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अध्याय 2 · श्लोक 16सांख्य योग

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श्लोक 16 / 72

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥

लिप्यंतरण

nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ ubhayorapi dṛiṣhṭo ’nta stvanayos tattva-darśhibhiḥ

शब्दार्थ (अन्वय)

na
no
asataḥ
of the temporary
vidyate
there is
bhāvaḥ
is
na
no
abhāvaḥ
cessation
vidyate
is
sataḥ
of the eternal
ubhayoḥ
of the two
api
also
dṛiṣhṭaḥ
observed
antaḥ
conclusion
tu
verily
anayoḥ
of these
tattva
of the truth
darśhibhiḥ
by the seers

भावार्थ

असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है।

व्याख्या

श्रीकृष्ण एक आधारभूत तत्त्वमीमांसीय सिद्धांत कहते हैं: 'असत् की कोई सत्ता नहीं; सत् का कोई अभाव नहीं। दोनों का तत्त्व तत्त्वदर्शियों ने देखा है।' एक ही संक्षिप्त पंक्ति में वे अस्तित्व की दो मूल श्रेणियों को अलग करते हैं — अनित्य (असत्) और नित्य (सत्)। यहाँ 'असत्' का अर्थ पूर्णतः अनस्तित्व नहीं, बल्कि वह जिसकी कोई स्थायी सत्ता नहीं — बदलता, क्षणिक, जो प्रकट होकर बीत जाता है, जैसे शरीर, परिस्थितियाँ और समस्त क्षणभंगुर अनुभव। 'सत्' वह है जो सचमुच है, कभी न मिटने वाला — अपरिवर्तनीय आत्मा, शुद्ध सत्-चित्। शंकराचार्य का शास्त्रीय पाठ: जो तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) में रहता है, कभी निषिद्ध नहीं होता, वह सत् है; जो अभी यहाँ है पर बाद में नहीं, वह, इसी सटीक अर्थ में, 'असत्' है। श्रीकृष्ण जो अनिवार्य बात कहते हैं वह यह कि यह भेद मात्र अटकल नहीं — इसे 'तत्त्वदर्शियों', सत्य को देखने वालों ने प्रत्यक्ष 'देखा' है। यह साक्षात्कार से उपजा ज्ञान है, तर्क से नहीं। बुद्धिमानी से जीने के लिए, इस अंतर को बताना सीखना चाहिए: अपनी सम्पूर्ण पहचान और सुरक्षा को बदलते में लगाना बंद करना (जो कभी स्थिर आधार नहीं दे सकता) और उस अपरिवर्तनीय भूमि को पहचानना जो अकेली सचमुच है।

भगवद्गीता 2.16 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

श्रीकृष्ण सबसे मूल रेखा खींचते हैं: कुछ चीज़ें सचमुच टिकती हैं, और कुछ केवल टिकती प्रतीत होती हैं। 'सत्' वह है जो मिटता नहीं; 'असत्' नकली नहीं — यह बस बदलती, बीतती चीज़ है जो प्रकट होती और लुप्त होती है। और लगभग समस्त मानव दुःख इन दोनों को भ्रमित करने से आता है: अपनी सम्पूर्ण पहचान और सुरक्षा उन चीज़ों पर बनाना जो सदा बदलने ही वाली थीं। सोचो तुमने अपने स्व-बोध को किस पर दाँव पर लगाया है। तुम्हारा रूप, तुम्हारा पद, तुम्हारी रिश्ते की स्थिति, तुम्हारी फॉलोअर संख्या, तुम्हारी उपलब्धियाँ, तुम्हारा शरीर — सब क्षण में सचमुच वास्तविक, सब बदलने की गारंटी वाले। जब तुम अपना मूल्य बीतते में जड़ते हो, तुम स्थायी निम्न-स्तरीय चिंता में जीते हो, क्योंकि भीतर से तुम जानते हो कि ज़मीन खिसक रही है। यह श्लोक तुम्हें क्षणिक चीज़ों की परवाह बंद करने को नहीं कह रहा; यह तुम्हें उन्हें अपनी नींव समझने की भूल बंद करने को कह रहा है। कौशल है विवेक: बदलते संसार का पूर्णतः आनंद लो और उसमें संलग्न हो, पर उससे वह अटल चीज़ बनने को मत कहो जो वह कभी नहीं हो सकता। अपना वास्तविक आधार उसमें खोजो जो बदलता नहीं — उसे जागरूकता कहो, आत्मा, तुम्हारा गहनतम स्व — और क्षणिक तुम्हारी स्थिरता के लिए खतरा बनना बंद कर देता है, क्योंकि तुम्हारी स्थिरता पहले कभी उस पर टिकी थी ही नहीं।

भगवद्गीता 2.16 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

श्रीकृष्ण सबसे मूल रेखा खींचते हैं: कुछ चीज़ें सचमुच टिकती हैं, और कुछ केवल टिकती लगती हैं। 'सत्' वह है जो मिटता नहीं; 'असत्' नकली नहीं — यह बस बदलती, बीतती चीज़ है जो आती और गायब होती है। और लगभग सारा मानव दुख इन दोनों को कन्फ्यूज़ करने से आता है: अपनी पूरी पहचान और सुरक्षा उन चीज़ों पर बनाना जो हमेशा बदलने ही वाली थीं। सोचो तुमने अपने सेल्फ-सेंस को किस पर दाँव पर लगाया है। तुम्हारा लुक, तुम्हारी जॉब, तुम्हारी रिलेशनशिप स्टेटस, तुम्हारी फॉलोअर काउंट, तुम्हारी अचीवमेंट्स, तुम्हारा शरीर — सब पल में रियल, सब 100% बदलने की गारंटी वाले। जब तुम अपना वर्थ बीतते में जड़ते हो, तुम परमानेंट लो-ग्रेड एंग्जायटी में जीते हो, क्योंकि भीतर से तुम जानते हो कि ज़मीन खिसक रही है। यह श्लोक तुम्हें टेम्पररी चीज़ों की परवाह बंद करने को नहीं कह रहा — यह तुम्हें उन्हें अपनी नींव समझने की भूल बंद करने को कह रहा है। कौशल है विवेक: बदलती दुनिया को पूरी तरह एन्जॉय करो और उसमें लगो, पर उससे वह अटल चीज़ बनने की माँग मत करो जो वह कभी नहीं हो सकता। अपना असली पैर उसमें टिकाओ जो बदलता नहीं — उसे अवेयरनेस कहो, आत्मा, तुम्हारा गहनतम स्व — और क्षणिक तुम्हारी स्थिरता के लिए खतरा बनना बंद कर देता है, क्योंकि तुम्हारी स्थिरता पहले कभी उस पर टिकी थी ही नहीं।

भगवद्गीता 2.16 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण एक बड़ा विचार सिखाते हैं: कुछ चीज़ें सदा रहती हैं, और कुछ चीज़ें केवल थोड़ी देर रुकती हैं। जो चीज़ें बदलती हैं — खिलौने, कपड़े, बढ़ते हुए हमारे शरीर भी — आती-जाती हैं। पर भीतर का असली 'तुम' कभी नहीं जाता। बुद्धिमान लोग अंतर बताना सीखते हैं। उन मज़ेदार चीज़ों का आनंद लेना ठीक है जो टिकती नहीं, पर यह याद रखना अच्छा है कि तुम्हारा सबसे महत्त्वपूर्ण, सच्चा हिस्सा वह है जो सदा रहता है। वह हिस्सा तुम्हारा भीतर का सुरक्षित, सदा का घर है।

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अध्याय सन्दर्भ

श्रीकृष्ण उपदेश आरंभ करते हैं — आत्मा की अमरता, शरीर की नश्वरता, क्षत्रिय के धर्म और निष्काम कर्मयोग का वर्णन करते हैं। इस अध्याय में स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताए गए हैं।

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