अध्याय 6 · श्लोक 41— आत्मसंयम योग (ध्यान योग)
Read this verse in English →प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः। शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥
लिप्यंतरण
prāpya puṇya-kṛitāṁ lokān uṣhitvā śhāśhvatīḥ samāḥ śhuchīnāṁ śhrīmatāṁ gehe yoga-bhraṣhṭo’bhijāyate
शब्दार्थ (अन्वय)
- prāpya
- — attain
- puṇya-kṛitām
- — of the virtuous
- lokān
- — abodes
- uṣhitvā
- — after dwelling
- śhāśhvatīḥ
- — many
- samāḥ
- — ages
- śhuchīnām
- — of the pious
- śhrī-matām
- — of the prosperous
- gehe
- — in the house
- yoga-bhraṣhṭaḥ
- — the unsuccessful yogis
- abhijāyate
- — take birth
भावार्थ
वह योगभ्रष्ट पुण्यकर्म करनेवालोंके लोकोंको प्राप्त होकर और वहाँ बहुत वर्षोंतक रहकर फिर यहाँ शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है।
व्याख्या
"प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः, शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।" — पुण्यकर्म करने वालों के लोकों को प्राप्त करके और वहाँ अनगिनत वर्ष निवास करके, योगभ्रष्ट शुद्ध और समृद्ध के घर में पुनर्जन्म लेता है। श्रीकृष्ण अब ईमानदार पर असफल साधक की वास्तविक गति समझाते हैं, 6.40 के व्यापक आश्वासन के बाद विवरण भरना शुरू करते हुए। 'योगभ्रष्ट' — योग के पथ से गिरा — नष्ट नहीं होता। बल्कि, उनके ईमानदार आध्यात्मिक प्रयास का संचित पुण्य पहले उन्हें 'पुण्यकृतां लोकान्' में निवास दिलाता है। फिर, वह प्रवास पूरा होने पर, वे पुनर्जन्म लेते हैं — कठिनाई में नहीं, बल्कि 'शुचीनां श्रीमतां गेहे,' शुद्ध और समृद्ध के घर में। शंकराचार्य इस पुनर्जन्म की भलाई पर ध्यान देते हैं। यह एक उल्लेखनीय शिक्षा है। ईमानदार प्रयास जो कम पड़ा एक आगे ले जाया गया निवेश बन जाता है।
भगवद्गीता 6.41 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
श्रीकृष्ण प्रकट करते हैं कि ईमानदार आध्यात्मिक प्रयास समय भर चक्रवृद्धि होने वाले निवेश की तरह काम करता है — कुछ नहीं खोता। परलोक के बारे में तुम जो भी ढाँचा रखो, अंतर्निहित सिद्धांत प्रभावशाली और आशापूर्ण है: वास्तविक विकास-प्रयास 'पूरा न करने' से मिटता नहीं। यह आगे ले जाता है और तुम्हें बढ़त देता है। बुद्धिमान, दयालु बनने में तुम जो काम लगाते हो वह गायब नहीं होता। ईमानदार प्रयास हमेशा चक्रवृद्धि होता है; यह कभी शून्य पर रीसेट नहीं होता।
भगवद्गीता 6.41 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
श्रीकृष्ण रिवील करते हैं कि सिन्सियर स्पिरिचुअल एफर्ट एक इन्वेस्टमेंट की तरह काम करता है जो टाइम के साथ COMPOUND होता है — कुछ नहीं खोता। आफ्टरलाइफ के बारे में तुम जो भी बिलीव करो, अंडरलाइंग प्रिंसिपल स्ट्राइकिंग है: जेन्युइन ग्रोथ-एफर्ट सिर्फ इसलिए डिलीट नहीं होता कि तुमने 'फिनिश' नहीं किया। वाइज़र, काइंडर बनने में तुम जो वर्क लगाते हो वह वैनिश नहीं होता। सिन्सियर एफर्ट हमेशा कंपाउंड होता है। कभी ज़ीरो पर रीसेट नहीं होता।
भगवद्गीता 6.41 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण समझाते हैं कि उस अच्छे साधक का क्या होता है जिसने पूरा नहीं किया: पहले, उनके सब अच्छे प्रयासों के कारण, वे बहुत लम्बे समय तक अद्भुत, खुशहाल लोकों का आनंद लेते हैं! फिर वे एक दयालु, अच्छे और आरामदायक परिवार में फिर से जन्म लेते हैं — आध्यात्मिक रूप से बढ़ते रहने के लिए सही जगह! तो उनका प्रयास बिल्कुल व्यर्थ नहीं गया — इसने उन्हें बढ़त दी! कुछ भी अच्छा कभी नहीं खोता!
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।
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