अध्याय 2 · श्लोक 23— सांख्य योग
Read this verse in English →गीता 2.23 — askgita पर Gita Verses on Death and What Happens After Death, Gita Verses on the Soul (Atman) and Who You Really Are पर पाठों में उद्धृत।
गीता 2.23 कहती है कि आत्मा को न कोई शस्त्र काट सकता है, न आग जला सकती है, न जल भिगो सकता है, न वायु सुखा सकती है। तुम्हारा असली स्वरूप उस हर चीज़ से अछूता है जो शरीर को हानि पहुँचा सकती है।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
लिप्यंतरण
nainaṁ chindanti śastrāṇi nainaṁ dahati pāvakaḥ na cainaṁ kledayanty āpo na śoṣayati mārutaḥ
शब्दार्थ (अन्वय)
- न एनं छिन्दन्ति शस्त्राणि
- — शस्त्र इसे नहीं काटते
- न एनं दहति पावकः
- — अग्नि इसे नहीं जलाती
- न क्लेदयन्ति आपः
- — जल इसे नहीं भिगोता
- न शोषयति मारुतः
- — वायु इसे नहीं सुखाती
भावार्थ
इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
व्याख्या
यदि 2.20 ने कहा कि आत्मा मर नहीं सकती, तो यह श्लोक सम्भावनाओं को समाप्त करके बताता है कि क्यों। प्राचीन मन विनाशशील संसार को तत्त्वों से वर्गीकृत करता था — पृथ्वी (शस्त्र), अग्नि, जल और वायु। श्रीकृष्ण एक-एक को लेकर आत्मा पर उसकी शक्ति का निषेध करते हैं: शस्त्र इसे काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो या गला नहीं सकता, वायु सुखा नहीं सकती। तर्क चुपचाप कठोर है। जो भी नष्ट हो सकता है उसे किसी न किसी से नष्ट होना पड़ता है; विनाश सदा एक वस्तु का दूसरी पर कर्म है। हर तात्त्विक साधन को निरस्त करके श्रीकृष्ण स्थापित करते हैं कि आत्मा ऐसी वस्तु ही नहीं जिसे विनाश पकड़ सके — वह भौतिक नहीं, अवयवी नहीं, ऐसे भागों से बनी नहीं जो अलग किए जा सकें। शंकराचार्य बल देते हैं कि आत्मा 'नित्यः, सर्वगतः' है — नित्य और सर्वव्यापी — और जो निरवयव और सर्वव्यापी है उसे काटा (काटने को भाग और स्थान चाहिए), जलाया या हिलाया नहीं जा सकता। अर्जुन के लिए, जो अपने गुरुजनों और स्वजनों को शस्त्रों से चिरते देखने की कल्पना से जड़ है, यह सटीक सांत्वना है: इस युद्धभूमि की तलवारें शरीरों का अंत कर सकती हैं, आत्माओं का नहीं। यह श्लोक मृत्यु की गंभीरता का निषेध नहीं, बल्कि व्यक्ति को उस स्तर पर पुनः स्थापित करता है जहाँ हिंसा पहुँच नहीं सकती। भक्ति से पढ़ें या दर्शन से — वही बीज बोता है: तुम्हारा सार अभेद्य है।
भगवद्गीता 2.23 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
वर्ष भर की उन सब बातों को सोचो जो तुम्हें 'काटने, जलाने, भिगोने या सुखाने' का प्रयास करती हैं: चुभती आलोचना, जलाता क्रोध और बर्नआउट, उदासी का धीमा भिगोना, तनाव की सुखाती रूखापन। यह श्लोक यह नहीं कहता कि वे शक्तियाँ शरीर-मन को नहीं चुभतीं — यह ज़ोर देता है कि वे तुम्हारी सबसे गहरी परत तक पहुँच नहीं सकतीं। यही भेद समस्त मनोबल का आधार है। कठिन क्षण में चुपचाप पूछो: यहाँ वास्तव में किस पर खतरा है — मेरा मूल स्व, या कोई भूमिका, छवि, सुविधा, योजना? लगभग सदा बाहरी परतें ही आग में होती हैं, जबकि उन सबको देखता साक्षी अछूता रहता है। समय के साथ अभ्यास से यह एक आंतरिक शरण बन जाता है जिसमें परिस्थितियों के सबसे प्रचंड होने पर भी प्रवेश किया जा सके: एक शांत केंद्र जिसमें तूफ़ान सचमुच घुस नहीं सकता।
भगवद्गीता 2.23 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?
यह असल में 'वे असली मुझ तक पहुँच ही नहीं सकते' वाली ऊर्जा है — पर अर्जित, दिखावटी नहीं। कमेंट, रिजेक्शन, खराब नंबर, ब्रेकअप, ऑनलाइन रोस्ट होना: ये सब तुम्हारी बाहरी परतों — छवि, योजनाएँ, मूड — पर ताने शस्त्र, आग, बाढ़ या हवा हैं। असली और पीड़ादायक, पर सतही। श्रीकृष्ण का दावा है कि मूल 'तुम' के पास ऐसी कोई सतह ही नहीं जहाँ इनमें से कुछ टिक सके। व्यावहारिक रूप: अगली बार कुछ ज़ोर से चुभे तो पहचानो असल में किस पर हमला है। आमतौर पर तुम्हारे अहंकार या अपेक्षाओं पर, तुम्हारे अस्तित्व पर नहीं। वही नन्हा अंतर — 'यह मेरी छवि को चोट है, मुझे नहीं' — वहीं तुम हर नोटिफिकेशन के रहमोकरम पर रहना बंद कर देते हो।
भगवद्गीता 2.23 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?
आत्मा इतनी विशेष है कि संसार की कोई चीज़ उसे नुकसान नहीं पहुँचा सकती — न तलवार काट सके, न आग जला सके, न पानी भिगो सके, न हवा सुखा सके। कल्पना करो कोई ऐसी चीज़ जो चाहे कुछ भी हो, कभी टूट ही न सके। वही तुम्हारी आत्मा है, और वह सदा सुरक्षित है!
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 2.23 का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है कि आत्मा को भौतिक संसार की कोई शक्ति हानि नहीं पहुँचा सकती — न शस्त्र, न आग, न जल, न वायु। जो शरीर को नष्ट कर सकता है, उसका भीतर बसी आत्मा पर कोई वश नहीं।
यह श्लोक किसने कहा?
यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय (सांख्य योग) में अर्जुन से कहा, आत्मा के अविनाशी होने की शिक्षा को आगे बढ़ाते हुए।
गीता 2.23 आज के जीवन में कैसे उतारें?
यह साहस का गहरा स्रोत देती है: तुम्हारा मूल स्वरूप किसी भी चोट से परे है। जब जीवन शरीर को संकट में डाले या परिस्थितियाँ हिलाएँ, यह श्लोक उस भीतरी आत्मा की ओर इशारा करता है जो सदा अक्षत और सुरक्षित रहती है।
सम्बंधित श्लोक
अध्याय सन्दर्भ
श्रीकृष्ण उपदेश आरंभ करते हैं — आत्मा की अमरता, शरीर की नश्वरता, क्षत्रिय के धर्म और निष्काम कर्मयोग का वर्णन करते हैं। इस अध्याय में स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताए गए हैं।
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✦ प्रामाणिक स्रोत ✦
ये शास्त्रीय परम्पराओं और सम्बन्धित प्रकाशन-संस्थाओं की आधिकारिक वेबसाइटें हैं।
Bhagavad Gita 2.23 — Vedabase (Bhaktivedanta)
Vedabase's edition of Bhagavad Gita 2.23 with Sanskrit, transliteration, word-for-word, translation and Prabhupāda's purport.
Bhaktivedanta Vedabase →
Gita Press, Gorakhpur
Publisher of the Hindi translation of the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas cited on this site.
Gita Press →
Sringeri Sharada Peetham
Sringeri Sharada Peetham — the principal seat of Advaita Vedanta in the lineage of Adi Shankaracharya.
Sringeri →