अध्याय 6 · श्लोक 18— आत्मसंयम योग (ध्यान योग)
Read this verse in English →यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥
लिप्यंतरण
yadā viniyataṁ chittam ātmanyevāvatiṣhṭhate niḥspṛihaḥ sarva-kāmebhyo yukta ityuchyate tadā
शब्दार्थ (अन्वय)
- yadā
- — when
- viniyatam
- — fully controlled
- chittam
- — the mind
- ātmani
- — of the self
- eva
- — certainly
- avatiṣhṭhate
- — stays
- nispṛihaḥ
- — free from cravings: sarva
- kāmebhyaḥ
- — for yearning of the senses
- yuktaḥ
- — situated in perfect Yog
- iti
- — thus
- uchyate
- — is said
- tadā
- — then
भावार्थ
वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थोंसे निःस्पृह हो जाता है, उस कालमें वह योगी है - ऐसा कहा जाता है।
व्याख्या
"यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते, निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।" — जब भली प्रकार संयमित चित्त आत्मा में ही स्थित हो जाता है, सब इच्छाओं से स्पृहा रहित — तब वह योग में स्थित कहलाता है। श्रीकृष्ण जीवनशैली (6.16-17) से प्राप्ति के आंतरिक चिह्न पर लौटते हैं। 'युक्त' होने का परिभाषक चिह्न यहाँ सटीक रूप से दिया गया है। 'विनियतं चित्तम्' — पूरी तरह अनुशासित मन। 'आत्मन्येवावतिष्ठते' — आत्मा में ही स्थित रहता है। महत्त्वपूर्ण योग्यता: 'निःस्पृहः सर्वकामेभ्यः' — सब इच्छाओं से स्पृहा रहित। शंकराचार्य 'सर्व' (सब) पर बल देते हैं। यह स्थिर मन का चित्र है, बलपूर्वक दबाया गया नहीं बल्कि स्वाभाविक रूप से बसा हुआ। स्थापित योग एक उत्तेजित मन का बलपूर्वक दमन नहीं है; यह उस मन की स्वाभाविक स्थिरता है जो घर आ गया है।
भगवद्गीता 6.18 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
यहाँ असली संकेत है कि तुम आंतरिक रूप से 'पहुँच' गए हो: तुम्हारा मन स्वाभाविक रूप से अपने में विश्राम करता है, अब लगातार अगली चाहने वाली चीज़ के लिए बाहर नहीं पहुँचता। ध्यान दो यह बलपूर्वक दमन नहीं — यह वह स्वाभाविक बसना है जो तब होता है जब मन अंततः पूर्ण महसूस करता है। हमारी अधिकांश बेचैनी मन का बाहर रिसना है। बसा मन एक जकड़ा मन नहीं; यह वह मन है जो घर आ गया।
भगवद्गीता 6.18 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
यहाँ असली साइन है कि तुम इनवर्डली 'मेड इट': तुम्हारा माइंड नैचुरली अपने में चिल करता है बजाय लगातार अगली चाहने वाली चीज़ के लिए रीच आउट करने के। की पॉइंट — यह फोर्स्ड सप्रेशन नहीं। यह वह नैचुरल सेटलिंग है जो तब होती है जब माइंड फाइनली फुल फील करता है। सेटल्ड माइंड क्लेंच्ड माइंड नहीं — यह वह माइंड है जो घर आ गया।
भगवद्गीता 6.18 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
श्रीकृष्ण समझाते हैं कि कोई सच में योग में कब स्थित है: यह तब है जब उनका मन खुशी से अंदर, अपने सच्चे स्व में विश्राम करता है, और बाहरी चीज़ों की लगातार इच्छा करना बंद कर देता है। ऐसा नहीं कि वे अपनी इच्छाओं को ज़बरदस्ती दूर कर रहे हैं — यह कि वे अंदर इतना भरा और पूर्ण महसूस करते हैं कि उन्हें चीज़ों का पीछा करने की ज़रूरत ही नहीं!
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अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण ध्यान की विधि — आसन, स्थान, संयमित जीवन और चंचल मन को स्थिर करने का उपाय बताते हैं। वे आश्वासन देते हैं कि किसी का भी शुभ प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।
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