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अध्याय 18 · श्लोक 49मोक्ष संन्यास योग

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श्लोक 49 / 78

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥

लिप्यंतरण

asakta-buddhiḥ sarvatra jitātmā vigata-spṛihaḥ naiṣhkarmya-siddhiṁ paramāṁ sannyāsenādhigachchhati

शब्दार्थ (अन्वय)

asakta-buddhiḥ
those whose intellect is unattached
sarvatra
everywhere
jita-ātmā
who have mastered their mind
vigata-spṛihaḥ
free from desires
naiṣhkarmya-siddhim
state of actionlessness
paramām
highest
sanyāsena
by the practice of renunciation
adhigachchhati
attain

भावार्थ

जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या

श्रीकृष्ण कर्म में स्वतंत्रता की ऊँचाई का वर्णन करते हैं: 'जिसकी बुद्धि हर जगह अनासक्त है, जिसने स्व को जीता है और लालसा से मुक्त है, वह त्याग के माध्यम से नैष्कर्म्य की परम सिद्धि प्राप्त करता है।' श्रीकृष्ण पथ की पराकाष्ठा का वर्णन करते हैं। शंकराचार्य 'नैष्कर्म्य-सिद्धि' की सूक्ष्म और महत्त्वपूर्ण अवधारणा उजागर करते हैं — 'अकर्म की सिद्धि।' इसका मतलब कार्य न करना नहीं (गीता ने ज़ोर दिया है कि कर्म अपरिहार्य है); इसका मतलब कर्म के भीतर आंतरिक स्वतंत्रता की अवस्था है, जहाँ कोई कर्म से बिल्कुल बँधे बिना कार्य करता है। यह 'अकर्म' है इसलिए नहीं कि कर्म रुकता है, बल्कि क्योंकि कर्म का बाँधने वाला गुण अनासक्ति के माध्यम से घुल जाता है। निकालने योग्य अंतर्दृष्टि 'नैष्कर्म्य-सिद्धि' का सुंदर, विरोधाभासी विचार है — 'अकर्म' की सिद्धि जो कर्म की अनुपस्थिति नहीं बल्कि कर्म के भीतर आंतरिक स्वतंत्रता है। यह एक तनाव हल करता है जो पूरी गीता में चलता है। तुम कार्य करते हो, पूरी तरह और संलग्न, पर कर्म का बाँधने वाला गुण पूरी तरह घुल गया है। बाहर से, तुम किसी और की तरह कार्य कर रहे हो; अंदर, तुम पूरी तरह मुक्त, अछूते, अबाध हो। और तीन कुंजियाँ नाम की गई हैं: हर जगह अनासक्त बुद्धि, आत्म-महारत, और लालसा से स्वतंत्रता। सबक: सर्वोच्च स्वतंत्रता का लक्ष्य रखो, जो कार्य से निष्क्रियता में भागना नहीं, बल्कि ऐसी आंतरिक अनासक्ति के साथ कार्य करना है कि कर्म तुम्हें बिल्कुल नहीं बाँधता। पूरी तरह कार्य करो; पूरी तरह मुक्त रहो; कर्म को तुम्हें बिल्कुल बाँधने मत दो।

भगवद्गीता 18.49 आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?

निकालने योग्य अंतर्दृष्टि 'नैष्कर्म्य-सिद्धि' का सुंदर, विरोधाभासी, और सच में गहन विचार है — 'अकर्म' की सिद्धि जो ज़ोर देकर कर्म की अनुपस्थिति नहीं बल्कि पूर्ण कर्म के भीतर पूर्ण आंतरिक स्वतंत्रता की अवस्था है। यह सूक्ष्म अवधारणा एक तनाव हल करती है जो पूरी गीता में चलता है। पहले की शिक्षाओं ने बार-बार ज़ोर दिया कि कर्म सच में अपरिहार्य है और तुम्हें पूरी तरह कार्य करना चाहिए। अब श्रीकृष्ण 'अकर्म' प्राप्त करने की बात करते हैं — पर वे कुछ सूक्ष्म मतलब रखते हैं: कर्म रोकना नहीं, बल्कि ऐसी पूर्ण आंतरिक स्वतंत्रता में कार्य करना कि कर्म तुम्हें बिल्कुल नहीं बाँधता। तुम कार्य करते हो, पूरी तरह संलग्न और प्रभावी, पर कर्म का बाँधने वाला गुण भीतर से पूरी तरह घुल गया है। बाहर से, तुम किसी और की तरह कार्य कर रहे हो; अंदर, तुम पूरी तरह मुक्त, अबाध हो। और इसकी तीन कुंजियाँ स्पष्ट रूप से नाम की गई हैं: हर जगह अनासक्त बुद्धि, वास्तविक आत्म-महारत, और लालसा से स्वतंत्रता। सबक: इस सर्वोच्च स्वतंत्रता का लक्ष्य रखो, जो निष्क्रियता में भागना नहीं, बल्कि ऐसी आंतरिक अनासक्ति के साथ कार्य करना है कि कर्म तुम्हें बिल्कुल नहीं बाँधता। पूरी तरह कार्य करो; पूरी तरह मुक्त रहो।

भगवद्गीता 18.49 आज के युवाओं (Gen Z) के लिए क्या सीख देती है?

निकालने योग्य इनसाइट 'नैष्कर्म्य-सिद्धि' का ब्यूटीफुल, पैराडॉक्सिकल आइडिया है — 'एक्शनलेसनेस' की परफेक्शन जो एम्फेटिकली एक्शन की एब्सेंस नहीं बल्कि फुल एक्शन के भीतर कम्प्लीट इनर फ्रीडम है। यह एक टेंशन रिज़ॉल्व करता है जो पूरी गीता में चलता है। अब श्रीकृष्ण 'एक्शनलेसनेस' अटेन करने की बात करते हैं — पर वे कुछ सटल मतलब रखते हैं: एक्शन रोकना नहीं, बल्कि ऐसी इनर फ्रीडम में एक्ट करना कि एक्शन तुम्हें बिल्कुल बाइंड नहीं करता। बाहर से, तुम किसी और की तरह एक्ट कर रहे हो; अंदर, तुम पूरी तरह फ्री, अनबाउंड हो। तीन कीज़ नेम की गई हैं: हर जगह अनअटैच्ड इंटेलेक्ट, सेल्फ-मास्टरी, और क्रेविंग से फ्रीडम। सबक: इस हाईएस्ट फ्रीडम का एम करो, जो पैसिविटी में एस्केप नहीं, बल्कि ऐसी इनर अनअटैचमेंट के साथ एक्ट करना है कि एक्शन तुम्हें बाइंड नहीं करता। फुली एक्ट करो; पूरी तरह फ्री रहो।

भगवद्गीता 18.49 बच्चों को सरल भाषा में कैसे समझाएँ?

श्रीकृष्ण सबसे ऊँची तरह की स्वतंत्रता का वर्णन करते हैं! वे इसे 'अकर्म' कहते हैं — पर यहाँ आश्चर्यजनक मोड़ है: इसका मतलब कुछ न करना नहीं! इसका मतलब अंदर इतना मुक्त होना है कि जब तुम बहुत सी चीज़ें कर रहे हो, करना तुम्हें बिल्कुल फँसाता या भारी नहीं करता! यहाँ मज़ेदार, आश्चर्यजनक विचार है: तुम सोच सकते हो सबसे ऊँची स्वतंत्रता का मतलब अपनी सब गतिविधियाँ रोकना है। पर श्रीकृष्ण कहते हैं नहीं! सबसे ऊँची स्वतंत्रता एक ही समय में बहुत सक्रिय और अंदर पूरी तरह मुक्त होना है! बाहर से, तुम हर किसी की तरह व्यस्त दिखते हो। पर अंदर, तुम उतने ही मुक्त और हल्के हो जैसे तुम कुछ नहीं कर रहे! यह एक नर्तक की तरह है जो पूरी ऊर्जा से चलता है पर पूरी तरह मुक्त महसूस करता है! और श्रीकृष्ण तीन कुंजियाँ देते हैं: (1) किसी चीज़ से आसक्त न होना, (2) खुद पर महारत, (3) लालसाओं से न खींचा जाना। तो सबसे अच्छी स्वतंत्रता कुछ न करना नहीं — यह सब कुछ करते हुए अंदर पूरी तरह मुक्त होना है!

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अध्याय सन्दर्भ

सबसे बड़ा यह अध्याय समस्त गीता का सार है: संन्यास और त्याग का भेद, गुणों के अनुसार कर्म, स्वभावज कर्तव्य, और परम उपदेश — सब कुछ भगवान के शरण हो जाओ, वे समस्त पापों से मुक्त कर देंगे।

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