोहित होकर, दिव्य को तुच्छ समझते हैं (9.11 से जारी)। ऐसे लोग तीन महत्त्वपूर्ण आयामों में 'मोघ' — व्यर्थ — बन जाते हैं। 'मोघाशाः' — उनकी आशाएँ व्यर्थ हैं। 'मोघकर्माणः' — उनके कर्म निष्फल हैं। 'मोघज्ञानाः' — उनका ज्ञान भी व्यर्थ है। मूल कारण: 'राक्षसीम् आसुरीं च एव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः' — उन्होंने एक 'मोहिनी प्रकृति,' एक भ्रामक स्वभाव का आश्रय लिया। यह श्लोक एक स्पष्ट निदान है। जब किसी का पूरा अभिविन्यास भ्रम में जड़ा हो, तब सफलता भी खोखली हो जाती है। गलत नींव पर बना जीवन, चाहे कितना भी व्यस्त, मूलतः अतृप्तिकर रहता है।
भगवद्गीता 9.12 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण एक गंभीर निदान देते हैं: जब तुम्हारा पूरा अभिविन्यास भ्रम में जड़ा हो — गहरी वास्तविकता को नज़रअंदाज़ करते, अहंकार और जुनून से चालित — तब तुम्हारी सफलताएँ भी खोखली हो जाती हैं। तुम्हारी आशाएँ संतुष्ट नहीं करतीं, उपलब्धियाँ खाली लगती हैं। यह आश्चर्यजनक रूप से देखने योग्य है। हम सब ऐसे लोगों को जानते हैं जो बहुत कुछ हासिल करते हैं, फिर भी मूलतः अतृप्त रहते हैं — क्योंकि यह सब इस गलत पठन पर बना है कि वास्तव में क्या मायने रखता है। सिद्धांत तीखा है: गलत नींव पर बना जीवन खाली रहता है। नींव की जाँच करो।
भगवद्गीता 9.12 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण एक सोबरिंग डायग्नोसिस देते हैं: जब तुम्हारा पूरा ओरिएंटेशन डेल्यूज़न में रूटेड है — डीपर रियलिटी इग्नोर करते, ईगो और क्रेविंग से ड्रिवन — तब तुम्हारी विन्स भी हॉलो हो जाती हैं। तुम्हारी होप्स सैटिस्फाई नहीं करतीं, अचीवमेंट्स एम्प्टी रिंग करती हैं। यह IRL ऑब्ज़र्वेबल है। हम सब ऐसे लोगों को जानते हैं जो टन अचीव करते हैं, फिर भी फंडामेंटली एम्प्टी फील करते हैं। रॉन्ग फाउंडेशन पर बनी लाइफ हॉलो रहती है। फाउंडेशन एग्ज़ामिन करो। तुम्हारा सब एफर्ट किस पर बिल्ट है?
भगवद्गीता 9.12 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण समझाते हैं कि उन लोगों का क्या होता है जो गहरे, दिव्य सत्य को नज़रअंदाज़ करते हैं और केवल अहंकार और लालच के लिए जीते हैं: भले वे कड़ी कोशिश करें, सब कुछ खाली लगता है! उनकी आशाएँ उन्हें सच में खुश नहीं करतीं, उनका काम संतुष्ट नहीं करता। क्यों? क्योंकि यह सब एक हिलती, भ्रमित नींव पर बना है! यह लहरों के बहुत पास रेत का महल बनाने जैसा है — चाहे तुम कितनी भी मेहनत करो, यह नहीं टिकेगा। सबक: अपना जीवन उस पर बनाओ जो सच और अच्छा है!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण परम गुह्य ज्ञान प्रकट करते हैं — समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं फिर भी वे उनसे बद्ध नहीं। वे वचन देते हैं कि प्रेमपूर्ण भक्ति पापी को भी तार देती है, और प्रेम से अर्पित सब कुछ वे स्वीकार करते हैं।
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