अध्याय 9 · श्लोक 8— राजविद्या राजगुह्य योग
Read this verse in English →गीता 9.8 बताती है कि यह प्रकट होना कैसे होता है: अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर प्रभु बार-बार प्राणियों के पूरे समूह को प्रकट करते हैं, जो प्रकृति के वश में आते हैं। सृष्टि का चक्र किसी एक इच्छा से गहरे एक क्रम से घूमता है।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥
लिप्यंतरण
prakṛitiṁ svām avaṣhṭabhya visṛijāmi punaḥ punaḥ bhūta-grāmam imaṁ kṛitsnam avaśhaṁ prakṛiter vaśhāt
शब्दार्थ (अन्वय)
- prakṛitim
- — the material energy
- svām
- — my own
- avaṣhṭabhya
- — presiding over
- visṛijāmi
- — generate
- punaḥ punaḥ
- — again and again
- bhūta-grāmam
- — myriad forms
- imam
- — these
- kṛitsnam
- — all
- avaśham
- — beyond their control
- prakṛiteḥ
- — nature
- vaśhāt
- — force
भावार्थ
प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको मैं (कल्पोंके आदिमें) अपनी प्रकृतिको वशमें करके बार-बार रचता हूँ।
व्याख्या
"प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः, भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्।" — अपनी प्रकृति पर आश्रित होकर, मैं इस सम्पूर्ण प्राणी-समूह को बार-बार उत्पन्न करता हूँ, जो प्रकृति के वश में विवश हैं। श्रीकृष्ण 9.7 से सृष्टि के कार्य का वर्णन जारी रखते हैं। 'प्रकृतिं स्वाम् अवष्टभ्य' — अपनी प्रकृति पर आश्रित होकर — 'विसृजामि पुनः पुनः' — मैं बार-बार उत्पन्न करता हूँ। प्रभावशाली वाक्यांश: 'अवशं प्रकृतेः वशात्' — प्रकृति के वश में विवश (अवश)। जो प्राणी भेजे जाते हैं वे प्रकृति के नियंत्रण में आते हैं — अपनी संस्कारी प्रकृति, गुण, संचित प्रवृत्तियाँ। यह श्लोक दो सत्य एक साथ रखता है। एक ओर, दिव्य संप्रभु स्रोत है, स्वतंत्र रूप से सृष्टि प्रक्षेपित करता है। दूसरी ओर, सृष्टि के भीतर प्राणी प्रकृति द्वारा विवश रूप से शासित हैं। विरोधाभास शिक्षाप्रद है: दिव्य मुक्त है; संस्कारित प्राणी बँधे हैं। और यह विरोधाभास मार्ग दिखाता है।
भगवद्गीता 9.8 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण एक तीखा विरोधाभास नाम करते हैं: दिव्य स्वतंत्र रूप से सृष्टि करता है, अपनी प्रकृति पर अध्यक्षता करते हुए — जबकि व्यक्तिगत प्राणी, संसार में आने पर, 'प्रकृति के वश में विवश' हैं, अपने संस्कार और गति से चालित। यह मानवीय दशा के बारे में स्पष्ट अवलोकन है। हमारा अधिकांश व्यवहार वास्तव में संस्कार से चलता है — आदतें, स्वचालित प्रतिक्रियाएँ। पर विरोधाभास स्वयं बाहर का मार्ग दिखाता है: दिव्य मुक्त है; संस्कारित प्राणी बँधे हैं। पहला कदम बस विवशता को ईमानदारी से देखना है। तुम उस संस्कार से खुद को मुक्त नहीं कर सकते जिसे देखने से इनकार करते हो।
भगवद्गीता 9.8 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण एक शार्प कॉन्ट्रास्ट नेम करते हैं: डिवाइन फ्रीली क्रिएट करता है — जबकि इंडिविजुअल बीइंग्स, वर्ल्ड में आने पर, 'प्रकृति के वश में हेल्पलेस' हैं, अपने कंडीशनिंग से ड्रिवन। यह ह्यूमन कंडीशन पर क्लियर-आइड रीड है। हमारा अधिकांश बिहेवियर सच में कंडीशनिंग से रन होता है — हैबिट्स, ऑटोमैटिक रिएक्शन्स। हम खुद को बताते हैं हम फ्रीली चूज़ कर रहे हैं, पर बहुत कुछ 'अवश' है। पर कॉन्ट्रास्ट खुद बाहर का रास्ता दिखाता है। फर्स्ट स्टेप बस हेल्पलेसनेस को ईमानदारी से देखना है। तुम उस कंडीशनिंग से खुद को फ्री नहीं कर सकते जिसे देखने से इनकार करते हो।
भगवद्गीता 9.8 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण समझाते हैं कि वे स्वतंत्र रूप से सब प्राणियों को बार-बार बनाते हैं — पर रोचक रूप से, एक बार जब प्राणी दुनिया में होते हैं, वे 'प्रकृति' से इधर-उधर धकेले जाते हैं — अपनी आदतों और अपने बनने के तरीके से! यह थोड़ा ऐसा है: एक चाबी वाला खिलौना किसी स्वतंत्र व्यक्ति द्वारा बनाया जाता है, पर फिर यह केवल उसी तरह चल सकता है जैसे इसे चाबी दी गई! पर यहाँ आशापूर्ण हिस्सा: भगवान पूरी तरह मुक्त हैं, और हम भी उस स्वतंत्रता की ओर बढ़ सकते हैं! पहला कदम बस आदत से कार्य करने को नोटिस करना है!
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 9.8 का अर्थ क्या है?
अपनी सृजनशील प्रकृति का आश्रय लेकर प्रभु बार-बार प्राणियों के पूरे समूह को प्रकट करते हैं, जो प्रकृति के वश में विवश होकर उत्पन्न होते हैं। सृष्टि एक बार का कर्म नहीं, एक पुनरावर्ती, नियमबद्ध प्रक्रिया बताई गई है।
यह श्लोक किसने कहा?
भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन से, नौवें अध्याय (राजविद्या योग) में, यह बताते हुए कि प्राणी बार-बार कैसे अस्तित्व में आते हैं।
गीता 9.8 आज के जीवन में कैसे उतारें?
हमारे भीतर और चारों ओर जो उठता है उसका बहुत-कुछ हमारे चुनाव से बड़े प्रतिमानों से चलता है। उन गहरी धाराओं को पहचानना एक विनम्रता ला सकता है — और जिस पर हमारा वश नहीं उससे एक शांत सम्बन्ध।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण परम गुह्य ज्ञान प्रकट करते हैं — समस्त प्राणी उनमें स्थित हैं फिर भी वे उनसे बद्ध नहीं। वे वचन देते हैं कि प्रेमपूर्ण भक्ति पापी को भी तार देती है, और प्रेम से अर्पित सब कुछ वे स्वीकार करते हैं।
अध्याय पढ़ें →✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 9.8 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 9.8 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
ISKCON
ISKCON — Krishna devotional tradition in the Gaudiya Vaishnava lineage.
ISKCON →